
यह कविता एक व्यक्ति के दर्द को दर्शाती है, जो अपने परिवार की बेरुखी से आहत है। वह अपनों से दूर होता जा रहा है, और उसे लगता है कि उसने अपना सब कुछ खो दिया है।
कविता में दादाजी की कहावत का उल्लेख है, जो कहती है कि “पकने के बाद फल मीठे होते हैं।” लेकिन कवि का मानना है कि इंसान ऐसा फल नहीं है, क्योंकि पकने के बाद वह कड़वा हो जाता है।
यह कविता हमें अपने परिवार के महत्व को याद दिलाती है। हमें अपने परिवार से प्यार करना चाहिए और उनकी कद्र करनी चाहिए, क्योंकि वे ही हमारे जीवन में सबसे महत्वपूर्ण लोग हैं।

बेरुखी का दर्द
हर पल टूट रहा विश्वास,
अपनों की बेरुखी से है आहत मन,
दर्द की गहराई है मेरे हर सांस में,
खो रहा हूँ दिया , इस अंधेरी रात में।
दादाजी की कहावत याद आती है,
“पकने के बाद फल मीठे होते हैं,”
पर इंसान ही वो फल है,
जो पकने के बाद कड़वा हो जाता है।
बड़े बुजुर्ग, जिन्होंने जीवन दिया,
जिनकी छाया में पले-बढ़े हम,
आज वो ही बेगाने हो गए हैं,
अपनों के बीच अकेले रह गए हैं।
क्या यही है जीवन का सच?
क्या यही है प्यार का रिश्ता?
कहाँ है वो बंधन, वो अपनापन,
जो कभी था हमारे बीच?
आँखें नम हो जाती हैं,
जब देखता हूँ उनका चेहरा उदास,
मन करता है उन्हें गले लगा लूँ, और कहूँ
“माफ़ करना, हमने ग़लती की है।”
पर क्या ये शब्द बदल पाएंगे कुछ?
क्या मिट पाएंगे वो घाव?
जो बेरुखी ने दिए हैं हमें,
जो दर्द दिया है अपनों ने।
खो गया हूँ मैं
इस रिश्ते की गलियों में,
ना जाने कहाँ है मंजिल,
ना जाने कहाँ है वो रास्ता,
जो ले जाए मुझे मेरे अपनों तक।
पर, हार नहीं मानूंगा,
लड़ता रहूँगा,
अपनों के प्यार के लिए,
अपनों के रिश्ते के लिए।
एक दिन जरूर आएगा,
जब वो समझेंगे मेरे दर्द को,
जब वो महसूस करेंगे मेरे प्यार को,
जब वो लौट आएंगे मेरे जीवन में।
(विजय वर्मा)
Categories: kavita
Beautiful post 🌹🌹
LikeLiked by 1 person
Thank you so much, dear.
LikeLike
Beautiful ❤️
LikeLiked by 2 people
Thank you so much for your appreciation.
LikeLike
Sundar Kavita.
LikeLiked by 1 person
Thank you so much, dear.
LikeLike