तुम्हारा इंतज़ार है ….5

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इश्क की उम्र नहीं होती …. ना ही दौर होता है

इश्क तो इश्क है …जब होता है बेहिसाब होता है

चाहे कितनी भी दुरी हो .. वो दिल के पास होता है

मिलने की कोई उम्मीद नहीं होती है ,  

फिर भी मिलने का इंतज़ार होता है …

अनामिका  अकेले में कुर्सी पर बैठ , अपनी आँखे मूंदें राजीव के बारे में सोच रही थी …तभी राजीव चुप – चाप सामने आकर खड़ा हो गया और अनामिका  के आँखे खुलने का इंतज़ार करने लगा |

तभी माँ ने आकर कहा …अनामिका  ! तुम कुर्सी पर बैठे – बैठे क्यों सो रही हो ?  अगर नींद आ रही है तो जाकर आराम से कमरे में सो जाओ |

अनामिका की तन्द्रा भंग हुई और चौक कर उसने  माँ की ओर देखा और सोचने लगी…क्या यह सपना था, जो मुझे महसूस हुआ था कि राजीव मेरे पास आ कर  खड़ा हो गया है  |

हाँ , यह सपना ही है | यह मुझे क्या हो गया है कि दिन में ही राजीव के सपने देखने लगी हूँ |

अनामिका के चेहरे पर मुस्कान बिखर गई और वह अपने कुर्सी से उठी और  कमरे में सोने चली गई |

आज सुबह जब रश्मि  की नींद खुली तो देखी  कि अभी सुबह के पांच ही बज रहे है | उसे शायद ख़ुशी के कारण रात में ठीक से नींद नहीं आ सकी  |

एक अनजाना  सा डर  और दिल में ख़ुशी,  दोनों  का वह एक साथ अनुभव कर रही थी |

आज उसकी बरात आ रही थी …, उसका  होने वाला जीवन साथी आ रहा था | सच, घबराहट में रात में ठीक से नींद ही नहीं आयी |

रश्मि  कुछ सोचती हुई  अपने बिस्तर से उठी और सामने अलमीरा खोल कर स्नान के बाद पहनने के लिए कपडे  निकाल रही थी तभी उसकी नज़र अनामिका की लायी हुई गिफ्ट पर पड़ी |

वो ज़ल्दी से गिफ्ट को खोलकर उत्सुकता से  देखने लगी | गिफ्ट का पैकेट खोलते ही गिफ्ट देख कर वह उछल पड़ी… उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा |  

वो जिस गले की हार खरीदने के लिए पहले से तमन्ना की हुई थी ..वही हार आज अनामिका ने गिफ्ट किया था |

उसमे हीरे भी जड़ें हुए थे | वह उस हार को देख कर ख़ुशी से पागल हो गई और दौड़ कर अनामिका के कमरे में “थैंक यू”  कहने पहुँची |

लेकिन अनामिका उसे देख कर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी,  क्योकि डायरी वाली बात से अभी भी वह गुस्से में थी  | उसके रूखे व्यवहार से रश्मि को अजीब सा लगा | पहले तो कभी अनामिका उससे इस तरह पेश नहीं आयी थी |

तभी रश्मि की नज़र अपनी डायरी पर पड़ी जो अनामिका के तकिये के नीचे पड़ी थी |

रश्मि को यह समझते देर नहीं लगी कि  उसकी डायरी को अनामिका पढ़ चुकी है और सारी हकीकत पता चल चूका है |

अचानक वह अनामिका के पैर पकड़ ली और क्षमा मांगते हुए  कहा …मुझे माफ़ कर दो अनामिका | मुझसे बहुत बड़ी भूल हुई है | मैं  अपने प्यार में अंधी हो गई थी और अपने स्वार्थ के लिए तुम्हे बहुत दुःख पहुँचाया है |

अब बीती बातों को याद करने से क्या फायदा रश्मि | तुमने  जैसा चाहा वैसा कर दिया | जिसका परिणाम आज यह हुआ कि इससे ना तुम्हे कुछ हासिल हुआ ना मुझे  … .अनामिका ने  दुखी भरे स्वर में कहा |

ऐसा मत कहो अनामिका …, अगर मैंने तुम्हारा काम बिगाड़ा है तो मैं ही इसे सही करुँगी  | अब मैं किसी भी हालत में राजीव और तुम्हारे बीच की ग़लतफ़हमी को दूर करुँगी  |

अनामिका अपना पैर छुडा  रही थी लेकिन रश्मि छोड़ने का नाम नहीं ले रही थी ..बस एक ही बात कहे जा रही थी ….जब तक तुम मुझे माफ़ नहीं कर दोगी , मैं यहाँ से नहीं जाऊँगी |

सुबह सुबह घर के कुछ सदस्य भी जाग चुके थे, इसलिए अनामिका झमेला को आगे ना बढ़ाते हुए कहा …ठीक है रश्मि , मैं तुमको माफ़ करती हूँ और उसके माथे पर हाथ रख कर आशीर्वाद दी |

रश्मि के आँखों में आँसू छलक  आये और अनामिका के गले लग कर कुछ  देर यूँ ही रोती रही |

फिर दोनों अलग हुए तो रश्मि ने विनती भरे स्वर में कहा …..प्लीज  अनामिका,  इन सब बातों को राजीव  को मत बताना , वर्ना मैं उसकी नज़रों में हमेशा के लिए गिर जाउंगी और मैं उसका सामना भी नहीं कर पाऊँगी |

 तुम अपनी छोटी बहन की सभी गलतियों को माफ़ कर दो ….लड़की की बिदाई में तो सभी लोग आशीष देते है,  तुम बस मुझे  माफ़ कर दो |

रश्मि की भावपूर्ण बातें सुनकर अनामिका के आँखों में भी आँसू आ गए और उसकी सारी गलतियों को माफ़ कर उसे गले लगा लिया | सब कुछ सामान्य हो गया जैसे कुछ हुआ ही ना था |

घर में शादी का माहौल था | बहुत सारे सगे – सम्बन्धी एक जगह जमा हो तो मौज मस्ती अपने चरम सीमा  पर होती है |

सुबह से ही बड़े – बुजुर्ग, औरत – मर्द  विभिन्न तरह के रस्म निभाने में व्यस्त थे | तो वही जवान लड़के – लड़की अपने सबसे बेस्ट  ड्रेस का चुनाव  करने में बिजी थे ताकि आज बरात में  वो सबसे सुन्दर दिख सके |

लेकिन इसके विपरीत अनामिका को अपने कपड़ो का चुनाव करने और शादी के दिन क्या पहनना है इसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी बल्कि उसके दिमाग में तो राजीव ने कब्ज़ा कर रखा था |

अनामिका ने तो मन ही मन पूरा प्लान सोच रखा था कि राजीव से जैसे ही सामना होगा , सबसे पहले उसे उसकी नौकरी के लिए बधाई दूंगी और फिर रश्मि द्वारा पैदा की गई ग़लतफ़हमी को दूर करुँगी |

शाम ढल चुकी थी और चारो तरफ अँधियारा घिर गया था |  तभी किसी ने आकर कहा …बाराती आ चुकी है, आप सभी लोग तैयार रहे …

राजीव अभी तक नहीं आया था और अनामिका की नज़रे राजीव को ही ढूंढ रही थी |

उसकी नज़रे दरवाजे पर गई और तभी उसके देखा …. बारातियों के स्वागत के लिए और  “समधी – मिलन” के लिए हाथो में माला लिए मामा, पिता जी और कुछ अन्य लोग खड़े थे |

अचानक अनामिका चौक पड़ी जब उसकी नज़र राजीव पर पड़ी …जो हाथ में माला लिए सभी लोगो के साथ बारातियों के स्वागत के लिए खड़ा था |

उसे देख कर अनामिका की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा | तभी राजीव की नज़र उस पर पड़ी और  वह हाथ हिला कर इशारा किया |

चूँकि भीड़ ज्यादा थी और यह अवसर भी अलग था | इसलिए यहाँ राजीव से बात नहीं हो सकी |

तभी  बाजे – गाजे की आवाज़ सुनाई  दी  और फिर थोड़ी देर में  बारात आकर दरवाज़े पर लगी | पटाखों की गडगडाहट के बीच  में समधी मिलन का कार्यक्रम शुरू हुआ |

उसके बाद घर की औरतों ने रस्म के तहत दुल्हे का “गाल – सिकाई” और “चुमावन” किया | फिर उसने  देखा कि राजीव उस दुल्हे को उठा  कर मंडप तक ले आया | सभी लोग इस रस्म को देख कर आनंदित हो रहे थे |

उसके बाद बारातियों के स्वागत के लिए नास्ता और कोल्ड ड्रिंक्स सर्व किया जाने लगा |

अनामिका भी बारातियों के लिए नास्ता का पैकेट देने में सहयोग करने लगी |

इसी क्रम में राजीव का सामना अनामिका से हुआ और आपसी अभिवादन के साथ बातचीत शुरू हुई |

राजीव को अचानक सामने पाकर वह नर्वस हो गई और उसने जो प्लान बनाया था वो सब गड़बड़ हो गया और वो राजीव को बधाई देना ही भूल गई  |

तभी राजीव ने कहा …हेल्लो, कैसी हो अनामिका ?

मैं बिलकुल ठीक हूँ राजीव…..  अनामिका खुश होते हुए ज़बाब दिया |

तुम्हारी पढाई लिखाई कैसा चल रही  है ?…राजीव अनामिका से बातों के क्रम में पूछा |

मुझे  उम्मीद है कि फाइनल  की परीक्षा में  तुमसे ज्यादा अंक ला पाऊँगी ….बोल कर अनामिका हँसने लगी |

वैरी गुड़,  इंसान को ज़िन्दगी में तरक्की करने के लिए पढाई में स्पर्धा करना ज़रूरी है | मैं दुआ करता हूँ कि तुम जो चाहती हो वो सब तुमको मिले …राजीव ने कहा |

तुम बिलकुल गलत बोल रहे हो ? इसका मलतब मेरी इच्छा क्या है,  तुम्हे पता ही नहीं है ? …अनामिका ने राजीव कि तरफ देखते हुए कहा |

मुझे सब पता है अनामिका , लेकिन मुझे यह  मंज़ूर नहीं कि तुम अपने माँ बाप की इच्छा के विरूद्ध मेरी जीवन संगिनी बनो |

और अगर मैं अपने माता पिता को मना लूँ तो ? …अनामिका उसका मन टटोलने के लिए पूछा |

मैं तो पहले से ही तुम्हारा हूँ लेकिन शायद तुम्हे इसका अहसास नहीं है |   

ऐसा मत बोलो राजीव | कुछ परिस्थिति के कारण  हमारे बीच  गलफहमी पैदा हो गई थी और मैं तुम्हे आज तक गलत समझती रही |

आज सभी बातों का खुलासा हो गया और हमारे मन में तुम्हारे प्रति जो कटुता थी वह समाप्त हो चुकी है |

थैंक यू अनामिका …राजीव खुश होते हुए कहा |

मन के सारे भ्रम  और  गिले – शिकवे  अब दूर हो चुके थे |

आज शादी तो रश्मि की हो रही थी लेकिन सबसे ज्यादा खुश तो अनामिका थी |

ख़ुशी का कारण भी था …, जिसे वह अपना  सबसे बड़ा दुश्मन समझती थी,  राजीव मेरे मेडिकल में दाखिला लेने पर आज ख़ुशी ज़ाहिर की और उसने  एक सुन्दर सा ड्रेस भी मुझे गिफ्ट किया हैं …|  आज शादी के शुभ अवसर पर मैंने उसी ड्रेस को पहनने का फैसला किया है…..(.क्रमशः)

पलकों पे रूका है समंदर खुमार का

कितना अजीब नशा है तेरे इंतज़ार का

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तुम्हारा इंतज़ार है ….4

चाँद सितारों से तेरी ही बात करते हैं,
तनहाईयों में तुझे ही याद करते हैं,
तुम आओ या ना आओ मर्ज़ी तुम्हारी,
हम तो हर पल तुम्हारा इंतजार करते हैं। 

 शादी की तैयारी काफी जोरों से चल रही थी | आज  सुबह सुबह  अनामिका की माँ का फ़ोन आया |

माँ ने बताया कि शादी में शामिल होने के लिए वो पिता जी के साथ आज ही पटना मामा जी के घर  पहुँच रही है |  जब परिवार में शादी ब्याह का मौका होता है तो बहुत सारे रस्म –ओ –रिवाज़ निभाने पड़ते है  और कुछ रिवाज़ तो ऐसे होते है जिसमे ख़ास रिश्तेदार की अहम भूमिका होती है |

और फिर शादी तो लेने – देने और ख़ुशी मनाने का मौका होता है जिसमे अपने सामर्थ  के हिसाब से परिवार  वाले सहयोग करते है |

हमारे गाँव – घर में बेटी की शादी को एक यज्ञ के रूप में देखा जाता है जिसमे सभी लोग यथा – संभव अपना योगदान देकर पुण्य के भागी बनने का प्रयास करते है |

माँ से खबर पाकर अनामिका का मन ख़ुशी से झूम उठा | वह भी होस्टल से मामा के यहाँ जाने का निश्चय  कर ली ताकि माँ से भेट कर सके | माँ से अलग रह कर अनामिका को हमेशा माँ की चिंता लगी रहती है |

वैसे आज सोमवार का दिन था और लंच तक क्लास होना था | इसलिए उसके बाद ही जाना संभव हो सकेगा,  ऐसा सोच कर अनामिका सुबह सबसे पहले अपने कुछ कपडे  एक बैग में डाल ली  और साथ ही रश्मि के लिए जो एक गिफ्ट खरीद कर रखी  थी उसे भी अपने कपड़ो के साथ पैक कर ली | ताकि क्लास समाप्त होते ही तुरंत मामा के घर जाने को रवाना हो सके |

अनामिका कॉलेज चली गई और फिर पूर्व निर्धारित समय के अनुसार ठीक दो बजे कॉलेज की क्लास समाप्त होने पर अपने मामा के घर के लिए रवाना  हो गई |

अनामिका जैसे ही अपने मामा के घर में घुसी तो देखा…सामने आँगन में  कुछ औरतें बैठ कर शादी के गीत गा रही थी | माँ भी उनमे शामिल होकर साथ दे रही थी |

कुछ लड़कियां तो गीत की लय पर नाच रही थी,  आपस में हँसी – ठिठोली कर रही थी और एक दुसरे को छेड़ भी रही थी  |  पूरा माहौल मस्ती वाला था और  सभी औरतें इसका भरपूर मजे ले रही थी | यह सब देख कर अनामिका के चेहरे पर भी मुस्कान बिखर गई |

शादी ब्याह का माहौल ही ऐसा होता है कि सभी लोग अपनी अपनी परेशानियों को भूल कर सब के साथ ख़ुशी मनाते है और समय समय पर शादी के अवसर पर होने वाले विधि और रस्म पुरे उत्साह के साथ करते है | इसी तरह यह सिलसिला बारात के विदा होने तक चलता रहता है |

पिता जी ड्राइंग रूम में बैठ कर मामा जी से बातें कर रहे थे | पिता जी शायद कह रहे थे कि अगर अनामिका की मेडिकल की पढाई नहीं होती तो इसका ब्याह हम पहले ही कर चुके होते |

 जैसे ही अनामिका अपने पिता के सामने पहुँची , वे लोग चुप हो गए और अनामिका की ओर देखने लगे |

तभी अनामिका ने पिता और मामा जी के पैर छुए और पिता जी से पूछा …..आप कैसे है ?

