# तन्हाई के बादल #

यह ग़ज़ल एक संवेदनशील आत्मा की कहानी कहती है, जो जीवन की भीड़-भाड़ और जगमगाहट के बीच अपनी पहचान तलाशता है। सपनों के अधूरेपन, तन्हाई और भीतर की बेचैनी के बावजूद, वह अपने ज़ख़्मों को शब्दों में ढालकर मुस्कुराना सीखता है।

यह रचना दुख और आशा—दोनों की गहराई को सहजता से व्यक्त करती है।

# तन्हाई के बादल #

मन की तहरीर में, ग़म का सफ़हा रखता रहा,
आँख नम थी, पर तन्हाई में मैं जलता रहा।

लोग पहुँचे सितारों तक, उजाले में डूबे हुये ,
मैं तो एक बूँद था, आंधियों से लिपटता रहा।

हर सवेरे उम्मीद छूटी, हर साँझ वो बिखरी,
अधूरे ख्वाब को सहेजे—चुपचाप तड़पता रहा।

जगमगाहटो  ने हर बार मुझे धोखा दिया ,
अंधेरे गलियों में मैं यूं ही भटकता रहा।

दिल की बेचैनिया लिखना थीं मेरी आदत,
ज़ख़्म पाकर भी मैं मुस्कान ओढ़ता रहा।

ग़म की राहों से गुज़रकर भी पाया न ठौर,
राहबर ढूँढा, मगर मैं अकेला भटकता रहा।


( विजय वर्मा )
www.retiredkalam.com



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10 replies

  1. A wonderful sharing ❤️

    Grettings regards 🌎🇪🇦

    Happy saturday 🌞

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  2. Lovely drawings. Keep creating and sharing your talent with us, Verma.

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