
यह कविता एक ऐसे अधूरे एहसास को दर्शाती है, जहाँ भावनाएँ तो गहरी हैं लेकिन स्पष्टता नहीं। यह उस रिश्ते की कहानी है जो ना पूरी तरह अपना बन पाता है, ना ही भुलाया जा सकता है—जहाँ कोई इंसान धीरे-धीरे एक अनकहा एहसास बन जाता है।
# अधूरी सी तुम #
तुम मेरे भीतर ऐसे ठहरे हो
जैसे शाम का आख़िरी उजाला—
ना दिन रहा, ना रात बनी,
बस एक लंबा-सा ठहराव।
मैंने कई बार तुम्हें नाम देना चाहा,
मगर हर बार शब्द टूट गए,
जैसे होंठों तक आकर
ख़ामोशी खुद को बचा लेती हो।
तुम्हें भूलना भी एक तरह से
तुम्हें याद रखना ही है,
हर कोशिश में तुम और गहरे उतरते हो,
जैसे पानी में गिरा कोई रंग।
हमारे बीच जो है—
वो रिश्ता नहीं,
एक अनकहा मौसम है,
जो बिना बताए बदलता रहता है।
कभी तुम करीब लगते हो
इतने कि सांसों में घुल जाओ,
और कभी इतने दूर
कि खुद से भी दूर कर जाओ।
शायद तुम सवाल नहीं,
एक अधूरी किताब हो,
जिसे मैं पढ़ तो रहा हूँ,
पर हर पन्ने पर
कहानी बदल जाती है।
और मैं…
अब जवाब नहीं ढूंढता,
बस तुम्हारे इस उलझे हुए एहसास में
खुद को धीरे-धीरे खोता रहता हूँ।
(विजय वर्मा)
www.retiredkalam.com

Categories: kavita
बहुत गहरी और सच्ची भावना है वर्मा जी… हर पंक्ति में एक ठहराव और हल्की-सी कसक महसूस होती है। कुछ रिश्ते सच में नाम नहीं मांगते, बस एहसास बनकर रह जाते हैं अधूरे, लेकिन बेहद खूबसूरत। 💫
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आपने बहुत सुंदर तरीके से उसकी गहराई को महसूस किया है।
कभी-कभी कुछ भावनाएँ पूरी होकर भी पूरी नहीं लगतीं—और अधूरी होकर भी दिल में सबसे ज़्यादा जगह बना लेती हैं। शायद इसलिए, ऐसे एहसास शब्दों में बंधकर भी मुक्त रहते हैं, और भीतर कहीं लगातार जीवित रहते हैं।
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very nice .
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Thank you so much.
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A haunting echo of the unspoken, beautifully capturing that bittersweet ache of a connection that remains suspended—too deep to let go, yet too clouded to truly call home.
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That’s a striking way to read it—thank you.
That in-between space can feel almost suspended in time… not quite belonging anywhere, yet refusing to fade. It’s not loud, but it lingers, shaping how everything else is felt.
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भावपूर्ण वर्णन 🙏🏻 सुप्रभात सर जी
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बहुत-बहुत धन्यवाद 🙏🏻
आपकी यह सराहना सच में हौसला बढ़ाने वाली है।
आपको भी सुप्रभात सर जी—आपका दिन शुभ और सकारात्मकता से भरा रहे 🌼
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