मैं तो बिलकुल ठीक हूँ बेटी | लेकिन तुम्हारी माँ को यहाँ छोड़ कर आज ही लौट जाउँगा | अभी खेती – बारी का समय है इसलिए फिर बाद में आऊंगा …पिता जी ने ज़बाब दिया |

आज तो रुक जाइए… भले ही  कल चले जाइएगा | माँ तो कह रही थी कि आज रात में कोई ऐसा रस्म होना है , जिसके लिए माँ के साथ आप को भी रहना ज़रूरी …..अनामिका ने पिता जी को माँ द्वारा कही हुई बात को बता दी |

फिर तो पिता जी को अपनी सहमती देना ही था | पिता जी ने फिर पूछा …तुम्हारी पढाई कैसी चल रही है ?

बिलकुल ठीक पिता जी …अनामिका ने कहा |

पिता जी से बातें करने के बाद  अनामिका घर के भीतर गई तो देखा  कि रश्मि को हल्दी लगाने का रस्म चल रहा था और वह हल्दी से सराबोर थी | कुछ लोग जो रश्मि को हल्दी लगा रहे थे, वो आपस में एक दुसरे को भी  हल्दी लगा कर ठिठोली कर रहे थे |

उसी समय अनामिका रश्मि के पास जाकर शादी की बधाई देते हुए बोली….देख रश्मि,  तेरे लिए मैं क्या लाई हूँ | यह कहते हुए गिफ्ट उसकी  ओर बढाई  |

रश्मि अपने हल्दी से लथपथ हाथों को दिखाते  हुए बोली….अभी मेरे  हाथ गंदे है,  इसलिए तुम  ऐसा करो कि इसे मेरे अलमारी में रख दो ,मैं इधर से फ्री होकर तुम्हारे स्पेशल गिफ्ट को  देखूँगी |

ठीक है .., अनामिका ने कहा और कमरे में आकर अपने साथ लाए हुए गिफ्ट को उसके अलमारी में रखने लगी |

चूँकि गिफ्ट कीमती थी इसलिए अलमीरा के लॉकर में  रखना उचित होगा | ऐसा सोच कर अनामिका ने चाभी लगा कर लॉकर खोला, तभी उसमे से रश्मि की  पर्सनल डायरी सरक कर नीचे  गिर गई |

अनामिका ने वापस रखने के लिए वह डायरी उठाई तभी हवा से उसके कुछ पन्ने खुल गए और अनामिका ने सरसरी निगाह उस पर डाली तो देखा कि इसमें उसके और राजीव के बारे में कुछ बातें लिखी हुई है | उसकी उत्सुकता बढ़ गई | उसके मन में आया कि उसे भी पता हो कि रश्मि  उसके और मेरे बारे में क्या लिखी है |

अनामिका ने डायरी को छुप कर पढने का निर्णय किया और इसलिए डायरी को अपने पास  छुपा कर रख ली | अलमीरा को पहले की तरह बंद कर दिया और फिर वह कमरे से  बाहर  आ गई |

अनामिका एकांत जगह की तलाश  में अपनी नज़रे इधर उधर घुमाई | लेकिन ऐसे माहौल में कोई   शांत जगह नज़र नहीं आया तो धीरे से वह छत पर चली गई |

जब  डायरी पढना शुरू किया तो उसकी नज़रे फटी की फटी रह गई …उसे तो विश्वास नहीं हो रहा था कि वह रश्मि जिसे  वो  अपनी  छोटी बहन ही नहीं बल्कि अपनी राजदार समझती थी और अपने दिल की हर बात बताती थी वह उसके साथ इतना बड़ा धोखा कर सकती है |

उसे यह सोच कर और भी दुःख हुआ कि यह जानते हुए भी कि मैं राजीव से प्रेम करती हूँ और उसे हर हाल में पाना चाहती हूँ….वह खुद राजीव से मन ही मन प्यार करने लगी |

और तो और हमारे और राजीव के बीच  में गलफहमी और कटुता को बढाने  के लिए षड़यंत्र के तहत बहुत सारी झूठी बातें फैलाई ताकि हम दोनों के बीच में दुरी बढ़े और एक दुसरे से नफरत करने लगे |

उसी का यह परिणाम रहा कि आज तक मैं राजीव को गलत समझती रही,  जब कि डायरी पढने से यह राज़  उजागर हुआ कि उसने रश्मि के माध्यम से मेरी सफलता पर बधाई भी दी थी लेकिन रश्मि ने इस बात को भी छुपा लिया ..और मैं समझती रही कि जलन के कारण उसने मुझे बधाई नहीं दी  |

डायरी पढने से यह बात भी  साफ़ हो गया था कि राजीव तो उससे बहुत प्यार करता है |

….. लेकिन वह जानता था कि अगर बात शादी पर आयी तो उसके माँ बाप इसके लिए हरगिज़ राज़ी नहीं होंगे | एक तो जाति का बंधन और दुसरे, वो ठहरे गाँव के इज्जतदार और प्रतिष्ठित लोग….

वे कभी भी अपनी एकलौती बेटी के लिए यह  रिश्ता पसंद नहीं करेंगे ….तब ऐसी परिस्थिति में एक ही रास्ता बचता था और वो था … घर वालों के विरुद्ध शादी करना और घर परिवार और समाज से कट जाना |

और तब ऐसी परिस्थिति में ना सिर्फ उसका बल्कि अनामिका की भी  ज़िन्दगी कठिनाइयों और दुखो से भर जाता |

राजीव नहीं चाहता था कि अपने क्षणिक प्यार और स्वार्थ के लिए अनामिका के ज़िन्दगी को नरक बना दिया जाए ..और उसे ज़िन्दगी भर रोने के लिए मजबूर कर दिया जाए |

इन्ही सब भविष्य की बातों को सोच  कर राजीव इस  निष्कर्ष पर  पहुँचा कि अगर अनामिका पढ़ लिख कर अपने पैरो पर खड़ा हो जाए औए ऊँचे पद पर पहुँच जाए तो ऐसी स्थिति में घर परिवार और  समाज …शायद उसके निर्णय को स्वीकार कर लेंगे |

अतः यही सोच कर शुरू में उसने अनामिका के स्वाभिमान को जगाया था और उसके अनुमान के अनुसार ही अनामिका दिल पर चोट खाकर अपने दृढ इरादों से नई  उचाईयों को हासिल  करने में लग गई |

रश्मि के डायरी में वह लेटर भी मिला जिसमे मेडिकल में दाखिला के लिए बधाई दिया हुआ था | वह लेटर भी रश्मि ने छुपा ली और मुझे नहीं दी | ऐसे बहुत सारी बातों  का खुलासा इस डायरी से हो रहा था |

यह सब देख कर अनामिका को अपनी बहन पर बहुत गुस्सा आ रहा था लेकिन ऐसे शादी वाले माहौल में कुछ अपशब्द बोलना उचित नहीं था और बीती बातों को कुरेदने से कोई फायदा भी नहीं होने वाला था |

लेकिन इसका मतलब साफ़ है कि राजीव बेहद  संवेदनशील इंसान है और वह अब भी मुझे उतना ही प्यार करता है | ऐसा सोच कर अनामिका के मन में जो नफरत राजीव के विरूद्ध पनप रही थी उसे भी उसने ख़त्म कर दिया | अब अनामिका को राजीव से मिलने की तीव्र इच्छा हो रही थी |

ये कह कह के हम दिल को समझा रहे है
कि वो अब चल चुके, वो अब आ रहे है।

आज वो दिन आ ही गया जिसका अनामिका को बेसब्री  से इंतज़ार था | जी हाँ .. आज रश्मि की बरात आने वाली थी और सबसे बड़ी बात कि राजीव भी आज ही आ रहा था |

अनामिका ने तो पूरा प्लान सोच रखा था कि राजीव से जैसे ही सामना होगा , सबसे पहले उसे उसकी नौकरी के लिए बधाई दूंगी और फिर रश्मि द्वारा पैदा की गई ग़लतफ़हमी को दूर करुँगी |

अनामिका  अकेले में कुर्सी पर बैठे आँखे मूंदे यह सब सोच रही थी …तभी राजीव चुप चाप सामने आकर खड़ा हो गया और अनामिका के आँखे खुलने का इंतज़ार करने लगा ………(क्रमशः )

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तुम्हारा इंतज़ार है …3

पिता जी से अपनी आगे की पढाई जारी रखने की सहमती  मिलते ही अनामिका के चेहरे पर मुस्कान तो आई लेकिन उस मुस्कान के पीछे बहुत बड़ा राज़ छिपा था जिसे सिर्फ अनामिका का दिल ही जानता था |

वह पिता जी से आशीर्वाद प्राप्त कर अपने कमरे में आ गई और अपने कपडे और किताबें समेटने लगी | अब तो उसे पटना के किसी अच्छे कॉलेज में एडमिशन लेना ही था |

यह सत्य है कि राजीव के द्वारा जो मेरे दिल पर जख्म दिया गया है वह बराबर टीसता  रहता है  | शायद यह ज़ख्म तभी भरेगा जब ज़िन्दगी में मैं बड़ा मुकाम  हासिल ना कर लूँ…अनामिका मन ही मन सोच रही थी |

मुझे राजीव से भी पढाई में आगे निकलना  होगा तभी राजीव के सामने सिर उठा कर कह सकुंगी कि  देखो …जिसे तुम जाहिल – अनपढ़ समझ कर ठुकरा दिया था वह तुमसे भी आगे निकल चुकी है और समाज में इज्जत प्रतिष्ठा में तुमसे भी आगे है |

तुमने मेरे अंतरात्मा को ललकारा  है और जब एक औरत कुछ ठान लेती है तो उसे पूरा करने के लिए वह हर तरह की  मुसीबतों  का मुकाबला कर सकती है,  शायद मुझमे भी वो शक्ति मौजूद है |

तभी तो मैं राजीव के दुत्कार से रोने के बजाये मैं अपने जीवन में एक कड़ा  फैसला ले चुकी हूँ और वह यह कि अपने को इस समाज में उससे भी बड़ा बन कर दिखाना |  भगवान् मेरी  सहायता ज़रूर करेंगे |

वह अपने मन में पता नहीं और क्या क्या सोच  कर रही थी तभी माँ कमरे में आयी और कहा  …तुम पटना कब जाना चाहती हो बेटी  ?

मैं कल ही जाना चाहती हूँ माँ …अनामिका ने दृढ निश्चय से कहा |

तुम चली जाओगी तो मेरा मन नहीं लगेगा |  तुमसे बातें करके  मेरा दिन भर का थकान मिट जाता है …माँ  ने दुखी स्वर में  कहा |

पढाई करनी है तो जाना पड़ेगा ना माँ | वैसे बीच – बीच में तुमसे मिलने तो आती ही रहूंगी …अनामिका माँ के दुःख को महसूस कर रही थी |

तुम ठीक कहती हो, वैसे भी बच्चो की ख़ुशी से बढ़ कर माँ बाप के लिए कोई और ख़ुशी नहीं होती है | मैं चाहती हूँ .., तू जहाँ भी रहो,  खुश रहो  |

आज वो दिन भी आ गया |  पटना के साइंस कॉलेज में अनामिका को दाखिला मिल ही गया  | पटना के प्रतिष्ठित कॉलेज में  दाखिला  मिलने पर अनामिका बहुत खुश थी |

उसने सोचा था कि कॉलेज में दाखिला मिलने पर राजीव बधाई देने ज़रूर आएगा लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ | लगता है जैसे राजीव अपने होस्टल से घर आना ही छोड़ दिया है |

 अनामिका को अपना वह संकल्प सदा याद रहता  है और वह उसे पूरा करने की दिशा में आज {कॉलेज में दाखिला लेकर)  पहला कदम रख चुकी है | अब तो उसे मेडिकल कॉलेज में दाखिला के लिए तैयारी करनी है  और एक बड़ा डॉक्टर बनना है,  तभी तो समाज में एक इंजिनियर से ज्यादा नाम और प्रतिष्ठा उसे मिल  पायेगी |

अनामिका अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए  रात दिन मिहनत करने लगी | पढाई के अलावा उसने अपने सारे शौक और मौजमस्ती  छोड़ चुकी थी |

उसमे यह बदलाव देख कर  घर वाले तो चकित थे ही, खास कर पिता जी तो बातों बातों में अनामिका से कह भी दिया था …., इतनी सीरियस पढाई करने की क्या ज़रुरत है | कुछ दिनों के बाद तो शादी करके तुझे चूल्हा – चौकी ही संभालना है |

परन्तु अनामिका कुछ ज़बाब नहीं दे सकी बल्कि मन ही मन अपने संकल्प को दुहराती रहती, जो अपने पिता को भी नहीं बता पाती थी  |

 अनामिका की  ज़िन्दगी में शायद किसी ने पहली बार उसके दिल को ठेस पहुंचाई थी | राजीव को तो इसका उचित ज़बाब देना ही होगा |

    अनामिका के मिहनत में उसकी छोटी बहन रश्मि का भी बड़ा योगदान  रहता है,  वह हर कदम उसकी ज़रुरत के समय मदद करती है और रश्मि को  भी अनामिका के साथ रहने का एक फायदा हुआ है …उसकी पढाई भी सुधर गई है और वो भी अपने क्लास में अच्छे अंक लाने लगी है |

इससे मामा मामी भी बहुत खुश थे और अनामिका का विशेष ध्यान रखते थे |

समय भी कितनी तेज़ी गुजर जाती है | आज अनामिका का मेहनत  रंग लाई और पहले ही प्रयास में  वो मेडिकल में दाखिला के लिए क्वालीफाई कर गई |

घर में ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा | गाँव में पहली बार कोई मेडिकल की पढाई करने जा रही थी | राजेश्वर सिंह जी ने इस ख़ुशी में पुरे गाँव में मिठाई बंटवाई | इस सफलता पर पूरा गाँव खुश था |

इस बार भी अनामिका ने सोचा था कि राजीव इतनी बड़ी सफलता पर तो ज़रूर बधाई देगा , परन्तु इस बार भी ऐसा कुछ नहीं हुआ |

अनामिका को बुरा तो लगा लेकिन उसके इरादे में रत्ती भर भी कमी नहीं आयी | और आगे भी उसने इसी तरह से मिहनत  जारी  रखने की ठान ली थी |

राजीव के बारे में जानकारी रश्मि से मिल जाया करती थी, लेकिन यह संयोग ही था कि इतने दिनों में एक बार भी राजीव से सामना नहीं हो सका  |

