# भावनाओं की चुप्पी #

भावनाएँ शब्दों से परे होती हैं—ये ना चाहकर भी दिल पर दस्तक देती हैं, यादों को जगाती हैं और हमें हमारी ही गहराइयों से मिलाती हैं। कभी प्रकाश बनकर, कभी धुंध बनकर, तो कभी एक ख़ामोश स्पर्श की तरह।

यह कविता इन्हीं सूक्ष्म अनुभूतियों की मौन यात्रा है—जहाँ थोड़ी-सी महक, कोई भूला हुआ निशान, या एक धीमी-सी आहट भी दिल के भीतर पूरी दुनिया जगा देती है।

भावनाओं की चुप्पी

भावनाएँ हैं तो साँसों में रौशनी है,
वरना ज़िंदगी तो बस एक चलता हुआ साया है।
कभी हँसी बनकर कंधों पर हाथ रख देती हैं,
कभी आँसू बनकर आँखों की देहरी पर ठहर जाती हैं,
और कभी—एकदम अचानक—गायब होकर
हमें हमारे ही भीतर के शून्य में छोड़ जाती हैं।

इनकी बुनावट कितनी महीन होती है—
ज़र्रे-सा एक नाम हवा में तैरे
तो दिल की धड़कनें अपनी चाल भूल जाती हैं।

आधी रात में खुली खिड़की से आती
किसी आहट की फुसफुसाहट…
किसी अनकहे दर्द की धीमी-सी दस्तक…
और फिर वही चुप्पी
जो पूरे कमरे को अपने आलिंगन में बाँध लेती है।

तभी किसी पुराने कोने में
तेरी छोड़ी हुई वह चूड़ी चमक उठती है—
बिल्कुल तुम्हारी तरह चुप,
पर भीतर हज़ारों कहानियों को समेटे हुए।

कितना अजीब है न—
रिश्ते कभी शोर से नहीं,
बस एक हल्की-सी महक,
एक धीमी-सी साँस,
या एक भूली हुई चीज़ से
ज़िंदा हो उठते हैं।

इन्हीं नाज़ुक धागों से
हम हर दिन खुद को बुनते हैं—
कभी पूरा, कभी अधूरा,
पर हमेशा महसूस करने वाले।

क्योंकि जहाँ भावना है,
वहीं ज़िंदगी है…
और जहाँ ज़िंदगी है,
वहीं हमारा होना है।

(विजय वर्मा )
www.retiredkalam.com



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2 replies

  1. very nice .

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