
यह कविता जीवन के सरल लेकिन गहरे सत्य को दर्शाती है कि खुशियाँ दूर नहीं होतीं। हम उन्हें दुनिया की भीड़ और सफलताओं में खोजते हैं, लेकिन वे हमारे रिश्तों, छोटी मुस्कानों और वर्तमान क्षणों में छिपी होती हैं। जैसे घने कोहरे के हटने पर रास्ता मिल जाता है, वैसे ही धैर्य और कृतज्ञता से जीने पर खुशियाँ हमारे पास आती हैं।
खुशियों की तलाश
एक दिन मैं खुशियाँ खोजने निकला,
हर गली-मोहल्ले में जा पहुँचा।
शहर-शहर और चौपालों पर,
हर चेहरे में उन्हें टटोलता फिरा।
सोचा, कहीं बाज़ारों में होंगी,
या ऊँचे सपनों के द्वारों में होंगी।
कभी तालियों की गूँज में ढूँढ़ा,
कभी बीते कल की यादों में ढूँढ़ा।
पर खुशियाँ मुझसे दूर रहीं,
जैसे मुट्ठी से रेत फिसलती रही।
तभी दिल ने धीरे से कहा,
“ज़रा ठहरो, सच को समझो ज़रा।”
खुशियों की खोज भी वैसी है,
जैसे कोहरे में राह ढूँढ़ना।
रास्ता होता पास हमारे,
पर कठिन होता उसे पहचानना।
कोहरा अक्सर भरमाता है,
चलती चाल को थमाता है।
बार-बार यह डर दिखलाता,
मानो मंज़िल कहीं खो जाता।
लेकिन धीरज साथ निभाता है,
सूरज भी धीरे-धीरे मुस्काता है।
कोहरा आखिर छँट ही जाता,
खोया रास्ता मिल ही जाता।
तब समझ आया, सुख बाहर नहीं,
उसका कोई बाज़ार नहीं।
वह माँ की ममता में बसता है,
अपनेपन की छाँव में हँसता है।
बच्चों की भोली मुस्कानों में,
बरसात की मीठी तानों में।
थके हुए मन के विश्राम में,
दोस्तों के संग हँसी-ठिठोली और धमाल में।
अब मैं खुशियों के पीछे नहीं भागता,
बस हर पल से रिश्ता जोड़ता हूँ।
विश्वास लिए आगे बढ़ता हूँ,
अँधियारों की परवाह नहीं करता हूँ।
क्योंकि एक दिन—
जीवन का कोहरा छँट जाता है,
हर भटका पथ मिल जाता है।
और खुशियाँ भी अंततः आकर,
धीरे से मन का द्वार खटखटाती हैं।
तब लगता है—
जिसे खोजने निकले थे उम्र भर,
वह तो चुपचाप हमारे संग चलती रही।
हर साँस में, हर धड़कन में,
जीवन को सुनहरा करती रही।
(विजय वर्मा)
www.retiredkalam.com

Categories: kavita
very nice .
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Thank you so much.
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बहुत सुंदर
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बहुत-बहुत धन्यवाद! 🙏🌷
आपके स्नेहपूर्ण शब्द हृदय को छू गए। यदि मेरी कविता आपको सुंदर लगी और उसके भाव आपके मन तक पहुँच सके, तो यही मेरे लेखन का सबसे बड़ा पुरस्कार है। कविता तभी सार्थक होती है, जब वह पाठक के हृदय में एक छोटी-सी अनुभूति, एक विचार या एक मुस्कान छोड़ जाए।
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