चाहे कितना भी कोशिश करती हूँ कि उसके बारे में नहीं सोचूं ..,लेकिन पता नहीं क्यों, ऐसा कोई दिन भी नहीं जाता जिस दिन उसे याद नहीं किया हो ..पता नहीं यह  कैसा  अनजाना  बंधन है…वह मन ही मन सोच रही थी और अपने सभी सामान बक्शे में पैक कर रही थी |

अनामिका को कॉलेज होस्टल मिल गया था और कल ही उसे शिफ्ट भी करना था |

 इसे संयोग ही कहा जा सकता है कि अनामिका का भी पटना मेडिकल  कॉलेज में दाखिला मिला था जो राजीव के इंजीनियरिंग  कॉलेज से मात्र ५०० मीटर के फासले पर था | लेकिन दिलों की दुरी शायद इससे बहुत ज्यादा थी , इसीलिए तो पिछली घटना के बाद एक बार भी आपसी मुलाकात नहीं हो सकी  |

सच कहूँ तो ऊपर से चाहे कितना भी नफरत करूँ  लेकिन सच्चाई यही  है कि राजीव की सादगी आकर्षित करती थी मुझे |…लेकिन अब इन सब बातों से क्या फायदा | जो हकीकत है उसी का सामना करना होगा  मुझे |

मुझको जाहिल – अनपढ़ समझने वाले को यह बतलाना चाहती हूँ  कि जब मैं  कोई भी चीज़ ठान लेती हूँ तो उसे पूरा करके  ही छोडती हूँ |

समय जैसे पंख लगा कर उड़ रहे थे  और देखते देखते राजीव की  इंजीनियरिंग की पढाई पूरी हो गई | वैसे पढने में तेज़ और मेहनती  तो था ही |  इसलिए तुरंत ही कैम्पस  सिलेक्शन भी हो गया |

पता चला है कि बोकारो स्टील प्लांट में ज्वाइन भी कर लिया है | चलो अच्छा हुआ | वो जो चाहता था उसे मिल गया है | अगर कभी मेरा उसका सामना हुआ तो बधाई ज़रूर दूंगी |  मैं उसकी तरह घमंडी नहीं हूँ |

समय तो जैसे तेज़ी से गतिमान है .. इसी बीच एक और ख़ुशी की बात हुई कि मेरी ममेरी बहन रश्मि की शादी भी तय हो गई और एक माह  के बाद ही शादी होनी है |

घर वाले तो सभी खुश थे लेकिन मुझे एक सहेली के दूर हो जाने का दुःख हो रहा था | लेकिन अगर किसी का घर बसता  है तो हमलोगों को ख़ुशी तो होनी ही चाहिए |

मैं आज ही  होस्टल से मामा जी के यहाँ आई थी  | शादी की तैयारी  जोरों से  चल रही थी  और ऐसे  मौके पर बहुत सारे काम होते है जिसमे सहयोग किया जा सकता है |

हालाँकि रश्मि शादी करने को तैयार नहीं हो रही थी |  पता नहीं उसके मन में क्या  चल रहा था | लेकिन माँ बाप की  इच्छा का विरोध नहीं कर सकी और दबाब के कारण  तैयार हुई थी |

राजीव के माता पिता लगभग रोज ही आते थे और घर के बहुत सारे कामो में अपना सहयोग देते | शादी में उनको निमंत्रण देना तो अनिवार्य था |

रश्मि से ही पता चला कि राजीव भी छुट्टी लेकर आ रहा है | आता क्यों नहीं, वह मामा – मामी की बहुत इज्जत करता है और रश्मि से भी उसकी दोस्ती है |

अब तो इंतज़ार है कब राजीव से सामना हो और  उसे उसकी उपलब्धि पर बधाई देकर उसे एहसास दिला सकूँ कि मेरी  सोच तुमसे बिलकुल अलग है |

तुमने तो कभी भी मुझे बधाई नहीं दी | लेकिन यह भी सच है कि आज जो कुछ  मैं बनने जा रही हूँ इसके जिम्मेवार भी तुम ही हो …(क्रमशः)

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तुम्हारा इंतज़ार है …2

आज सुबह जब अनामिका  सो कर उठी तो उसका मन यह सोच कर खुश हो रहा था  कि आज तो मामा के यहाँ पटना जाना है और वहाँ एक साल के अंतराल के बाद राजीव को  देख पाऊँगी |

कोई भी दिन ऐसा नहीं जाता जब उसे मैं याद नहीं करती | पता नहीं यह क्या हो गाया है मुझे …. अनामिका  नास्ता करते हुए सोच रही थी |

कहीं मैंने  किताबों में पढ़ा था कि इंसान अपना  पहला प्यार भुलाये नहीं भूलता | ऐसा ही कुछ मेरा भी हाल हो गया है….वह नास्ता तो कर रही थी लेकिन उसका  ध्यान कही और था, जिसे माँ को भी महसूस हो रहा था और उसने टोकते हुए कहा ….तुम्हारा ध्यान कहाँ है बेटी |

तुम हमेशा खोई खोई क्यों रहती हो ?

अनामिका ने माँ के बात को टालते हुए कहा …कुछ भी नहीं माँ | मैं बिलकुल ठीक हूँ |

वह नास्ता कर ही रही थी कि पिता जी कि आवाज़ आयी |  ट्रेन का समय हो रहा है और स्टेशन पर गाड़ी सिर्फ पांच मिनट ठहरती है , इसलिए जल्दी तैयार हो जाओ ताकि समय पर स्टेशन पहुँच सके |

जी पिजा जी …, अनामिका जल्दी से नास्ता समाप्त कर पानी पीते हुए कहा |

ट्रेन सही समय पर थी और करीब एक बजे दिन में वे लोग पटना पहुँच गए  |

राजेश्वर सिंह को दरअसल खेती से फुर्सत नहीं था अतः वे अनामिका को यहाँ छोड़ कर तुरंत ही लौटती गाड़ी  से वापस चले आये |

अनामिका  यहाँ आकर बहुत खुश लग रही थी और उसकी नज़रे पडोस  के मकान में राजीव को ढूंढ  रही थी | लेकिन वह कही दिख नहीं रहा था |

जब अनामिका  लंच कर रही थी तो वह  सब से नज़रे बचा कर अपनी ममेरी बहन रश्मि  से पूछ ही  लिया ….राजीव कही नहीं दिख रहा है ?

वो तो आज कल होस्टल में रहते है | उनका  इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला हो गया है … रश्मि ने बताया |

इतना सुनना था कि अनामिका  का मन उसे एक नज़र देखने को बेचैन हो उठा |

रश्मि को पहले से ही पता था कि अनामिका के दिल में क्या चल रहा है | इसलिए उसके बेचैन मन को तसल्ली देने के लिए वह बोली …कल हमारे घर पूजा है और उसके परिवार वाले सभी आयेंगे |  शायद राजीव भैया भी कॉलेज से छुट्टी लेकर आयेंगे |

इतना सुनकर अनामिका के मन में  थोड़ी तसल्ली हुई और कल के दिन का बेसब्री से इंतज़ार करने लगी |

लगभग एक साल से अनामिका का यह एक तरफ़ा प्यार चल रहा था और एक साल के बाद आज मिलने का मौका भी मिल रहा था |

उसने तो मन ही मन सोच लिया था कि इस बार हिम्मत जुटा  कर उससे  कह दूंगी कि मैं तुमसे  प्यार करती हूँ और उम्र भर तुम्हारे  साथ रहना चाहती हूँ |

घर पर सत्यनारायण भगवान् की कथा चल रही थी | घर के सभी लोग पूजा में व्यस्त थे और अनामिका के ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा जब उसने राजीव को यहाँ  घर की तरफ  आते देखा |

राजीव उसको देख कर मुस्कुराया भी और आकर पूजा में सबों के साथ बैठ गया |

 सब लोग का ध्यान पूजा में था लेकिन अनामिका  बार बार राजीव को ही देखे जा रही थी और मन ही मन सोच रही थी कि किसी ना किसी को तो इसकी पहल करनी ही पड़ेगी |

पूजा समाप्त होते ही वो राजीव को अकेला पाकर प्रसाद देने के बहाने उसके पास पहुँच गई |

राजीव को प्रसाद  दिया और खुद भी उसी  के पास बैठ कर प्रसाद खाने लगी |

बातों बातों में हिम्मत करके अनामिका ने अपने मन की बात कह दी …राजीव , मैं तुमसे प्यार करती हूँ  क्या तुम भी ….??

राजीव ने  पूरी बात सुनने से पहले ही कहा…तुम पागल हो क्या ? मैं तुमसे प्यार कैसे कर सकता हूँ …तुम कहाँ और मैं कहाँ |  ..तुम एक गाँव में पढने वाली लड़की और बहुत पढ़ोगी तो दसवीं कक्षा तक ही | तुम्हारे गाँव में तो कॉलेज भी नहीं है |

अपने आप को  इस काबिल  मत समझो तुम  | मुझे ज़िन्दगी में बहुत आगे जाना है | इन सब चक्करों में पड़ कर अपनी ज़िन्दगी ख़राब नहीं करनी मुझे |

तुमसे हंस कर दो बातें  क्या कर ली,  तुम तो इसे प्यार समझ बैठी | मैं जैसे तुमसे बात करता हूँ वैसे ही सब से करता हूँ |

अनामिका को जैसे लगा उसके चेहरे पर किसी ने तेजाब फेक दिया हो ……जिसमे उसका चेहरा ही नहीं झुलसा बल्कि सारे अरमान भी झुलस गए है |

उसे समझ में आ गया कि इन्जिनीरिंग कॉलेज में पढने  के बाद राजीव का इरादा बदल गया है |

 वहाँ इसकी पसंद की बहुत सारी ज्यादा पढ़ी लिखी लड़कियां मिल जाएँगी जिसे वह जीवन साथी बनाने की सोच सकता है |

राजीव के इनकार भरी बातें  सुनने के बाद उससे और आगे बात करने की उसकी हिम्मत नहीं हुई |

रात जागते हुए कैसे बीत गई उसे पता नहीं चला |

अगली सुबह अनामिका  उठी तो लगा एक साल पहले से जो सपना देख रही थी वो एक दम से अचानक टूट गई और अनामिका भी बिखर गयी थी उन टूटे हुए सपनो के साथ | भींगा हुआ तकिया भी इसकी पुष्टि कर रही थी |

अब तक तो जिस चीज़ पर वो  हाथ रख देती थी,   माँ – बाप पलक झपकते ही उसे लाकर देते थे लेकिन यह तो प्यार का सौदा था ,एक जिद का सौदा था ..जिसे खुद ही तय करना होगा |

मामा जी आज ही अनामिका को वापस गाँव छोड़ने जा रहे थे | अनामिका उनके साथ गाँव जा तो रही थी  लेकिन एक संकल्प के साथ ,… वह मन ही मन एक संकल्प ले चुकी थी  …यही राजीव एक दिन चल कर उसके पास आएगा और मेरा हाथ मुझसे ही मांगेगा….

ट्रेन अपनी तेज़ गति से गंतव्य स्थान की ओर बढ़ रही थी और अनामिका  आँखे बंद किये अपने संकल्प को बार बार याद कर रही थी |

अनामिका अपने घर जैसे ही पहुँची ,पिताजी उसके पास आये और सिर पर हाथ रखते हुए बोले …तुम्हारा स्कूल का रिजल्ट कल ही निकला है और तुम क्लास में सबसे ज्यादा अंक लाई  हो |

मास्टर साहब तुम्हारी खूब तारीफ कर रहे थे | तुमने तो घर का मान प्रतिष्ठा बढ़ा दिया है बेटी | तुमने बेटी होकर भी लड़कों से ज्यादा अंक प्राप्त किया है |

अनामिका पिता जी के पैर छू कर उनका आशीर्वाद लिया और कहा …पिता जी आप से एक अनुरोध करना चाहती  हूँ .|

हाँ – हाँ, बोलो बेटी .., क्या कहना चाहती हो ?…राजेश्वर सिंह उसकी ओर देखते हुआ कहा |

पिता जी मैं आगे भी पढाई जारी रखना चाहती हूँ | अपने गाँव में तो कॉलेज नही है इसलिए मुझे पटना के किसी कॉलेज में दाखिला दिलवा दीजिये ….अनामिका अपना  सिर झुकाए पिता जी से अपनी बात मनवाने की कोशिश कर रही थी |

लेकिन तुम्हे आगे पढाई करने की ज़रुरत क्या है बेटी , कौन सा तुम्हे नौकरी करनी है | घर गृहस्थी का काम सिख लो,  यही तुम्हारे काम आयेंगे ……पिता जी ने उसे समझाते हुए कहा |

नहीं पिता जी,  मुझे आगे पढने की इच्छा है और आप से सहयोग चाहती हूँ …अनामिका विनती भरे लहजे में कहा |

मैंने आज तक तेरी हर इच्छा पूरी की है |  वैसे हमारे पास धन दौलत की कोई कमी नहीं है |

तू तो अपना शादी करके घर बसा ले | तुम्हारे सिवा तो मेरा और कोई नहीं है | तुम्हारी ख़ुशी में ही हमारी ख़ुशी है |

इसीलिए तो कहती हूँ पिताजी, कि मेरी ख़ुशी के लिए मान जाइये ….अनामिका पिता की ओर दयनीय दृष्टी से देखते हुए कहा |

पिता जी बड़ी असमंजस में पड़  गए, और मन ही मन  बोलने लगे …मेरे गाँव की कोई लड़की कॉलेज नहीं गई  और इसीलिए तो यहाँ आज तक कॉलेज नहीं खुला है | शहर पढाई के लिए अकेला कैसे जाने दूँ |

उनकी मनःस्थिति को देख कर अनामिका के मामा  ने कहा …अनामिका चाहे तो मेरे घर पर रह कर कॉलेज की पढाई कर सकती है और वहाँ मन लगाने के लिए इसकी बहन रश्मि भी है | आप निश्चिन्त होकर पटना में दाखिला दिलवा दीजिये |

उनकी बात सुनकर राजेश्वर सिंह अंत में अनामिका की बात मान गए और पटना भेजने के लिए राज़ी हो गए |

पिता जी की सहमती देते ही अनामिका के ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा | अब उसको लग रहा था  कि  जो संकल्प  उसने लिया है उसे पूरा करने के लिए सही दिशा में कदम बढ़ा चुकी है .. /…(क्रमशः)   

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तुम्हारा इंतज़ार है ….1

अनामिका , एक खुशमिजाज जिंदादिल और चुलबुली लड़की थी | अपनी सहेलियों में काफी लोकप्रिय और सबके चेहरे पर मुस्कराहट लाने का हुनर था उसमे |  गाँव के माहौल में रहते हुए भी  खुले विचारो वाली थी इसीलिए उसके कुछ अलग तरह के शौक थे |

उसे दुसरे लड़कियों की तरह ,खाना बनाना या गुड्डे गुडियो का खेल और  घरौंदा बनाने में रूचि  नहीं थी  बल्कि उसे डांस करना , गाना गाना जैसे hobby पसंद थे |

