“बुढ़ापे का जोश”

यह कविता एक प्यारे दादी-दादा की मस्ती और जीवन के प्रति उनके उत्साह को दर्शाती है। फुटबॉल का खेल बिस्तर पर खेलते हुए, वे जीवन की छोटी-छोटी खुशियों में हंसी और प्यार बिखेरते हैं।
यह कविता बुढ़ापे में भी जीवन को खुशहाल और रोमांचक बनाए रखने का संदेश देती है।

“बुढ़ापे का जोश”

दादी-दादा का अनोखा खेल,
बिस्तर पर फुटबॉल का मेल।
तकिया बने मैदान का राजा,
हंसी-ठिठोली का चला ये बाजा।

दादी बोली, “गोल मारूंगी मैं,”
दादा बोले, “अरे, चांस नहीं दूंगा कहीं।”
दोनों के बीच जब मची ये लड़ाई,
हंसी में उड़े सब ग़म की परछाई।

चश्मा टेढ़ा, मूंछें भी हिलीं,
हंसी की गूंज से दीवारें भी सजीं।
बुढ़ापे में भी जोश ऐसा भरा,
प्यार भरा ये खेल लगा सबसे खरा।

गोल हुआ या न हुआ, किसे है पता,
पर मुस्कान से भर गया ये जीवन का दाता।
दादी-दादा की ये मस्ती भरी कहानी,
याद दिलाए, खुशियों की नहीं कोई निशानी।
(विजय वर्मा)

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