
(Pic courtesy: Google.com)
यह कविता बचपन की मासूमियत और बेफिक्री को याद करती है, जब न कोई छल था, न कोई चिंता। कागज़ की नावों से खुश होने वाले दिन, माँ की थपकी में सुकून से सोने वाली रातें—सब अब बस एक मीठी याद बन गए हैं।
आज हम समझदार तो हो गए, लेकिन अपने सपनों, मासूम हंसी और बेपरवाह खुशियों को खो बैठे हैं। यह कविता उसी खोए हुए बचपन को पुकारती है, उसे फिर से जीने की चाह रखती है।
वो भी क्या दिन थे…
तब हमें समझ नहीं थी, हम बच्चे थे,
पर जैसे भी थे, हम दिल के सच्चे थे।
न कोई छल था, न थी कोई शिकायत,
न था कोई फितूर, हम सब अच्छे थे।
कागज़ की नाव चलाकर खुश होते थे,
दोस्तों को गिराकर खुद भी गिरते थे।
न आज की परेशानी, न कल की कोई चिंता,
कल्पनाओं के घरोंदों को आकार देते थे।
माँ की थपकी में जन्नत थी पलती,
सुनहरे ख्वाब जैसे भविष्य सँवरते।
अब खो गए अरमान और वो बेफिक्री,
आज अपनी हंसी भी नश्तर सी चुभती।
अब हम बड़े हो गए, समझदार भी,
पर खो गए अपने सपने और त्योहार भी।
न जाने कब छूट गया वो सुहाना बचपन,
आज लुट गया अपनी हंसी का बाजार भी।
काश वो दिन फिर से मुझे मिल जाए,
बिना वजह मुस्कुराना कोई हमें सिखाए।
फिर से हँसें, फिर से मस्ती करें,
काश अपना बचपन फिर से लौट आए।
(विजय वर्मा )

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Categories: kavita
very nice
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Thank you so much.
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Bahut Sundar Kavita jis me bachpan ki masumiyat ka varnan achchi tarah hue hai.
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बहुत बहुत धन्यवाद, डियर |
यह कविता न केवल बीते दिनों की याद दिलाती है, बल्कि दिल में एक कोमल एहसास भी जगा जाती है। सच में, बचपन की वो निश्छल हंसी, बेफिक्री और छोटे-छोटे पलों में खुशियां ढूंढने की कला आज कहीं खो गई है। 🌸✨
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Kya kavita ha sir!!! Maja aa gya!!! ❤❣💕💞💓💗💖💘💝
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आपके सुंदर शब्दों ने मेरा दिन बना दिया! ❤️❣
आपकी सराहना ही मेरी लेखनी की असली प्रेरणा है।
ऐसे ही अपना प्यार और आशीर्वाद बनाए रखें। 😊✨🙏
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