वह हमेशा  खुश रहती थी और रहे भी क्यों नहीं,  माँ बाप की अकेली संतान |

उसके पिता राजेश्वर सिंह  गाँव के बड़े किसान, ऊँची जाती और धन की कोई कमी नहीं | जो कुछ भी फरमाईस करती पलक झपकते उसकी इच्छा को पूरा  कर दिया जाता | अनामिका को ऐसा लगता कि उसकी  जो भी  इच्छा हो  उसे वह पा सकती है |

समय जैसे पंख लगा कर उड़ रहे थे,  अनामिका देखत देखते बचपन की यादों को संजोये जवानी की दहलीज़ पर कदम रख चुकी थी |

उसके पिता राजेश्वर सिंह सुखी संपन्न थे | उन्हें किसी चीज़ की कमी नहीं थी | भगवान् की दया से अच्छी खेती – बारी तो थी ही,  घर में फूल कुमारी जैसी सुन्दर बेटी भी भगवान् ने दी थी |

अगर कुछ कमी थी तो इस बात की  कि उनका गाँव भुसावल  हर मायनों में पिछड़ा होने के साथ साथ  बहुत ही खतरनाक इलाके में था |  इस क्षेत्र में नक्सलवाद पनप  रहा था |

गाँव कुछ इस तरह बदनाम था कि इस गाँव में कोई भी अपने बेटे या बेटी की शादी नहीं करना चाहता था |

कभी कभी इन्सान वक़्त के हाथो मजबूर  हो जाता है | सोचता कुछ है और हो कुछ और जाता है |

अनामिका के स्कूल की गर्मियों की छुट्टी हो गई थी और इस  साल अनामिका इन छुट्टियों  को अपने मामा के यहाँ पटना में बिताने का फैसला किया और पिता जी मान भी गए |

सचमुच पटना का माहौल उसके गाँव के माहौल से बिलकुल भिन्न था | यहाँ बड़े बड़े मॉल, मार्किट , सिनेमाघर और बहुत कुछ मनोरंजन के साधन थे |

गाँव के मुकाबले यहाँ इस शहर की चकाचौंध में  उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा | घर में भी सभी लोग उसे बहुत प्यार करते थे | खासकर मामी तो माँ से भी ज्यादा ख्याल रखती थी |

और उससे भी बड़ी बात कि मामा की लड़की  रश्मि भी थी | वह उम्र में तो  छोटी थी परन्तु वह उसकी ख़ास सहेली थी |   दोनों का खेलना, खाना और मस्ती करना सब साथ साथ होता |

इसी तरह  छुट्टी का एक महिना कैसे बीत गया , उसे पता ही नहीं चला |

इन्ही एक महिना में  यहाँ रहने के दौरान अनामिका की मुलाकात  राजीव से हुई | राजीव के पिता एक  सरकारी दफ्तर में क्लर्क थे और पडोस में ही किराये के मकान में रहते थे | राजीव उनका इकलौता संतान था और  उसके परिवार का इस घर में आना जाना था |

राजीव था तो बहुत ही शर्मीला परन्तु देखने में बहुत सुन्दर और पढने में भी तेज़ था |

अनामिका की  उम्र जवानी  में दस्तक दे चुकी थी और इस उम्र में किसी के प्रति आकर्षित हो जाना कोई अचरज की बात नहीं थी |

अनामिका छुट्टी बिता कर अपने मामा के पास से अपने गाँव आ गई , लेकिन वो  कुछ गुमसुम रहने लगी थी | उसे किसी काम में मन नहीं लगता था |

उसे राजीव भा गया था और वह उससे मन ही मन प्यार करने लगी थी | लेकिन मुसीबत यह थी  कि राजीव इन सब बातों से  अनभिज्ञ था और उसका ध्यान ज्यादातर पढाई पर ही लगा रहता |

आपस में बातचीत तो बहुत होती लेकिन अनामिका को अपने मन की बात कहने की कभी  हिम्मत ही नहीं हुई |

उस ज़माने में अगर किसी लड़की को  कोई लड़का भा गया तो वह मन ही मन प्यार तो कर सकती  थी परन्तु किसी को प्यार के बारे में बताने की हिम्मत नहीं कर पाती थी | क्योकि इसमें ना केवल उसका मजाक बनने का खतरा रहता था बल्कि उसके चरित्र  पर भी ऊँगली उठने  लगते थे |

और दूसरी बात कि पिता जी का भी डर मन में सदा बना रहता था |

तो बस प्यार को मन में रखो और बताओ भी मत | यह उम्र ही कुछ ऐसी थी  कि ज्यादा प्यार के बारे में उसे पता नहीं था, बस ये था कि उसे राजीव  पसंद है |

इधर राजीव इन सब बातों से अनभिज्ञ अपने पढाई पर ध्यान दे रहा था | वो तो बस अपने कैरियर  के प्रति काफी सजग था | उसे पढ़ लिख कर बड़ा इंजिनियर जो  बनना था और अपने माँ बाप के बुढ़ापे का सहारा भी |

वह अक्सर सोचा करता कि मैं ही अपने परिवार का एक मात्र सहारा हूँ और वैसे भी पिता जी बहुत जल्द  रिटायर होने वाले  है | पिता जी को पूरी ज़िन्दगी गरीबी से संघर्ष करते देखा था |  

इसलिए राजीव चाहता था कि अपने पिता को वो सभी सुख सुविधा दें ताकि उनका बुढापा  आराम से बीत सके |

राजीव की मेहनत  रंग लाई और संयोग  से राजीव को पटना में ही इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन मिल गया | और साथ ही साथ उसे  होस्टल में शिफ्ट होना पड़ा था  | होस्टल में रहना आवश्यक था क्योकि आगे की पढाई के लिए काफी मेहनत  करना पड़ेगा |

इधर अनामिका में काफी परिवर्तन आ गया था | अब वह गंभीर रहने लगी और पहले की तरह हंसना-बोलना,  सहेलियों के साथ खेलना कूदना सब कम हो गया था |

वो तो बस अकेले में चुप – चाप बैठ कर अपने किताबों में खोई रहती और उदास दिखती थी | उसका  पढाई में भी मन नहीं लगता था |

अनामिका के मन में बस एक  ही बात चल रही थी, मुझे राजीव बहुत पसंद है पर क्या वो भी मुझे पसंद करता है ? अगर उसने मुझे नापसंद कर दिया तो मैं यह सदमा बर्दास्त ही नहीं कर पाऊँगी | शायद पहला प्यार इसी को कहते है |

राजीव की  बातों से तो कभी भी ऐसा नहीं लगता था कि वो भी मुझे चाहता है | वह तो बहुत ही कम और रुखा रुखा सा बात किया करता है, जैसे उसे प्यार व्यार में कोई दिलचस्पी ही ना हो |

लेकिन मुझे कोशिश नहीं छोडनी चाहिए …, अनामिका स्टडी टेबल पर बैठी सोच रही  थी |

तभी उसके मन में इच्छा हुई कि ठीक है अगली  बार उससे मिलूंगी तो साफ़ साफ़ लफ्जो में उससे अपने मन की बात कह दूंगी |

इधर उसकी माँ अचानक अनामिका को  इस तरह गुम सुम रहते हुए देख कर चिंतित होने  लगी |

बहुत कोशिश करने के बाद भी इसका कारण उसे समझ में नहीं आ रहा था |

आज वह सुबह सुबह चाय लेकर अनामिका के पिता के पास आयी | दोनों चाय पी रहे थे तभी बातों बातों में अनामिका की माँ ने अपनी मन की बात बताते हुए कहा …आज कल पता नहीं क्यों, अनामिका कुछ गुम सुम रहती है | ना ठीक से खाती है  और ना उसमे पहले जैसी  चंचलता  है |

अरे भाग्यवान, अब वो बच्ची नहीं रही अब उसकी उम्र धीर – गंभीर रहने की है | यह तो अच्छी बात है |…….राजेश्वर सिंह ने अपनी पत्नी को समझाते हुए कहा |

नहीं जी, मैं तो माँ हूँ | फिर भी उसके मन की बात नहीं जान पा रही हूँ ….अनामिका की माँ ने दुखी स्वर में कहा |

इसमें कौन सी बड़ी बात है | तुम  सीधा उसी से  पूछ लो …उन्होंने पत्नी की शंका का समाधान बताया |

आप ठीक कहते है,  मैं अनामिका से ही इस मामले में सीधे बात करती हूँ |  जब से वह मेरे भाई के घर से आई है  तब से उसमे  यह परिवर्तन देखने को मिल रहा है … वो  चाय पीते हुए बोल रही थी |

अनामिका आज सुबह जब सो कर उठी तो अपने पिता को कहते सुना कि पटना में मामा जी के यहाँ पूजा है और उन्होंने सब लोगों को बुलावा भेजा है |

यह सुनकर अनामिका मन ही मन  खुश हो गई क्यूंकि  वहाँ राजीव से फिर मिलने का मौका मिलेगा |

उसके चेहरे पर ख़ुशी के भाव देख कर माँ के दिल को तसल्ली हुई |

खेती के कामों में उलझे होने के कारण राजेश्वर सिंह को पूजा में शरीक होने की फुर्सत नहीं थी, इसलिए अनामिका को ही उसके मामा के यहाँ भेजने को पिता जी तैयार हो गए |

अनामिका तो यही चाहती थी | उसके ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा | अचानक बुझी बुझी सी रहने वाली अनामिका के चेहरे पर रौनक आ गई ….क्रमशः |

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वो अनजानी लड़की ..

आज के इस ब्लॉग की बात ही कुछ अलग है,  क्योकि इसमें मैं अपने एक सहपाठी के जीवन में घटी सच्ची  घटना का  वृत्तांत आप सबों  के समक्ष प्रस्तुत करने जा रहा हूँ …

आज की परिवेश में अगर  इस घटना के बारे में सोचा जाए  तो यह थोडा विचित्र और डरावना  सा लगता है |

पर जब यह घटना घटी उस समय  बिहार के कुछ  इलाकों  में इस तरह की घटना का घटित होना एक वास्तविकता थी |

इस संस्मरण के पात्र  ने उपरोक्त घटना का जिस बहादुरी से मुकाबला किया उसके लिए वे सचमुच में बधाई के पात्र  है | 

विमलेश  नाम था उसका,  देखने में बहुत ही शर्मीला लेकिन पढने में उतना ही तेज़ |

मुझे आज भी वह दिन याद है ..24 जुलाई 1977  जब हमलोगों ने रांची एग्रीकल्चर कॉलेज में एडमिशन लिया था और उसके बाद हमलोगों को जो हॉस्टल आवंटित किया गया था उसमे हम दोनों के रूम पास – पास थे |

वह बहुत ही शांत स्वभाव का था और हमेशा अपनी  पढाई  में व्यस्त रहता था |

सिर्फ खाना खाने के लिए ही रूम से निकलता था | उसे देख कर आस पास के रूम के लड़के ना चाहते हुए भी पढाई करने बैठ जाते थे,  क्यों कि trimester sysyem में हमेशा कोई ना कोई परीक्षा  लगा ही रहता था और हमलोगों को रोज़ पढाई करना आवश्यक होता था |

अगर अगले दिन कठिन पेपर की परीक्षा हुई तो सभी विद्यार्थी  सारी  रात पढाई करने में व्यस्त रह जाते  थे … अजीब सा माहौल होता था हॉस्टल का भी |

हम सब जितनी मिहनत से पढाई करते थे  उतना ही मस्ती भी किया करते थे |

वह कॉलेज के शुरुवाती दिन थे और उन दिनों में रैगिंग भी बड़े जोरो की हुआ करती थी |

सीनियर छात्रों  के आदेशानुसार फर्स्ट trimester के छात्रो को डिनर के बाद नौ बजे रात  में  कॉमन रूम में उपस्थित होना पड़ता था जहाँ हमलोगों की तरह तरह से रैगिंग किया जाता था |

कभी कभी तो रैगिंग से परेशान होकर महसूस होता था कि पढाई लिखाई सब छोड़ कर घर वापस चला जाऊँ | पर फिर अपने मन को समझाता …कुछ ही दिनों की तो बात है फिर हम भी आने वाले जूनियर्स का  रैगिंग कर मज़ा लेंगे |

एक दिन हम सभी लोग रैगिंग के लिए पहले से तय अपने उस कॉमन रूम में पहुँच गए | कॉमन रूम क्या था, यह तो बहुत बड़ा हॉल था और हम सभी छात्रों के एकत्र होने के बाद नियमतः रूप से रैगिंग लेने वाले सीनियर्स लोग हमलोगों का attendence लेते थे ताकि कोई चालाकी दिखा कर अपने रूम में  छुप ना जाये |

रात के दस बज रहे थे , हालाँकि हमलोग डिनर ले चुके थे और नींद भी आ रही थी | तभी  बॉस लोगों का हुक्म सुनाई पड़ा …. तुम लोग  सभी बारी बारी से अपने जीवन से घटी कोई ऐसी महत्वपूर्ण घटना को सुनाओ  जिसने तुम्हारे जीवन में गहरा प्रभाव डाला हो |

सब लोग अपने  जीवन से जुडी कोई ना कोई घंटना को सभी के समक्ष सुना  रहे थे | और उनकी सच्ची कहानियों को सुनकर बहुत मज़ा भी आ रहा था |

मैं भी मन ही मन सोच रहा था कि अपने जीवन से जुड़ी कौन सी घटना सुनाया जाये क्योकि अगला नंबर मेरा ही आने वाला था | तभी किसी ने विमलेश  का नाम ले लिया |

इसका मतलब  अब विमलेश को अपनी जीवन से जुडी ऐसी कोई कहानी सुनानी थी |

वैसे वह बहुत शर्मीला किस्म का था लेकिन वहाँ तो सब लोगों के सामने कहानी सुनाना मज़बूरी थी |

वह बेचारा शुरू शुरू में थोडा नर्भस हो रहा था, फिर भी हिम्मत जुटा कर अपने ज़िन्दगी में घटी   एक  महत्वपूर्ण घटना को सुनाना शुरू किया |

अब इस घटना की जानकारी विमलेश की ज़ुंबानी सुनिए ….

बात उन दिनों कि है जब मैं गया कॉलेज में पढता था |  वैसे आप सभी लोग को पता ही है कि मैं जहानाबाद के सूरजपुर गाँव का रहने वाला हूँ |

मेरे पिता जी गाँव के बड़े किसान है |  हमलोगों की गाँव में अच्छी इज्जत प्रतिष्ठा है  और उस पर कि  अगर इस पिछड़ा गाँव से कोई लड़का शहर में पढने चला जाये तो उस घर की इज्जत और भी बढ़ जाती है |

उन दिनों जे पी आन्दोलन बड़े जोरो पर थी और हम सब विद्यार्थी  अपने हॉस्टल में काफी सतर्क और चौकन्ने रहते थे |

दोपहर तीन बजे का समय रहा होगा और मैं खाना खाकर  हॉस्टल के अपने कमरे में आराम कर रहा था | तभी एक देहाती सा  आदमी जो  धोती कुरता पहने हुए था,  मुझे खोजते हुए मेरे रूम तक  पहुँच गया  और दरवाज़ा खटखटा दिया | मैं चौक कर उठा और फिर सोचा शायद कोई दोस्त आया होगा |

मैं उठ कर दरवाज़ा खोला तो देखा वह  ग्रामीण सामने खड़ा था |

मैंने  उससे पूछा …आप कौन है और क्या चाहते है ?

