
यह कविता एक ऐसे लेखक की आत्मस्वीकृति है, जो दिखावे से नहीं, अनुभव और संवेदना से लिखता है। यह रचना खामोशी, दर्द और भावुकता को कमजोरी नहीं, बल्कि रचनात्मक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करती है।
शब्दों के माध्यम से स्वयं को फिर से खड़ा करने की ईमानदार यात्रा है यह कविता।
मैं जो लिखता हूँ
हाँ, मैं लिखता हूँ।
मैं वो नहीं लिखता
जो दिखता है,
मैं वो लिखता हूँ
जो सहा गया है।
मेरी रचनात्मकता
तालियों में नहीं पलती,
वो चुप्पी की गोद में
आँखें खोलती है।
जब शब्द बोलने से डरते हैं,
काग़ज़ मेरी साँस बन जाता है,
और कलम—
मेरे अंदर जमा बोझ को
धीरे-धीरे उतारती है।
मैं हँसते हुए भी
टूटना जानता हूँ,
और टूटकर
खुद को समेटना भी।
मेरी खामोशी खाली नहीं—
उसमें यादें हैं,
अधूरे भरोसे हैं,
और वो सपने हैं
जो हार मानना नहीं जानते।
लोग कहते हैं,
“तुम ज़्यादा ही भावुक हो।”
हाँ, मैं भावुक हूँ,
क्योंकि वही मुझे महसूस कराता है,
और वही सच लिखने की हिम्मत देता है।
जब दुनिया मुझे
कमज़ोर समझती है,
मेरी रचनात्मकता
मुझे आईना दिखाती है—
“थक गया हूँ, पर हारा नहीं।”
मैंने दर्द को
अपने अंदर सड़ने नहीं दिया,
मैंने उसे शब्दों में ढाल दिया,
ताकि वो
किसी और की ताक़त बन सके।
मेरी कलम
मुझे जज नहीं करती,
मेरे आँसू
उसके लिए शर्म नहीं हैं।
मैं परफेक्ट नहीं,
पर सच्चा हूँ,
और मेरी सबसे बड़ी रचना—
मैं खुद हूँ।
मैं लिखता हूँ,
क्योंकि चुप रहना
मुझे तोड़ देता है,
और लिखना—
मुझे फिर से एक मकसद देता है।
(विजय वर्मा)
www.retiredkalam.com

Categories: kavita
very nice .
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Thank you so much.
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यह सिर्फ़ कविता नहीं, आत्मा की सच्ची आवाज़ है वर्मा जी ।
हर पंक्ति में एक ऐसी ईमानदारी है जो सीधे दिल तक पहुँचती है। आपने दर्द को शब्दों में बदलकर उसे कमजोरी नहीं, ताक़त बना दिया है। “मैं वो लिखता हूँ जो सहा गया है” यह पंक्ति बहुत देर तक भीतर गूंजती रहती है। ✨
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आपके शब्द बहुत आत्मीय और सच्चे हैं, धन्यवाद 🙏
यह सुनकर अच्छा लगता है कि कविता आपको केवल पढ़ने तक सीमित नहीं रही, बल्कि भीतर कहीं महसूस हुई। जब अनुभव शब्दों में ईमानदारी से उतरता है, तो वह सिर्फ़ अभिव्यक्ति नहीं रहता—वह एक साझा भाव बन जाता है, जो लेखक और पाठक के बीच एक मौन सेतु बना देता है।
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A deeply moving reflection—beautifully portraying sensitivity, silence, and pain not as weaknesses, but as sources of creative strength. ✨🖋️
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Yeah, I really like the direction of that thought.
There’s something quietly radical in reframing sensitivity and silence that way. So often people treat them like “lack of something” — like you’re missing toughness, certainty, or noise. But in reality, those quieter states can hold a lot of perception. They notice what louder moments miss.
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सकारात्मक विचारों से सजी हुई कृति 🙏🏻 सुप्रभात सर
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