
यह कविता जीवन की निरंतर यात्रा का सुंदर एहसास कराती है। ज़िंदगी कभी हँसाती है, कभी रुलाती है, कभी धूप देती है तो कभी छाँव—लेकिन वह कभी रुकती नहीं। कविता हमें सिखाती है कि जो मिला, उसे मुस्कुराकर स्वीकार करें और जो आने वाला है, उसका विश्वास के साथ स्वागत करें।
# यूँ ही चलती जाती है #
नित्य रोज़ हमें हँसाती, रुलाती,
ज़िंदगी है… बस चलती जाती है।
एक धुंध से निकलकर उजाले की ओर,
हर रोज़ नए सपने बुनती जाती है।
हौसला देता है वह उड़ता पंछी,
जो हर सुबह तिनके लेकर जाता है,
ऐसा लगता है मानो सूरज से मिलकर
वह प्रेम का प्रकाश ले आता है।
कभी रुकी नहीं, न रुक सकती है,
ज़िंदगी है… बस चलती जाती है।
जो आज है, वह कल क्या होगा—
यह राज़ तो समय ही बताता है।
कभी राह में धूप, कभी छाँव मिले,
कभी ख़ुशियाँ, कभी ग़म साथ चले,
फिर भी कदम रुकते नहीं—
सफ़र अपने आप चलता जाता है।
सच, जीवन का यही फ़साना है—
न कोई ठहराव, न कोई बहाना है।
जो मिला, उसे मुस्कुराकर जिएँ हम,
जो आने वाला है, उसे स्वीकार करें हम…
ज़िंदगी है…
बस चलती जाती है,
यूँ ही चलती जाती है।।
(विजय वर्मा)
www.retiredkalam.com

Categories: kavita
सुंदर वर्णन कविता के माध्यम से जीवन धारा की ❤️🙏🏻 शुभ रात्रि सर जी
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