तो उसने ज़बाब दिया .. .हम आपके पिता के दोस्त है और उन्होंने यहाँ आपको बुलाने के लिए भेजा है |

मैंने फिर पूछा …लेकिन मेरे पिता जी कहाँ है और होस्टल में खुद क्यों नहीं आये ?

इसपर उस  आगंतुक ने कहा …वो किसी काम में उलझे  हुए  है इसलिए आप के लिए कार भेजा  है, आप चल कर वही मिल लें |

मुझे पता था कि पिता जी जब भी गाँव से गया शहर आते हैं तो बहुत सारी  पेंडिंग काम भी निपटाते थे |

शायद मेरे पिता जी काम में उलझे होने के कारण यहाँ तक नहीं आ सकें होंगे | ऐसा सोच कर मैं उनके साथ कार में बैठ कर चल दिया |

मैंने सोचा कुछ ही समय में  पिता जी के पास पहुँच जाऊंगा, और उनसे मिल कर उनका हाल समाचार जान लूँगा |

रास्ते  में एक जगह मेरी कार रुकी और देखा कि कार का दरवाजा खोल कर मेरे दोनों तरफ दो हट्ठा कट्ठा  आदमी बैठ गए हैं और फिर कार आगे चल दी |

मुझे उनलोगों को देख कर अजीब महसूस हुआ |  मुझे लगा कि पिता जी पहलवान टाइप आदमी को मेरे पास क्यों भेजेंगे ?

मैंने पूछा …पिता जी कहाँ है ?

मेरे पास बैठा आदमी ने कहा …वहीँ तो जा रहे है |

लेकिन थोड़ी देर के बाद मैंने देखा, मेरी कार तो शहर छोड़ चुकी है और अब हाईवे का रास्ता पकड़ लिया  है |

मुझे समझते देर ना लगी कि मैं किसी मुसीबत में फँस गया हूँ |

मैं काफी घबरा गया था | मुझे पता था कि उन दिनों आपसी रंजिश में बदला लेने के लिए परिवार के किसी सदस्य या उसके बच्चे को सुपारी देकर क़त्ल करा दिया जाता था |

जी हाँ , उन दिनों गया और आसपास के इलाकों में “छह इंच छोटा कर देना” एक मुहावरा  प्रचलित था …छोटा करना यानि गर्दन काट लेना |

हो सकता है मेरे पिता के कोई दुश्मन ने मुझे जान से मारने की सुपारी दी हो |

मेरे मन में ख्याल आया कि, कही सुनसान जगह पाकर मुझे भी मार कर झाड़ियों में फेक देगा |

मैं अपनी मौत को बहुत करीब से देख रहा था | फिर भी हिम्मत कर  मैं उनलोगों का विरोध करने लगा और कहा …मुझे यही उतार दो,  नहीं जाना मुझे अपने पिता जी से मिलने |

इतना सुनना था कि मेरे पास  बैठे एक पहलवान ने पिस्तौल निकाल ली और मुझे दिखाते हुए कहा …चुप चाप बैठे रहो और मेरे साथ चलो , वर्ना अभी  यहीं छह इंच छोटा कर दूंगा |

मैं बहुत डर गया,  जान किसको नहीं प्यारी लगती है | अनायास ही मेरा हाथ मेरी गर्दन पर चला गया और  मैं मन ही मन भगवान् को याद करने लगा और पभु से कहा …मेरी जान बचाओ प्रभु |

तभी अपनी कार हाईवे को छोड़  किसी गाँव की तरफ मुड़ गई |  मुझे तो यह पता था कि मैं किडनैप कर लिया गया हूँ लेकिन किस कारण से मेरा अपहरण हुआ है अभी तक पता नहीं चला था | शायद फिरौती की डिमांड करे |

फिर भी मैं लगातार विरोध  करता रहा,  लेकिन अकेला होने के कारण मैं उनलोगों के चंगुल से निकल नहीं पा रहा था |

मैंने उन लोगों को  डराने के लिए  कहा …  मेरे पिता जी को जैसे ही पता चलेगा , तो तुमलोगों की खैर नहीं |

लेकिन मेरे बातों का उनलोगों पर कोई असर नहीं हो रहा था | वो लोग चुप चाप बैठे थे और कार अपनी  रफ़्तार से भाग रही थी |

शाम बीत चुकी थी और अब अंधियारा घिर आया था |  कार अँधेरी रास्तों से गुजरता हुआ एक गाँव में पहुँचा और एक घर के सामने मेरी कार को  रोक कर मुझे उतरने को कहा गया |

 मैं कार के खिड़की से बाहर देखा …तो सामने एक घर दिखा | घर को रंगीन बल्ब और रौशनी से सजाया गया था और दरवाजे पर शहनाई  वाला शहनाई  बजा रहा था | जैसे लग रहा था  यहाँ कोई शादी होने वाली है |

अब मेरा दिमाग ठनका  | मुझे समझते देर ना लगी कि मुझे किडनैप कर लिया गया है, लेकिन फिरौती के लिए नहीं बल्कि ये लोग मेरी जबरदस्ती शादी कराने के लिए यहाँ लाये है |

अब मुझमे भी थोड़ी सी हिम्मत आ गई क्योकि मुझे महसूस हो रहा था कि ये लोग जान से तो नहीं मारने वाले है |

इसलिए मैंने अपना विरोध और तेज़ कर दिया |  लेकिन वो लोग ज़बरदस्ती मुझे पकड़ कर घर के अन्दर ले गए, जहाँ पहले से ही शादी की पूरी तैयारी कर रखी थी |

पंडित जी भी अपना स्थान ग्रहण किये हुए थे और एक दुल्हन भी मंडप में बैठी थी |

मुझे ज़बरदस्ती नए कपडे पहनाये गए |  माथे पर मौरी सजाया  गया और जबरदस्ती  मंडप में दुल्हन के बगल में बैठा दिया गया |

मेरे बैठते ही पंडित जी ने मंत्र उच्चारण शुरू कर किया  | मैंने  दुल्हन की तरफ एक बार देखने की कोशिश की पर मुँह पूरी तरह ढका हुआ था |

मेरा मन बहुत घबरा रहा था और मैं मंडप में बैठा सोच रहा था कि यह जबरदस्ती की शादी मेरे ज़िन्दगी और भविष्य को बर्बाद कर देगी और  इस घूँघट के पीछे पता नहीं यह “अनजाना लड़की” कौन है और कैसी है ?

 इसे मेरे पिता जी और परिवार वाले स्वीकार कर पाएंगे  या नहीं |  मैं जैसे ही वापस पिता के सामने जाऊंगा तो वो हमें  गुस्से में गोली ही मार देंगे | मेरे पिता जी इस तरह की शादी को अपनी सहमती नहीं दे सकते है  क्योंकि  यह उनके इज्जत प्रतिष्ठा से जुडी बात है |

मैं मन ही मन सोच रहा था कि किसी तरह मौका पाकर यहाँ से भाग जाऊं लेकिन उन लोगों का इंतज़ाम एक दम फुल- प्रूफ था |

मैं इन्ही बातों में उलझा हुआ था, तभी पंडित जी ने कहा …, अब विधि पूर्वक दूल्हा –दुल्हन की शादी संपन्न हुई |

मुझे वहाँ से उठा कर एक रूम में पलंग पर बैठा दिया गया और दुल्हन भी मेरे बगल में बैठी थी |

मैं अब तक उस दुल्हन के चेहरे को नहीं देख पाया था लेकिन मैंने अनुमान लगाया कि लड़की ज़रूर बदसूरत  होगी , इसीलिए तो मुझे किडनैप करके शादी किया जा रहा है |

मैं गुस्से में एक तरफ बैठा था और अपने पिता के गुस्से को याद कर रहा था |

तभी मेरी सास अर्थात दुल्हन की माँ प्रकट हुई और मुझसे कहा …मेहमान जी, आप अभी तक गुस्सा है ? आपने पानी तक नहीं पिया |

मेरे पिता जी मेरा खून पी जायेंगे …मैंने गुस्से में कहा |

सासु माँ हँसते हुए बोली  … हमलोग अनजान लोग नहीं है | आप तो इस लड़की को बचपन से ही जानते है |

क्या आप सुनीता को भूल गए ,? जब आप चाचा के यहाँ  पटना जाते थे तो हमलोग  उनके बगल में ही तो रहते थे | उसी समय आप को देखा तो मन ही मन फैसला कर लिया था कि इसकी शादी आप से ही करेगे | क्योकि इतना सुन्दर लड़का और भरा पूरा परिवार कहाँ मिलेगा ?

जैसे ही सुनीता का नाम मेरे कानो में पड़ा तो बचपन की वो याद ताज़ा हो गई | तब मैं कोई दस साल का था और यह शायद आठ साल की रही होगी |

अब तो बड़ी हो गई है और पता नहीं अब कैसी दिखती होगी |

मैं सोच तो रहा था लेकिन घूँघट उठा कर उसके चेहरे को देखने की हिम्मत नहीं हो रही थी |

मुझे तो बस अपने पिता जी के गुस्से को याद कर दिल घबरा रहा था |

तभी लड़की की माँ ने कहा …, अरे बेटी,  तुम घूँघट तो उठाओ | मेहमान  तुम्हे देखेंगे तो ज़रूर पहचान लेंगे |

माँ के कहने पर सुनीता ने अपना घूँघट उठाया | मैं देख कर दंग रहा गया | आज वह दस साल पहले वाली सुनीता नहीं थी |  वह तो अब  सुन्दर और जवान युवती बन चुकी  थी |

उसे देख कर मन को तसल्ली हुई लेकिन फिर भी पिता जी का डर मन में घूम रहा था |

इसी तरह कुछ दिन वहाँ बीते और फिर उनलोगों ने विदाई का प्रोग्राम तय कर दिया |

इसके लिए गाडी की व्यवस्था की गई | लड़की को दिए जाने वाले सामान को भेजने हेतु एक अलग गाड़ी की व्यवस्था की गई | 

और फिर मुझे अपने गाँव दुल्हन के साथ रवाना  कर दिया गया | मैं जब अपनी पत्नी को लेकर घर पहुँचा तो जिस बात का डर था वही हुआ |

पिताजी गुस्से से आग बबूला थे और मुझे घर में घुसने ही नहीं दिया और कहा ….तुम वापस चले जाओ | अब तुमसे मेरा कोई नाता – रिश्ता नहीं रहा |

अजीब स्थिति थी | गाड़ी वाले सामान उतार  कर जा चुके थे ….और मैं अपनी पत्नी के साथ घर से बाहर  दलान  में बैठा हुआ था |  पत्नी रोये जा रही थी |

फिर गाँव कुछ बड़े बुजुर्ग और खलीफा लोग पिता जी के पास आये और उन्हें समझाया कि अब जो हो गया है उसे स्वीकार करने में ही भलाई है |

 …और इस तरह  से यूँ तो इस घटना का पटाक्षेप हो गया पर मैं इस घटना को आज तक भूल नहीं पाता  हूँ ….

हम कभी मिले नहीं, फिर भी मेरी खबर रखता था

अनजान राहे थी, फिर भी हमें साथ साथ चलना था …

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तलाश अपने सपनों की …17

थानेदार के आश्वासन देने के बाद संदीप ने फैसला किया कि राधिका, रेनू और माँ को लेकर अपने घर में शिफ्ट कर लिया जाए और फिर शाम को ही सबलोग चलने को तैयार हो गए |

सोफ़िया की तो इच्छा नहीं थी कि सब लोग यहाँ से जाए क्योकि उनलोगों के रहने से इतने बड़े घर में उसका अकेलापन दूर हो गया था |

सभी लोगों के साथ हँस बोल कर कैसे समय गुज़र जाता, पता ही नहीं चलता था | लेकिन सामाजिक बदनामी के डर से उनलोगों को रोक नहीं पाई |

उनलोगों को विदा करते हुए सोफ़िया उदास हो गई , लेकिन तभी उसके दिमाग में एक ख्याल आया और वह माँ जी से बोली….अच्छा तो यह होता कि जब तक शादी नहीं हो जाती है तब तक राधिका  यही रहे |

शादी के बाद दुल्हन बन कर आप के पास जाए तो ज्यादा ठीक रहेगा |

वैसे आप जो भी फैसला लेंगी, वो  हमलोग को स्वीकार होगा |

इस पर माँ ने कहा …. तुम तो  उसकी बड़ी बहन हो और इस तरह तो यह राधिका का मायका हुआ | इस हिसाब से तुम्हारा कहना ठीक ही  है | और फिर माँ ने फैसला किया कि शादी तक राधिका यही रहेगी ।

तुम उदास मत हो राधिका  .. हमलोग तो आते – जाते रहेंगे ही |  वैसे भी संदीप रोज़ इस घर में सोफ़िया के बेटे को पढ़ाने आएगा ही …माँ  ने विदा लेते हुए राधिका से कहा |

अपने घर में पहुच कर माँ ने राहत  की सांस ली | अपना घर तो अपना ही होता है …माँ मन ही मन बोली |

दुसरे दिन संदीप सभी लोग के साथ तय समय पर  मैरिज ब्यूरो ऑफिस पहुँच गया | साथ में वकील साहब भी थे. |

संदीप फॉर्म भरकर रजिस्ट्रार के पास जमा कराया , तब रजिस्ट्रार साहब ने दूल्हा – दुल्हन को अपने सामने दस्तखत करने को कहा |

लड़के की तरफ से गवाह के रूप में संदीप की माँ ने और लड़की की तरफ से गवाह के रूप में सोफ़िया ने भी दस्तखत किये |

रजिस्ट्रार साहब ने उस फॉर्म की जांच पड़ताल कर अपनी मुहर लगा दी और फिर नियमानुसार मैरिज सर्टिफिकेट देने के लिए एक माह बाद की तारीख  निश्चित की |

इधर जब राधिका के पिता को पता चला कि संदीप भी आ गया है तो उस पर दबाब बनाने के लिए वे थाने पहुँच गए और थानेदार से FIR पर थाने के द्वारा की गई कार्यवाही की जानकारी चाही |

 तो थानेदार ने बताया …हमने जो तहकीकात किया है और हमारे पास जो सबूत उपलब्ध कराये गए है ..उसके अनुसार यह मामला अपहरण का तो बनता ही नहीं है |  आप की बेटी ने तो लिखित बयान दिया है कि वह अपने मर्ज़ी से घर छोड़ कर गई है |

आप समझने का प्रयास क्यों नहीं करते थानेदार साहब, उनलोगों ने बहला – फुसला कर मेरी बच्ची को मेरे विरूद्ध कर दिया है | अगर आप थोडा सख्ती दिखाएंगे तो वो लोग डर कर मेरी बेटी को मेरे पास भेज देंगे |   

इस पर थानेदार बोला ..माफ़ कीजिये सिंह साहब, आप की बेटी पढ़ी लिखी है और बालिग़ भी है |

अतः बहलाने – फुसलाने की बात कानूनन यहाँ लागू नहीं होती है |

अच्छा तो होता कि आप  अपना केस वापस ले लें, नहीं तो हमलोग वैसे भी इस केस को बंद कर देंगे |

इधर संदीप सुबह सुबह तैयार हो रहा था तभी माँ के पूछा …इस वक़्त कहाँ जा रहे हो ?

