
खाली पिंजरा जीवन की नश्वरता, समय के अनवरत प्रवाह और मृत्यु के अटल सत्य को दर्शाती एक भावपूर्ण कविता है। दो चूहों के अचानक गायब हो जाने और विजय के नश्वर शरीर के निर्जीव रह जाने के माध्यम से कवि जीवन को एक ऐसे पिंजरे के रूप में देखता है, जिसमें प्राण कुछ समय के लिए निवास करते हैं। अंततः शरीर यहीं रह जाता है और जीवन की यात्रा समाप्त हो जाती है।
यह कविता हमें याद दिलाती है कि जीवन क्षणभंगुर है, इसलिए जब तक हम जीवित हैं, प्रेम बाँटें, रिश्तों को सँजोएँ और हर पल को सार्थक बनाएँ।
# खाली पिंजरा #
विजय के पास एक पिंजरा था,
बड़ा सुंदर, बड़ा प्यारा था।
उसमें दो नन्हे चूहे रहते थे,
अपनी छोटी दुनिया में हँसते थे।
एक सफ़ेद, दूजा काला,
दोनों का रंग निराला।
एक दिन के उजियारे जैसा,
दूजा रात के अँधियारे जैसा।
विजय उन्हें नित निहारा करता,
उनके सुख-दुःख को समझा करता।
समय पर दाना-पानी देता,
उनकी हर हलचल को देखता।
कभी वे खेलते, कभी झगड़ते,
कभी खुशी से उछलते-कूदते।
कभी उदास होकर चुप हो जाते,
कभी एक-दूजे को सहलाते।
दिन बीतते, रातें आतीं,
समय की लहरें बहती जातीं।
जीवन का पहिया घूम रहा था,
हर पल कुछ नया हो रहा था।
फिर एक दिन ऐसा भी आया,
जिसने जीवन का भेद बताया।
अचानक खुला पिंजरे का द्वार,
और दोनों चल दिए उस पार।
न कोई आहट, न कोई आवाज़,
न विदाई का कोई अंदाज़।
पल भर में दोनों ओझल हो गए,
जैसे सपने आँखों से खो गए।
लोगों ने देखा—पिंजरा खाली,
न चंचलता थी, न खुशहाली।
जहाँ कभी जीवन मुस्काता था,
वहाँ अब केवल सन्नाटा था।
उधर विजय पड़ा था बिस्तर पर,
खामोशी छाई थी उसके घर।
नश्वर देह वहीं रह गई,
जीवन-ज्योति कहीं खो गई।
साँसों की डोरी टूट चुकी थी,
जीवन की संध्या ढल चुकी थी।
आँखें बंद थीं, होंठ थे मौन,
जीवन छोड़ चुका था उसका तन।
पिंजरा वही, वही दीवारें,
वही सुबहें, वही बहारें।
बस जीवन का रंग उतर गया,
एक छोटा संसार बिखर गया।
क्या यही समय की कहानी है?
कुछ पल की धूप, कुछ रात सुहानी है।
जो आज हमारे पास दिखाई देते हैं,
कल यादों में ही रह जाते हैं।
पिंजरा रह जाता है, पंछी उड़ जाता है,
जीवन का हर मेला छूट जाता है।
कौन यहाँ सदा ठहर पाया है?
समय ने किसे अपना बनाया है?
(विजय वर्मा)
www.retiredkalam.com
Categories: kavita
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