हँसी के इंजीनियर – श्री वर्मा जी! 😜

हँसी के इंजीनियर – श्री वर्मा जी!” एक हल्की-फुल्की हास्य कविता है जो हमारे जीवन के उन पलों को दर्शाती है, जब हम गंभीरता को अलमारी में बंद करके, ठहाकों की चाबी घुमा देते हैं।
यह कविता एक रिटायर्ड लेकिन ज़िंदादिल शख्स — श्री वर्मा जी — की मज़ेदार दिनचर्या और उनकी कलात्मक शरारतों को उजागर करती है।

यह रचना आपके चेहरे पर मुस्कान जरूर लाएगी!
👉 पढ़िए, हँसिए और अपने दोस्तों से शेयर करिए — क्योंकि हँसी भी एक कला है, और हमे सीखना हैं!

🛠️ हँसी के इंजीनियर – श्री वर्मा जी! 😜

एक ज़माना था, जब बैंक में थे सीनियर,
अब बन गए हैं “हँसी के इंजीनियर”!
कलम पकड़ते हैं, पर न चेक भरने को,
अब तो लिखते हैं कविताएँ, सबको हँसाने को! 😆

सुबह उठते हैं, चाय पीते गुनगुनाकर,
बीवी पूछे — “ये कौनसा राग है बजा रहे सरकार?”
बोलें — “ये राग है ‘हँसी का मधुर तान’,
और मैं हूँ ‘कवि श्रीमान बुद्धू महान’!” 😂

रिटायरमेंट के बाद कला में निखार आया,
कभी ब्रश चलाया, कभी कविता लहराया।
पोते बोले — “दादाजी रील्स भी बनाइए,”
बीबी बोली — “पहले पजामा तो ठीक से पहन पाइए!” 😜

कभी चश्मा ढूंढते हैं सर के ऊपर,
तो कभी मोबाइल फ्रीज में रख देते बेखबर।
बोलें — “याददाश्त है हमारी एकदम फिट,”
बीवी बोली — “कितनी भी फिट हो, लॉजिक है हिट-इन-मिस!” 😄

अब जब ब्लॉग पे कविता चढ़ती है,
दुनिया हँसते-हँसते लोटपोट हो पड़ती है।
फेसबुक पर आए 500 लाइक जब,
बीबी बोली — “अरे वाह! सोशल कवि हो अब !” 😎

🎉 अंत में एक संदेश:

“ज़िंदगी का हर दिन अगर मुस्कुरा के बीतेगा
हर दिन आप को हँसी का इंजीनियरिंग दिखेगा !”

👷‍♂️ “आप का दोस्त, विजय वर्मा !



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