सोच रहा हूँ कि आज मैं स्कूल वाली नौकरी ज्वाइन कर लूँ | इससे मेरा समय भी पास होगा और कुछ पैसे भी घर आएंगे…..संदीप ने अपनी मन की बात कह दी |

संदीप का स्कूल में और फिर सोफ़िया के यहाँ ट्यूशन करके समय अच्छा बीतने लगा और घर में  खुशहाली का माहौल हो गया था |

इस तरह से ठीक ठाक समय व्यतीत हो रहे थे |

रेनू आज बहुत खुश नज़र आ रही थी और सुबह सुबह चाय ला कर भाई को देते हुए कहा ….आज तो ज़ल्दी उठो , और अच्छे से तैयार हो जाओ |

क्यों ? आज क्या ख़ास  बात है …संदीप चाय लेते हुए रेणु से पूछा |

तुम्हे तो कुछ याद रहता ही नहीं है | आज तुम्हारी शादी होने वाली है …रेनू ने चहकते हुए कहा  |

अरे हाँ, आज तो मैरिज ब्यूरो ऑफिस जाना है, मैं तो भूल ही गया था  ….संदीप जल्दी जल्दी चाय पीते हुए बोला |

माँ ने अपनी संदूक से लाल साड़ी और कुछ गहने एक बैग में रख ली और सबलोग तैयार होकर  सोफ़िया के घर पहुँच गए |

वहाँ माँ ने अपने बैग से साड़ी  और गहने निकाल कर राधिका को पहनाया और उसे दुल्हन के वेश में तैयार किया |

राधिका को दुल्हन के वेश  में देख कर माँ ने नज़र उतारते हुए कहा …नज़र ना लगे किसी की |

माँ की बातें सुन कर राधिका शरमा गई और ज़ल्दी से माँ के पैर छू लिए | माँ से उसके सिर पर हाथ रख कर सदा सुहागन रहने का आशीर्वाद दिया |

सबलोग एक साथ सोफ़िया के घर से निकले और थोड़ी देर में  ही  मैरिज ब्यूरो ऑफिस पहुँच गए |

वहाँ  ऑफिस में बहुत भीड़ थी और संदीप का नंबर तीसरा था | इसलिए संदीप अपने परिवार के साथ एक तरफ बैठ कर अपने नम्बर आने का इंतज़ार करने लगा तभी वकील साहब भी आ गए |

करीब एक घंटा इंतज़ार करने के बाद रजिस्ट्रार साहब ने संदीप और राधिका को अपने पास बुलाया |

संदीप सभी लोग को लेकर रजिस्टार साहब के समक्ष हाज़िर हो गया  |

पहले तो उन्होंने दोनों को शादी की बधाई दी और कहा ….आपलोग एक दुसरे को माला  पहनाएँ |

सोफ़िया अपने साथ माला लेकर आई थी अतः उन्दोनो को एक एक माला दे दी |

दोनों ने एक दुसरे को माला पहनाया | उसके बाद रजिस्ट्रार साहब ने दोनों को मैरिज सर्टिफिकेट दिया और कहा ..आज से आप दोनों पति – पत्नी हो गए | सभी उपस्थित लोग उन दोनों को बधाई और आशीर्वाद देने लगे और खुश दिख रहे थे ।

संदीप सभी को लेकर रजिस्ट्रार के चैम्बर से निकल कर बाहर आया  जहाँ फोटोग्राफर उनलोगों का फोटो खीचने के लिए तैयार था |  फोटोग्राफर ने ग्रुप फोटो के लिए आग्रह किया  और सब लोग जल्दी से दूल्हा दुल्हन से साथ खड़े हो गए |

जैसे ही फोटोग्राफर अपने कमरे को  click करने जा रहा था …तभी पीछे से एक आवाज़ आयी  ..अरे ठहरो, मैं भी आ रही हूँ. | सब लोगों ने  पीछे मुड कर देखा तो पाया कि राधिका की माँ तेज़ी से इस तरफ भागी चली आ रही है |

राधिका आश्चर्य से माँ को देखा , उसे अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था |  माँ के पास आते ही राधिका और संदीप दोनों ने माँ के पैर छुए तो माँ ने आशीर्वाद दिया और अपने  गले से सोने का हार  उतार  कर राधिका को पहना दिया |

राधिका की नज़रे इधर – उधर ढूंढते हुए माँ से पूछा …क्या, पिता जी हमें आशीर्वाद देने नहीं आए ?

वो देखो बेटी , सामने खड़े वहाँ तुमलोगों का इंतज़ार कर रहे है, जाओ उनसे भी आशीर्वाद ले लो |

राधिका ने जब देखा कि कुछ दूर पर पिता जी खड़े है तो सब को छोड़ कर दौड़ते हुए अपने  पिता के पास पहुँची और आँखों में आंसूं लिए पिता के गले लग  गई और कहा ….मुझे माफ़ कर दीजिये पिता जी. …मैंने आप का बहुत दिल दुखाया है |

नहीं बेटी,  तुमने बिलकुल सही निर्णय लिया है |  तुमने मेरे आँखों  पर  झूठी  शान और प्रतिष्ठा की पट्टी जो पड़ी थी उसे हटा दिया और  यह एहसास करा दिया कि ज़िन्दगी में  ख़ुशी लोगों में ख़ुशी बांटने से मिलती है |

उन्होंने संदीप को भी आशीर्वाद दिया और  कहा …मैं तुम्हारे लिए कुछ ज्यादा तो नहीं ला सका , यह मेरी तरफ से छोटी सी भेट स्वीकार करो |

संदीप उनसे गिफ्ट का पैकेट लेते हुए सोच रहा था कि काश यह रजामंदी पहले हो गयी होती तो मेरी नौकरी भी बच जाती | वह झुक कर अपने ससुर के पैर छुए और आशीर्वाद लिया |

उसके बाद दूल्हा दुल्हन ने अपने सभी परिवार वालों के साथ फोटो खिचवाने लगे  तभी संदीप के  मोबाइल  की घंटी बज उठी |

संदीप की नज़र मोबाइल पर पड़ी तो पाया कि यह नंबर तो उसके बॉस नीलम मैडम का है | उसने जल्दी से फ़ोन उठाया और कहा …गुड मोर्निंग मैडम | आप कैसी है ?

मैं ठीक हूँ संदीप,  आज तो तुम्हारी शादी थी ना ?

जी मैडम,  अभी अभी हमलोग शादी के बंधन में बंध गए है …संदीप खुश होते हुए कहा |

इस पर नीलम मैडम ने कहा …. बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं  |

थैंक यू मैडम | साथ में  संदीप ने मैडम को यह भी बताया कि मेरे परिवार के अलावा  राधिका के माता पिता भी यहाँ उपस्थित है |

अरे वाह, यह तो और भी  ख़ुशी की बात है ….मैडम ने कहा |

और सुनो, एक गिफ्ट हमारे और यहाँ के सारे स्टाफ के तरफ से खुशख़बरी के रूप में तुम्हे देने जा रही हूँ |

वह क्या है मैडम ? …संदीप ने उत्सुकता से पूछा |

तुम्हारी नौकरी  फिर से बहाल  हो गई है, एक सप्ताह के भीतर यहाँ आकर तुम्हे नौकरी ज्वाइन करनी है |

क्या आप सच बोल रही है मैडम, ….यह कैसे हुआ ?…..संदीप आश्चर्य प्रकट करते हुए पूछा |

तुमने जो अपने प्यार के लिए नौकरी की कुर्बानी दी ..उससे हम सभी स्टाफ काफी प्रभावित हुए और फिर हमलोगों ने निर्णय लिया कि तुम्हारी मदद के लिए और फिर से तुम्हारी नौकरी बहाल करवाने के लिए एक कैम्पेन चलाया जाए ।

हमलोग का कैम्पेन रंग लाया और तुम्हारी कहानी जब कंपनी के डायरेक्टर साहब ने सुनी तो वो भी काफी प्रभावित हुए और  कंपनी ने तुम्हारे performance और sincerety को भी ध्यान में रखा और फिर यह निर्णय लिया कि तुम्हे नौकरी में वापस ले लिया जाये |

थैंक यू  मैडम …संदीप खुश होकर बोला |

और हाँ एक खुश खबरी  और सुनो …जब यहाँ आना तो अपनी श्रीमती जी को भी साथ ले कर आना |.

तुमलोगों के लिए कंपनी के तरफ से एक family फ्लैट  की व्यवस्था की गई है …

फ़ोन समाप्त करने के बाद संदीप ने यह खुश खबरी सभी को सुनाई तो सब लोग ख़ुशी से उछल  पड़े |

संदीप मन ही मन सोच रहा था …. जिस सपने की उसे तलाश थी वह आज पूरा हो रहा है …सच, उसका  सपना आज सच हो रहा है ,,…(समाप्त)

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तलाश अपने सपनों की …16

भला हो उस  इंसान का जिसने ना सिर्फ संदीप के ट्रेन का टिकट कटा दिया, बल्कि इतनी भीड़ – भाड़ वाली बोगी में बैठने के लिए जगह  भी दिया | उसी के साथ बात करते हुए दो दिनों का सफ़र कैसे बीत गया ,पता ही नहीं चला |

सुबह के सात बज रहे थे और ट्रेन बिलकुल सही समय पर अपने  गंतव्य स्टेशन पर पहुँच गया |

संदीप ने सफ़र के उस साथी को धन्यवाद दिया और अपना  बैग लेकर प्लार्फोर्म नम्बर एक पर उतर गया |

प्लेटफार्म के बाहर ज्योंही निकला सामने बजरंग बाली के  मंदिर पर उसकी नज़र पड़ी | वह भगवान् के मंदिर में माथा टेकने  पहुँच गया |

उसी समय उसके मोबाइल पर रिंग टोन सुनाई पड़ा | शायद कोई मेसेज आया होगा …ऐसा सोच कर संदीप मोबाइल के मेसेज को चेक किया तो चौक गया |

जिसका डर था वही हुआ …सच, संदीप की नौकरी चली गयी | बिना छुट्टी स्वीकृति के ऑफिस छोड़ने के कारण उसके विरूद्ध कार्यवाही के तहत उसे बर्खास्त कर दिया गया था |

वह मंदिर परिसर में ही सिर पकड़ कर बैठ गया और आँखों में आँसू लिए भगवान् की तरफ देखा |

वह भगवान् के समक्ष हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया और मन ही मन कहा …और कितने परीक्षा लोगे   प्रभु | अब तो अपनी कृपा दिखाओ |

वह मंदिर से निकल कर दुखी मन से सोफ़िया के घर की ओर चल दिया | उसे पता था कि घर के सभी लोग उसी के पास है |

सोफ़िया का घर स्टेशन से कुछ ही दूर पर था , इसलिए रिक्शा से तुरंत ही पहुँच गया |

सबसे पहले संदीप की नज़र अपनी माँ पर पड़ी और उसने माँ पैर छू लिए | माँ ने आशीर्वाद दिया और साथ ही पूछ लिया….तू उदास क्यों है बेटा ?  घर आकर तो लोग खुश होते है |

हाँ माँ, अभी अभी कंपनी से मेसेज आया है | उन्होंने मुझे नौकरी  से निकाल दिया है …संदीप दुखी स्वर में बोला |

लेकिन क्यों?….माँ ने आश्चर्य से पूछा |

प्रोबेशन में छुट्टी का नियम नहीं है और मैं बिना छुट्टी के ही घर आ गया |

बातें हो ही रही थी कि सभी लोग वहाँ इकट्ठा हो गए और इस समाचार को सुन कर दुखी हो गए |

थोड़ी देर के लिए बिलकुल सन्नाटा छा गया | एक और दुःख का पहाड़ टूट पड़ा था |

कितनी मुश्किल से यह नौकरी मिली थी और मेरे कारण तुम्हारी वो नौकरी चली गई…राधिका ने दुखी होते हुए कहा |

नहीं राधिका, इसमें तुम्हारा क्या दोष है ? वक़्त के आगे सभी लोग मजबूर होते है | अभी बुरा वक़्त चल रहा है तो क्या हुआ | फिर अच्छा वक़्त भी आएगा ….संदीप ने राधिका की ओर देख कर कहा |

चलो भैया ,पहले नहा – धो कर कुछ खा लो | इस कठिन यात्रा से थकान हो गई होगी ….रेनू तौलिया देते हुए संदीप से बोली |

संदीप कपडे लेकर बाथरूम में चला गया तभी घर का कॉल बेल बज उठा | सभी कोई आशंका से एक दुसरे को देखने लगे | जब बुरा वक़्त चल रहा होता है ना ..तो दिमाग में सारे  नकारात्मक और उल्टे ख्याल ही आते है |

खैर , सोफ़िया ने जाकर दरवाज़ा खोला तो वकील साहब सामने खड़े थे | उनको देख कर सोफ़िया ने राहत की सांस ली  और कहा….अच्छा हुआ आप भी  आ गए | मैं आप को ही फ़ोन करने वाली थी |

मैं तो यह बताने आया था  कि सारे कागजात थानेदार को दे आया हूँ और वो किसी भी समय तहकीकात करने के लिए यहाँ आ सकते है … वकील साहब ने  सोफे पर बैठते हुए कहा |

ठीक है वकील साहब, मैं चाय लेकर आती हूँ….बोल कर सोफ़िया किचन में चली गई |

थोड़ी देर के बाद सोफ़िया चाय लेकर आई और तब तक संदीप और  बाकि लोग भी आकर वकील साहब के सामने बैठ गए |

थाना में जमा किये गए कागजात की कॉपी सोफ़िया को देते हुए वकील साहब ने कहा  …आप लोग इसे ध्यान से पढ़ कर समझ लीजिये | जब थानेदार साहब तहकीकात के समय कुछ पूछे तो वैसा ही ज़बाब देना है |

संदीप कागज लेकर ध्यान से देखने लगा और फिर बोला…यह तो ज़बाब सही दिया गया है , लेकिन राधिका के पिता अगर पुलिस को पैसे खिला कर हमलोगों को परेशान करने की कोशिश करेंगे तब हमें क्या करना होगा ?

