# वो सुनहरी यादें # 

दोस्तों ,

बात उन दिनों की है, जिस दिन मैं  बैंक से रिटायर हो रहा था | ऐसा लगा था जैसे अब ज़िंदगी खत्म । मैं बहुत नर्वस महसूस कर रहा था | फिर मैंने यह सोच कर दिल को तसल्ली दी कि और भी मेरे साथी रिटायर हो  रहे है | यह तो हमारी दूसरी पारी की शुरुआत है |

रिटायरमेंट का दिन तो वो दिन होता है, जब हम वो आखिरी लम्हा काम से लौटते हैं और घर आ कर अपनी प्रिय पत्नी से  कहते हैं,–  प्रिय, अब मै हमेशा तुम्हारी सेवा में हाजिर हूँ | सचमुच बहुत भावुक क्षण होता है | उस समय बैंक में बिताएँ बहुत सारे मधुर स्मृतियाँ आंखों के सामने घूमने लगती है |

अपने ऑफिस के उस कुरसी को अंतिम बार पीछे मूड  कर देखना एक अजीब अनुभव कराता है | उन्हीं दिनों को याद कर मैंने इस  कविता की रचना की है | मेरी दूसरी पारी की यह शुरुआत शायद आप को भी पसंद आएगी |

वो सुनहरी यादें

कुछ  सुनहरी यादें …

ना कभी धुंधली होती है

ना ही कभी भूली जाती है

हर पल हर लम्हा अब भी ..

वो सुनहरे पल …

याद करते करते

मन भावुक हो जाता है |

अब तो

ना रहा वो जोश …

ना रहा वो बैंक …

ना रही वो चाकरी …

सिर्फ है तो

कुछ सुनहरी यादें

कुछ बिताए पल

कुछ टूटे हुए सपने

और उनमें

खुद को खोजता मैं |

…….विजय वर्मा…..

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14 replies

  1. बहुत तकलीफ होती है

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  2. Tu dessines vraiment très bien…

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  3. Yaad karke bhavuk ho gaye.Thik hai kavita.

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    • बहुत-बहुत धन्यवाद! आपकी सराहना मेरे लिए प्रेरणादायक है। 🌹
      आपका समर्थन और प्रेम हमेशा मेरे लेखन को नई ऊर्जा देता है। 🙏✨

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