
यह कविता जीवन और मृत्यु के अटल सत्य को पिंजरे और पंछी के प्रतीक के माध्यम से अभिव्यक्त करती है। एक दिन शरीर रूपी पिंजरा खाली हो जाता है और प्राण-पखेरू अपनी अनंत यात्रा पर निकल पड़ता है। धन, पद, प्रतिष्ठा और अहंकार सब यहीं रह जाते हैं।
अंततः मनुष्य के साथ यदि कुछ चलता है, तो वह है उसके प्रेम, करुणा, सद्भावना और अच्छे कर्मों की अमिट छाप। कविता हमें याद दिलाती है कि जीवन अनिश्चित है, इसलिए जब तक साँसें हैं, प्रेम बाँटें और किसी के जीवन में मुस्कान का कारण बनें।
जीवन का अंतिम सत्य
वह पिंजरा तो खाली रह गया,
एक प्रश्न मन में गहरा रह गया।
जिसने चूहों को प्रेम से पाला था,
उसका अंत भी कितना निराला था।
एक दिन विजय भी सोया बिस्तर पर,
शांत पड़ा था अपना ही घर।
नश्वर देह वहीं रह गई,
जीवन-ज्योति कहीं खो गई।
साँसों की डोरी टूट चुकी थी,
जीवन की संध्या ढल चुकी थी।
आँखें बंद थीं, होंठ मौन थे,
कल तक जो अपने थे, आज उदास थे।
जिस देह को अपना माना था,
जिस पर इतना गर्व जताया था,
वह देह आज निःशब्द पड़ी थी,
जीवन की डोर कहीं और जुड़ी थी।
पिंजरा था शरीर, प्राण थे पंछी,
जीवन की लीला बड़ी अनोखी।
जब तक साँसों का साथ रहा,
इस तन में जीवन आबाद रहा।
फिर एक पल ऐसा भी आया,
समय ने अपना नियम निभाया।
प्राण-पखेरू उड़ चले अनजान,
पीछे रह गया मिट्टी का मकान।
न धन साथ गया, न मान-सम्मान,
न पद, न प्रतिष्ठा, न अभिमान।
जो बाँटा प्रेम, जो किया उपकार,
वही छोड़ गया जीवन में अपने निशान।
नफ़रत की दीवारें क्यों बनाएँ?
क्यों अपनों के दिल दुखाएँ?
जब साँसों की गिनती मालूम नहीं,
तो प्रेम जताने में देर करें क्यों भला?
जब तक जीवन साथ निभाए,
किसी के चेहरे पर मुस्कान सजाएँ।
दुःख में किसी का हाथ थाम लें,
रूठे हुए दिलों को फिर से मना लें।
क्या पता कल यह साँस रहे न रहे,
अपना कोई पास रहे न रहे।
आज जो अवसर हाथ आया है,
वह कल लौटकर कहाँ आया है?
शरीर तो मिट्टी में मिल जाएगा,
समय हर निशान मिटा जाएगा।
पर प्रेम से छुआ हुआ हर दिल,
यादों में हमें जीवित रखेगा।
अंत में बस इतना समझ लेना,
जीवन को प्रेम से भर लेना।
आना-जाना प्रकृति का विधान है,
यही जीवन का अंतिम सत्य-ज्ञान है।
पिंजरा खाली रह जाएगा,
प्राण-पखेरू उड़ जाएगा।
पर जिसने प्रेम बाँटा जीवन भर,
वह दिलों में सदा अमर रहेगा।
विजय वर्मा
www.retiredkalam.com

Categories: kavita
Leave a Reply