इस बार सोफ़िया ने कहा …इन सब बातों का बस  एक ही जबाब है , तुम जितनी जल्द हो सके मैरिज ब्यूरो में अपना मैरिज रजिस्टर्ड करवा लो |

बिलकुल ठीक कह रही है सोफ़िया जी …वकील साहब  संदीप की ओर देखते हुए कहा |

संदीप बोला ….मैं तो चाहता हूँ कि राधिका को लेकर उसके पिता के पास एक बार जाऊँ और उनसे ही राधिका  का हाँथ मांग लूँ | शायद उनका गुस्सा शांत हो जाए और वो तैयार हो जाएँ |

नहीं नहीं,  ऐसा मत करना, वह इस रिश्ते को कभी नहीं मानेंगे …माँ ने तो साफ़ मना कर दिया |

काफी माथा पच्ची करने के बाद अंत में सब लोग इसी नतीजे पर पहुँचे कि रजिस्टर्ड – मैरिज करना ही इस समस्या का समाधान है |

लेकिन अभी तो मैं बेरोजगार हूँ , राधिका हमसे शादी क्यों करेगी …संदीप ने मज़ाक से कहा |

अभी मजाक करने का समय नहीं हैं संदीप  ….राधिका नाराज़ होते हुए बोली |

तभी कॉल बेल की आवाज़ सुनाई दी और सभी लोग शांत हो कर उस ओर देखने लगे |

सोफ़िया ने जाकर दरवाज़ा खोला तो देखा,  सामने थानेदार साहब खड़े है |

वकील साहेब को वहाँ  देख कर थानेदार साहब बोल पड़े …..आप भी यहाँ मौजूद है ?

जी थानेदार साहब , हमने तो पुरे पेपर थाना में ज़मा करवा दिए थे …वकील साहब ने कहा |

इसलिए तो तहकीकात करने आये है …थानेदार साहब ने जबाब दिया |

थानेदार भला आदमी लग रहा था,  उन्होंने बारी बारी से सब लोगों के बयान को कलमबद्ध किया |

तभी चाय आ गई और सभी लोग चाय पिने लगे |

चाय पिने के बाद संदीप के  बयान की बारी आई | संदीप ने कहा …मुझ पर राधिका के अपहरण का इल्जाम तो बिलकुल झूठा है | मैं तो आज ही मुंबई से आया हूँ और सबूत के तौर पर ट्रेन का टिकट और कंपनी द्वारा भेजे गए  अपने मोबाइल पर मेसेज को भी दिखाया |

आप इसका भी प्रिंट निकाल कर अपने बयान के साथ मुझे दीजिये | मुझे अब पूरा मामला समझ में आ चूका है |  राधिका के पिता ने आप सब लोगों को परेशान करने के लिए यह झूठी शिकायत दर्ज कराई है |

सभी का बयान लेने के बाद थानेदार साहब उठ कर चलने लगे | तभी संदीप ने उनसे पूछा …अब मुझे अपने घर में रहने में कोई परेशानी तो नहीं होगी ?

नहीं नहीं , आप आराम से अपने घर में जाकर रहिये …थानेदार साहब ने आश्वासन दिया | 

ठीक है थानेदार साहब , हम कल ही संदीप के मोबाइल का प्रिंट और ज़रूरी कागजात आप के पास जमा करा देंगे….सोफ़िया ने कहा और थानेदार को गेट तक छोड़ने आई | थान्रेदार जब जाने लगा तो सोफ़िया ने एक पैकेट थानेदार के हाथो में चुपके से थमाई  और कहा ….यह चाय पानी  के लिए है |  इसे आप  रख लीजिये |

थानेदार ख़ुशी ख़ुशी चला गया और सोफ़िया ने राहत की सांस ली |

अन्दर आते ही सोफ़िया  अपने वकील से बोली…राधिका मेरी बहन है ,इसे किसी भी तरह की परेशानी नहीं होनी चाहिए | आप ज़रूरी कागजात बना कर थाना और कोर्ट जहाँ भी ज़रुरत पड़े आप प्रस्तुत कीजिये ताकि हमलोगों  किसी भी तरह से क़ानूनी  झंझट  से दूर रह सकें  |

एक बात और , अब संदीप भी आ ही चूका है तो कल ही मैरिज ब्यूरो में रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन भी जमा करवा दीजिये |

लेकिन सोफ़िया जी,   कोर्ट, थाना और मैरिज के चक्कर में तो काफी पैसो की ज़रुरत पड़ेगी और अब तो मेरी नौकरी भी नहीं रही |

देखो संदीप, अब मैं भी अपने को तुम्हारे घर का ही सदस्य समझती हूँ | इसलिए इन सब बातों की चिंता तुम मत करो | मैं तुम लोगों से बड़ी हूँ , इसलिए बड़ी बहन का फ़र्ज़ अदा करने दो …सोफ़िया ने  भावुक हो कर कहा |

मैंने तो बेकार में ही तुम पर शक किया था …राधिका ने प्यार से सोफ़िया को देख कर कहा |

चलो अच्छा है, तुम्हारी वहम तो दूर हो गई | और हाँ एक प्लान और है मेरे पास ..सोफ़िया ने संदीप की ओर देखते हुए कहा |

संदीप आश्चर्य से सोफ़िया की ओर देख कर पूछा… कैसा प्लान ?

मैंने अपने बेटे के स्कूल के प्रिसिपल से तुम्हारी  नौकरी की बात पक्की कर ली है | तुम चाहो तो कल से ही वहाँ ज्वाइन कर सकते हो …सोफ़िया खुश हो कर बोली |

कल से मुझे भी अंकल पढ़ाना  शुरू करेंगे क्या ?……..सोफ़िया का बेटा बीच में बोल पड़ा |

हाँ हाँ,  क्यों नहीं….मैं तो आज से ही तुम्हे पढ़ाना शुरू कर देता हूँ …संदीप उसके सिर पर प्यार से हाथ रख कर कहा |

आज तो तुम खुद ही यात्रा से काफी थक चुके हो,  मेरा राजा बेटा कल से पढ़ेगा ….सोफ़िया बेटे को समझाते हुए बोली |

संदीप सोफ़िया से कहा ….सच, आप ने तो हर कदम पर मुझे मदद किया है चाहे मेरी समस्या हो या मेरे परिवार की | आप का यह उपकार हमेशा याद रखूँगा  |

और संदीप अपने परिवार को लेकर अपने घर जाने को तैयार हो गया |

सोफ़िया की इच्छा नहीं थी कि संदीप परिवार को लेकर अपने घर चला जाये, लेकिन सामाजिक बदनामी के कारण उनलोगों को रोक नहीं सकी …(क्रमशः) |

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तलाश अपने सपनों की …15

तलाश अपने सपनों की …15

अँधेरा क्या छाता है

परछाइयां भी दगा दे जाती है

टूटता है विश्वास तो

चनक सी सीने में होती है

यूँ तो पोछ लेते हैं आँसुओं को

पर, वह ज़ख्म तो सदा हरी होती है …

जब राधिका के बहुत कोशिश के बाबजूद  भी माँ अपने घर छोड़ने को राज़ी नहीं हुई तो अंत में हार कर राधिका ने कहा …आप सब लोगों की परेशानियों की जड़  मैं ही हूँ , इसलिए मुझे ही पिता जी के पास लौट जाना चाहिए |

इतना सुनना था कि माँ ने राधिका की तरफ गुस्से से देखा और कहा …तुम्हारी इस तरह की बातें हमलोग को कमज़ोर बना देती है |

एक बात कान खोल कर सुन लो, मरना तो एक दिन सबको है | लेकिन जितना दिन भी जिएं, सिर उठा कर अपनी मर्ज़ी और ख़ुशी से जिएं, वर्ना जिंदा तो जानवर भी रहतें है |

मैं तो तुम्हारे साथ इसलिए जाना  नहीं चाहती थी कि मेरे कारण तुम मुसीबत में ना पड़ जाओ ….माँ ने भावुक हो कर कहा |

इस पर सोफ़िया ने कहा ….नहीं माँ,  हमलोग अपने वकील से बात कर कानून के तहत अपनी सुरक्षा के उपाय करेंगे | वैसे भी दो दिनों में संदीप भी आ जायेगा, फिर हमलोग आगे की रणनीति बनायेंगे |

बातों बातों में काफी समय निकल चूका था और आशंका थी कि राधिका के पिता थाने में इत्तला कर चुके होंगे, इसलिए राधिका को लेकर ज़ल्द ही यहाँ से निकलना चाहिए …रेनू ने कहा |

और तुरंत ही सभी लोग सोफ़िया के साथ कार में बैठ कर उसके घर की ओर चल दिए |

सोफ़िया का घर तो बहुत बड़ा था और सबलोगों के आ जाने से उसका घर एक बड़ा परिवार की तरह हो गया और वह बहुत खुश नज़र आ रही थी |

सोफ़िया के साथ रेनू और राधिका मिल कर ब्रेकफास्ट तैयार किया और सबलोग एक साथ डाइनिंग टेबल पर बैठ कर खाने लगे और गप्पे मारने लगे |

माँ ने  कहा …इसी तरह मिलकर सभी लोग रहे तो एक भरा पूरा परिवार में रहने का अपना अलग ही आनंद है |

भगवान् ने चाहा तो ज़ल्द ही सब ठीक तो जायेगा और मेरी  बचपन की सहेली राधिका को दुल्हन के रूप में हम लोग देख सकेंगे …सोफ़िया ने राधिका को छेड़ते हुए कहा |

तभी  किसी ने घर का कॉल बेल बजा दिया | अचानक सबके चेहरे से हँसी गायब हो गयी |

आशंका थी कि राधिका के पिता यहाँ पुलिस को लेकर आये होंगे | सभी एक दुसरे का चेहरा देखने लगे | फिर हिम्मत कर के सोफ़िया ने जाकर दरवाज़ा खोला तो राहत की सांस ली, … सामने उसके वकील साहब खड़े थे |

सोफ़िया ने वकील साहब को  ड्राइंग रूम  में सोफे पर बैठाया और अन्दर जाकर  बोली….घबराने  की कोई बात नहीं है,  मेरे वकील साहब आये है |

चलो ,ज़ल्दी नास्ता समाप्त कर वकील साहब के पास सलाह मशवीरा के लिए चलते है |

थोड़ी ही देर में, सोफ़िया चाय लाकर वकील साहब को दी और सभी लोग आकर उनके सामने बैठ गए |

सोफ़िया ने सभी लोगों का परिचय कराया और फिर पूछा …अगर राधिका के पिता पुलिस  में अपनी बेटी के अपहरण का मामला बना कर हमलोगों को फँसा दिया तो उससे कैसे बच सकते है |

मैं आपलोगों को बताना  चाहता हूँ कि आप किसी तरह की  चिंता ना करें |  यहाँ के सिटी एस पी से मेरी जान पहचान है | उनके रहने से कोई भी थानेदार या पुलिस किसी के दबाब में आकर हमलोगों पर अनुचित कार्यवाही नहीं कर सकती …वकील साहब ने वहाँ उपस्थित लोगों की हिम्मत बढाई |

तभी सोफ़िया ने कहा ….फिर भी आप थाना में जा कर यह सुनिश्चित कर लें कि कही राधिका के पिता ने वहाँ हमलोगों के खिलाफ कोई शिकायत तो दर्ज नहीं करा दी  है |

ठीक है सोफ़िया जी , मैं यहाँ से सीधा थाना जाकर पता करता हूँ और जैसा होगा आपको फ़ोन पर सूचित कर दूंगा …इतना कह कर वकील साहब चल दिए |

दूसरी तरफ राधिका के पिता राम बलि सिंह बहुत गुस्से में नज़र आ रहे थे | उन्हें गुस्सा इस बात का था कि राधिका के कारण समाज में उनकी काफी बदनामी हो रही थी |

आज ही के दिन लड़के वाले राधिका को देखने वाले थे, लेकिन उनलोगों को मज़बूरी में बहाना बना कर मना करना पड़ा कि राधिका  बीमार है और किसी तरह आज का कार्यक्रम रद्द करना पड़ा | लेकिन कब तक उनसे बहाना बनाते रहेंगे |

 वे गुस्से में अपने आप से बातें करते हुए कमरे में टहल रहे थे |

अचानक उनके मन में विचार आया कि क्यों नहीं बेटी के अपहरण का आरोप लगा कर संदीप के परिवार वालों पर FIR कर दिया जाये |

हो सकता है, पुलिस के डर से राधिका अपने घर आने को मजबूर हो जाये |  फिर तो  देर ना करते हुए वे  थाने में आकर संदीप के परिवार वालों के विरूद्ध FIR  दर्ज करवा ही दी |

वकील साहब जब थाने पहुंचे  तब तक राधिका के पिता थाने से निकल चुके थे |

जब वकील साहेब ने थानेदार  साहब से पूछा …क्या कोई राधिका के अपहरण की  शिकायत दर्ज की गई है ?

ज़बाब में थानेदार ने कहा …अभी अभी तो राम बलि सिंह राधिका के अपहरण का FIR लिखा कर गए है |

FIR में नामज़द कौन है …वकील साहब  ने पूछा |

आप उसकी नक़ल निकलवा लें और खुद ही देंखे किन लोगों का नाम है |

वकील साहब तुरंत नक़ल निकलवा ली और बारीकी से उसका अध्ययन किया तो पाया कि संदीप और उसके परिवार के सभी सदस्यों के नाम है |

वकील साहब ने थानेदार से कहा …थानेदार साहब संदीप तो मुंबई में है , फिर उसे नामजद कैसे बनाया गया |

और रही बात अपहरण की तो मैं आप को बता दूँ कि राधिका खुद ही बालिग है और अपनी मर्जी से घर छोड़ दी है, क्योंकि उसके पिता राधिका के मर्ज़ी के खिलाफ उसकी  शादी करना चाहते थे |

ज़बाब में थानेदार ने कहा ….देखिये यह तो तहकीकात का मामला है और FIR की कॉपी के साथ उनका ज़बाब और राधिका के बालिग होने का प्रमाण पत्र के साथ यहाँ  थाने में जमा कराएँ | उसके बाद हम तहकीकात करेंगे |

वकील साहब थाना में बैठे बैठे ही सिफिया को फ़ोन लगा कर सारी बातों की जानकारी दे दी और कहा….  FIR की नक़ल निकाल  लिया हूँ | आप ज़रूरी कागजात तैयार कर लीजिये मैं कल ही आकर इस FIR का ज़बाब तैयार कर लेता हूँ |

इधर संदीप छुट्टी स्वीकृत नहीं होने से काफी दुखी था | एक तरफ राधिका के प्रति उसका स्नेह और दूसरी तरफ नौकरी | फैसला लेना आसान नहीं था |

फिर भी उसका दिल कह रहा था …नौकरी तो फिर भी दूसरी मिल जाएगी लेकिन राधिका का त्याग करना तो मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है |

संदीप इन सब बातों को सोचता हुआ मुंबई रेलवे स्टेशन पहुँच गया,  क्योकि अभी ना तो प्लेन का टिकट और ना ही ट्रेन का रिजर्वेशन मिल पा रहा था | फिर भी घर तो किसी भी तरह पहुँचना ही था | वह बिना रिजर्वेशन के ही सफ़र करने का फैसला कर चूका था | हालाँकि संदीप को पता है कि इस सफ़र में परेशानी तो बहुत होगी लेकिन जो परेशानी राधिका को इस समय झेलनी पड़ रही है उसके मुकाबले तो कुछ भी नहीं  |

