
यह कविता दिल की गहराई से निकलने वाले उन भावों की अभिव्यक्ति है, जो अक्सर अनसुने रह जाते हैं। भीड़ के बीच तन्हाई, दर्द और चुप्पी को महसूस करने की स्थिति को बड़े ही मार्मिक शब्दों में उकेरा गया है।
यह कविता हमें उम्मीद के धागे को पकड़कर जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।
दिल की तन्हाई
तूफ़ान दिल में उठता है,
पर आवाज़ दब जाती है,
भले भीड़ हो चारों तरफ,
तन्हाई मेरे संग आती है।
आँखों में पानी है, मगर
उसे कोई पोछने वाला नहीं,
कहने को सब अपने हैं, पर
दिल की सुनने वाला नहीं।
शिकवे-गिले हैं बहुत सारे,
दिल में दबे अरमान हैं,
कौन सुनेगा मेरी कहानियाँ,
जब अपने ही अनजान हैं।
मैं क्यों कहूँ, किससे कहूँ,
मेरी घुटन और चुप्पी कैसी है?
है तो ये मेरे अपने ही,
अब चाहे ये जैसी है।
ऐ दिल, बता मैं क्या करूँ?
इस शोर को कैसे शांत करूँ?
कोई दर्द समझने वाला नहीं,
फिर तन्हाई कैसे सहन करूँ?
बस पास उम्मीद के धागे हैं,
खामोशी में भी आगे हैं,
मेरे दर्द और आँसू अपने हैं,
इनसे हम कब भागे हैं?
(विजय वर्मा )

Categories: kavita
very nice.
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Thank you so much.
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