स्टेशन पहुँच कर संदीप सबसे पहले टिकट टिकट लेने हेतु  टिकट काउंटर की ओर गया तो पाया कि करंट बुकिंग में बहुत लम्बी लाइन है | ज्यादातर लोग मजदूर वर्ग के थे जो लाइन में खड़े होकर धक्का मुक्की कर रहे थे |

इसे देख कर संदीप को  हवाई जहाज की वो पहली  यात्रा याद आ गई, कितना शकुन भरा था  | हवाई  सफ़र का अलग ही आनंद है | लेकिन अभी यहाँ की समस्या से कैसे निपटा जाये वो खड़े हो कर यही सोच रहा था |

संदीप ने सोचा ….इतने दिनों से लेबर मजदूर के साथ काम कर रहा हूँ और उनसे काम कैसे लिया जाये उससे मैं भली भांति वाकिफ हूँ | तो क्यों ना वही नुस्खा यहाँ भी आजमाया जाए |

 उसने एक मजदूर भाई को पटाया और उसे अपने साथ साथ उसका भी टिकट लेने का निवेदन किया | यह सच है,  परदेश में अपने जिला ज़वार का कोई मिल जाता है तो उससे अपनापन हो ही जाता है और उसी का फायदा उठा कर संदीप ने अपना टिकट बिना परेशानी के ले सका |

जब ट्रेन जैसे ही प्लेटफार्म पर पहुँची तो लोग ट्रेन में चढ़ने के लिए दौड़ पड़े |

सीट पर कब्ज़ा करने के लिए सब लोग धक्का मुक्की कर रहे थे | साधारण बोगी होने के कारण अफरा तफरी सा माहौल हो गया |

संदीप  कुछ देर तक यूँही खड़ा देखता रहा | उसकी हिम्मत नहीं हो  रही थी कि वह बोगी में चढ़े  क्योकि बहुत सारे लोग गेट को जाम कर रखा था  |

कुछ देर के बाद जब अफरा – तफरी कम हुई तो वह ट्रेन में किसी तरह घुस सका |

बोगी के भीतर खचाखच भीड़ थी,  जितने लोग सीट पर बैठे थे उससे ज्यादा लोग खड़े थे |

संदीप वहाँ खड़ा खड़ा सोच रहा था कि इतनी दूर की यात्रा कैसे कर पायेगा ,  तभी उसके कानो में पहचानी सी आवाज़ पड़ी …भाई साहब इधर आ जाइये| आप के लिए मैंने सीट रोक रखी  है |

उसने पलट कर देखा और खुश हो गया | आवाज़ देने वाला और कोई नहीं बल्कि  वही आदमी था जिसने उसका टिकट कटाया था  |

संदीप  अपनी सीट पर बैठा और भगवान् के साथ साथ उसे भी धन्यवाद दिया | और फिर उसके साथ बातचीत  करते हुए रास्ता कैसे कट गया पता ही नहीं चला ….(क्रमशः)

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तलाश अपने सपनों की ….14

तलाश अपने सपनों की ….14

सुबह सुबह राधिका के पिता संदीप के घर अपनी बेटी राधिका को ढूंढते हुए आ धमके |

संदीप की माँ सीधे मुकर गई और कहा कि  राधिका उसके पास नहीं है |

लेकिन उसके पिता को पूरा विश्वास था कि वो झूठ बोल रही है |

इसीलिए गुस्से में धमकाते हुए उन्होंने कहा …. एक घंटे के भीतर राधिका वापस अपने घर नहीं आती है तो अपहरण के इल्जाम में इस घर के सभी लोगों को जेल भिजवा दूंगा |

ऐसी बातें सुन कर रेनू काफी डर गई | अभी सुबह के सात ही बज रहे थे, लेकिन रेनू ने घबरा कर सोफ़िया को फ़ोन मिला दिया |

सोफ़िया अभी सो रही थी तभी उसकी फ़ोन की घंटी बज उठी और उसकी नींद अचानक ही खुल गई |

उसने फ़ोन को उठा कर ज्योही देखा कि रेनू का नंबर है तो चौंक कर उठ बैठी |

उसे समझते देर नहीं लगी कि अभी सुबह सुबह वहाँ कोई झमेला हुआ होगा | इसलिए फ़ोन उठा कर सोफ़िया ने जल्दी से पूछा …क्या बात है रेनू ? वहाँ सब ठीक तो है ना ?

नहीं सोफ़िया जी, यहाँ तो कुछ भी ठीक नहीं है | अभी अभी राधिका के पिता जी यहाँ आये थे और उन्होंने कहा है कि अगर एक घंटे के भीतर राधिका अपने घर नहीं पहुँचती है तो थाने में हम सब के विरूद्ध राधिका के अपहरण का केस कर देंग्रे |

मुझे तो बहुत डर लग रहा है कि कही मामला थाना पुलिस में चला गया तो हम औरतें इसका सामना  कैसे करेंगे |

ऐसे समय में भैया भी यहाँ नहीं है | अतः हमलोगों को और भी  ज्यादा घबराहट हो रही है …रेनू घबराते हुए कहा |

तुम बिलकुल फिक्र मत करो रेनू,  मैं अभी अपने वकील से बात करती हूँ और उससे सलाह मशवीरा कर इस समस्या का समाधान निकालने  की कोशिश करती  हूँ |

सोफ़िया को फ़ोन पर बात करते देख राधिका भी दौड़ कर पास आ गई और उन लोगों की फ़ोन पर हो रही बातों को ध्यान से सुनती रही |

जैसे ही सोफ़िया की फ़ोन पर बात समाप्त हुई,  राधिका को उसके पिता के ऐसे व्यवहार के लिए बहुत दुःख हुआ और उसने सोफ़िया से कहा …देखो सोफ़िया, मेरे पिता गुस्सैल प्रवृति के है और गुस्से में आ कर रेनू और माँ को कही मुसीबत में ना डाल दें |

इसलिए मैं चाहती हूँ कि उन दोनों को भी यहाँ ले आना चाहिए ताकि उनको सुरक्षित रखा जा सके |

तुम ठीक कहती हो राधिका,  मैं ड्राईवर को भेज कर उन्हें यहाँ बुलवा लेती हूँ और इसी बीच  मैं अपने वकील से सलाह मशवीरा कर भी लेती हूँ |

सोफ़िया ने राधिका से कहा और ड्राईवर को फ़ोन मिलाने लगी |

तभी राधिका ने कहा …लेकिन सोफ़िया अभी ड्राईवर को आने में समय लगेगा | हमलोग अभी तुरंत खुद ही जाकर उनलोगों को ले आते तो ठीक रहता |

ठीक है राधिका, मैं ऐसा ही करती  हूँ | हमें इस परिस्थति में कोई रिस्क नहीं लेना चाहिए |

तुम जल्दी से तैयार हो जाओ तब तक मैं गराज से अपनी गाड़ी निकालती हूँ ….सोफ़िया ने कहा और खुद भी कपडे बदलने के लिए चल दी |

इधर  कुछ अनहोनी की आशंका से माँ ने रेनू से कहा …ऐसी हालत में संदीप को फ़ोन करके सारी स्थिति की जानकारी दे देनी चाहिए और उससे भी सलाह मशवीरा करना चाहिए, |

रेनू ने भी माँ की बातों का समर्थन किया और तुरंत ही संदीप को फ़ोन मिला दी |

संदीप बिस्तर पर बैठे ही आज का अखबार पढ़ते हुए चाय पी रहा था |

तभी उसका मोबाइल बज उठा और उसने जब देखा यह तो रेनू का नंबर है |  संदीप अचानक घबरा गया |  उसे महसूस हुआ कि कोई अनहोनी घटना जरूर घटी है वर्ना रेनू इतना सुबह फ़ोन क्यों करती ?

वह चिंतित होते हुए ज़ल्दी से फ़ोन उठाया और पूछा  …इतनी सुबह फ़ोन कैसे किया रेनू ?, वहाँ तुम लोग ठीक से हो ना ?

नहीं भैया , यहाँ कुछ भी ठीक नहीं है | .तुम किसी तरह छुट्टी लेकर आ जाओ और फिर घबराते हुए रेनू ने आज की सारी घटना की जानकारी उसे दी |

रेनू की बात सुन कर संदीप व्याकुल हो गया  और ऑफिस से छुट्टी ना मिलने के कारण अपने आप  को लाचार  महसूस कर रहा था | उसे तो ऐसी हालत में अपने परिवार के साथ होना चाहिए था |

संदीप बहुत चिंतित हो गया  /  लेकिन उसे बस एक आशा की किरण दिखाई दे रही थी और वो थी सोफ़िया |

भगवान् की कृपा है कि वो ऐसे समय में हमारे परिवार की  मदद कर रही है |

संदीप को पता था कि सोफ़िया काफी तेज़ तर्रार है,  और वे लोग मिल कर स्थिति को संभाल लेंगे |

संदीप फ़ोन पर ही रेनू को समझा रहा था ….तुम हिम्मत से काम लो रेनू | हमने कोई क्राइम नहीं किया है , जो डरने की कोई बात है और फिर सोफ़िया और राधिका भी हमारे साथ है | तुम बस किसी तरह स्थिति को दो दिन और  संभाल लो |

मैं ऑफिस के कुछ ज़रूरी औपचारिकता पुरी कर यहाँ से चल दूंगा | इतना कह कर उसने  फ़ोन काट दिया |

संदीप ऑफिस जाने के लिए जल्दी ही तैयार हो गया ताकि अपनी छुट्टी के आवेदन के बारे में पता कर सके |

वह ऑफिस जाने के लिए गाड़ी में बैठ गया | गाड़ी तेज़ गति से चल रही थी और उससे भी तेज़ गति से संदीप का दिमाग चल रहा था |

आज के हालात  के बारे में वह सोच रहा था | ऐसी हालत में अपने परिवार और राधिका के पास मेरा होना आवश्यक है ताकि किसी भी परिस्थिति का हमलोग मिल कर सामना कर सके |

संदीप को पता था कि राधिका के पिता काफी गुस्सैल प्रवृति के है और अपनी इज्ज़त बचाने  के लिए वो कुछ भी कर सकते है |

अचानक उसके मन में विचार आया ..क्यों ना सीधा  नीलम मैडम के पास चला जाऊं और उनसे भी आज की हालात को बता कर तुरंत छुट्टी स्वीकृति के लिए निवेदन करूँ |

ऐसा सोच कर संदीप ने  ड्राईवर से कहा …आप सीधे नीलम मैडम  के ऑफिस चलो, मुझे उनसे कुछ काम है |

जी सर जी …, ड्राईवर ने कहा और गाड़ी दूसरी दिशा में मोड़ दी |

करीब एक घंटे के सफ़र के बाद , संदीप अपने  बॉस नीलम मैडम के पास पहुँच गया |

संयोग से वो ऑफिस में ही मिल गई और संदीप को देखते हुए सामने कुर्सी पर बैठने का इशारा  किया |

संदीप कुर्सी पर बैठते हुए जिज्ञासा भरी नजरो के मैडम को देख कर बोला …हमारा छुट्टी का आवेदन स्वीकृत हो गया ?

नहीं संदीप, उनलोगों ने तुम्हारी छुट्टी स्वीकृत नहीं किया …..मैडम अफ़सोस जताते हुए कहा |

संदीप मैडम की बात सुन कर काफी दुखी हुआ और आज घर में घटी  सारी घटना मैडम को बता दिया और कहा …अब आप ही बताएं कि मेरा वहाँ जाना कितना ज़रूरी है |

मैं समझ सकती हूँ संदीप | तुम बहुत बुरे दौर  से गुज़र रहे हो | लेकिन कभी कभी इंसान  इतना मजबूर हो जाता है कि चाहते हुए भी वह  कोई मदद नहीं कर पाता….मैडम ने दुखी स्वर में कहा |

मेरे पास  और कोई उपाय नहीं है मैडम… सिवाए इसके कि बिना छुट्टी के ही मैं घर चला जाऊं | मुझे माँ के लिए बहुत चिंता हो रही है … बोलते बोलते संदीप के आँखों से आंसूं बह निकले और वह बच्चो की तरह रोने लगा |

नीलम मैडम उसके सिर पर हाथ रख कर समझाते हुए कहा …धीरज रखो और हिम्मत से काम लो संदीप |

कभी कभी ऐसी भी परिस्थिति आती है कि इंसान को अपने नौकरी और परिवार के बीच  किसी एक को चुनना पड़ता है और यह परीक्षा की घडी तुम्हारे सामने आ गयी है | अब तुम्हे  चुनाव करना है कि तुम क्या चाहते हो  |

आप ठीक कहती है मैडम |  मुझे पता है कि कंपनी के नियमानुसार बिना छुट्टी स्वीकृति के यहाँ से  जाते ही कंपनी मुझे नौकरी से निकाल सकती है |,

लेकिन मेरे पास और कोई विकल्प भी नहीं है. मुझे तो  हर हाल में जाना ही होगा …संदीप ने मैडम की तरफ देख कर कहा |

ठीक है संदीप ,ऐसी हालत में मैं रोकूंगी नहीं तुम्हे | जैसा होगा मुझे खबर करना |

उधर सोफ़िया ने गाड़ी निकाला और रेनू के घर की ओर चल दी | साथ में राधिका भी उसके साथ अपने चेहरे को ढक कर बैठी थी ताकि कोई उसे पहचान ना ले | क्योंकि राधिका के पिता उसका पता लगाने की कोशिश तो कर ही रहे होंगे |

किसी तरह लोगों की नजरो से बचते बचाते रेनू के पास दोनों पहुँच गए |

रेनू अचानक राधिका को देख कर आश्चर्य से पूछ बैठी …तुम्हे तो अभी अपने घर वालों से छुप कर रहना चाहिए और तुम खुलेआम घूम रही हो ?

तभी सोफ़िया ने कहा …रेनू तुमलोग ज़ल्दी से तैयार हो जाओ, तुम लोगों को कुछ दिनों के लिए  मेरे साथ ही रहना होगा ताकि यहाँ कोई पुलिस वगैरह तंग ना कर सके |

सोफ़िया की बात सुन कर माँ चिंतित हो कर बोली …मैं तुमलोगों के साथ घर छोड़ कर नहीं जा सकती | घर बंद देख कर उनलोगों को और पुलिस  को भी शक हो जायेगा |

बात तो सही है माँ , लेकिन मैं आप को यहाँ अकेला नहीं छोड़ सकती | अगर कुछ ऐसी वैसी कोई बात हो गई तो मैं अपने को कभी माफ़ नहीं कर पाऊँगी….राधिका माँ को समझाते हुए कहा |

मुझे कुछ नहीं होगा राधिका …. माँ ने कहा | माँ नहीं चाहती थी कि उसके कारण राधिका के ठिकाने का पता उसके पिता को चल जाये |

लेकिन राधिका किसी भी हालत में इनलोगों को यहाँ  रहने देकर कोई जोखिम नहीं उठाना चाहती थी |

जब माँ घर छोड़  कर जाने को राज़ी नहीं हुई तो राधिका ने मजबूर होकर कहा ….इन सब परेशानियों की जड़ मैं ही हूँ | अतः मुझे अपने पिता  के पास लौट जाना चाहिए ,…(क्रमशः)

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