#बुढ़ापे की सोच# 

बुढ़ापे से कोई नहीं बचा है | जो आज बूढ़े है वो कल जवान थे  और जो आज जवान है उनको  कल बूढ़ा होना है | यह सार्वजनिक सत्य है कि जवानी वो होती है जो जा कर  नहीं आती और बुढ़ापा वो होता है जो आकर नहीं जाता है |  यह तो हमें साथ ले कर ही जाता है |

इसलिए बूढ़े होने पर इसे सही ढंग से जीने के लिए हम सभी को मानसिक रूप से तैयार होना चाहिए |

योग और ध्यान

मेरा मानना है कि एक वृद्ध व्यक्ति , योग और ध्यान (meditation)  के जितना निकट होगा, उसका  मन उसके नियंत्रण में होगा और उसका शरीर  उसे कम तकलीफ देगी | इसलिए बुढ़ापा सिर्फ माला जपने के लिए नहीं है, क्योंकि शरीर का तो क्षय हो रहा है और एक दिन यह हाथ माला जपने के लायक भी नहीं रह जाएगा |

यह सच है कि एक दिन यह नेत्र भी दर्शन करने के लायक नहीं होगा । एक दिन कान लोगों की बातें नहीं सुन पाएगी | एक दिन हमारा पैर भी मंदिर की  सीढ़ियाँ चढ़ने के लायक नहीं होगा |

और एक दिन ऐसा भी आएगा कि आप किसी वृद्धा आश्रम में या हॉस्पिटल के वेंतिलटोर पर डाल दिये जाएँगे | क्योंकि आज कल किसी के पास अपने बुज़ुर्गों के लिए समय ही कहाँ है ? यही जीवन की सच्चाई है |

इसलिए सिर्फ पुजा -भक्ति से कुछ नहीं होगा | हमें अपने शरीर और मन का खुद ही ख्याल रखना होगा |

एक ही चीज़ जो हमारा साथ दे रही होगी, वह है हमारी साँसे | इसलिए हर सांस पर भगवान को जोड़ना चाहिए और उस  विधि को  ध्यान (meditation) कहते है | हमारे बुढ़ापे में योगा और ध्यान ही  हमारे  शरीर को ठीक रख सकेगा |

शरीर का खुद ही ध्यान रखना चाहिए

सच तो यह है कि बुढ़ापा में इंसान को अपने ही घर में मेहमान हो जाना चाहिए | जी हाँ, अपने शरीर का खुद ही ध्यान रखना चाहिए | आज कल आप के लिए किसी के पास टाइम नहीं है | इसलिए योग और ध्यान करना ज़रूरी है, भाई  | हमे खुश रहने के उपाय ढूँढने होंगे |

ज़्यादातर लोग अपना बुढ़ापा खुद ही बिगाड़ लेते है | एक समय की बात है कि एक बुढ़िया  अपने गाँव के बाहर एक पेड़ के नीचे बैठी रो रही थी | गाँव वालों ने उसे रोते देखा तो पूछ लिया – माता जी आप क्यों रो रहे है ? क्या तकलीफ है आप को ?

बुढ़िया ने जबाब दिया – ऐसे ही खाली बैठी थी, तो  सोचा थोड़ा  रो ही लूँ |

सकारात्मक सोच रखें

दोस्तों, कुछ इंसान का स्वभाव ऐसा ही होता है, कि वे बिना बात के भी दुखी रहते है | कुछ लोग भाग्यशाली होते है जिनकी सभी लोग सेवा में लगे हुए है, फिर भी वे दुखी है क्योंकि उनकी सोच ही नकारात्मक हो गई है | उनका स्वभाव ही ऐसा हो जाता है |

दूसरी तरफ, कुछ लोग छोटी मोती तकलीफ को नज़र अंदाज़  कर खुश रहते है क्योंकि उनका सोच सकारात्मक है | इसलिए बुढ़ापा से घबराना नहीं है बल्कि उसे खुशी खुशी जीने का प्रयास करना चाहिए | 

दुनिया में हम सभी मेहमान है  | कब बुलावा आ जाये पता नहीं | इस हकीकत को समझना चाहिए |

और बुढ़ापे में इन बातों को हमेशा याद रखना चाहिए …

  • बुढ़ापे में आपको रोटी आपकी औलाद नहीं, आपके दिए हुए संस्कार ही खिलाते  है | यदि आप अपने बच्चे के समक्ष खुद का अच्छा व्यक्तित्व नहीं पेश करेंगे को तो निश्चित मानें आपका बच्चा आपका कभी सम्मान नहीं करेगा और नहीं आपके प्रति सहानुभूति रखेगा।
    आप जैसे संस्कार अपने परिजनों या माता-पिता के साथ करते हैं, बच्चा बड़ा होकर वही आपके साथ निश्चित तौर पर दोहराएगा।
  • ईश्वर चित्र में नहीं, चरित्र में बसता है | हमे अपनी आत्मा को ही मंदिर बनाना चाहिए । सच, यदि आप अपने चरित्र को बेहतर रखेंगे तो लोग आपकी पूजा स्वयं करने लगेंगे। बुढ़ापे में कुछ साथ न दे लेकिन यदि आपका चरित्र स्वच्छ रहा है तो लोग आपका साथ कभी नहीं छोड़ेंगे।
  • यदि आपके अंदर अपने बड़े होने का गुमान हो तो उसे हटा दें, क्योंकि पद की प्रतिष्ठा कुर्सी तक ही होती है। कुर्सी से हटने के बाद आपके कर्म ही आपके सम्मान का कारक बनते हैं।
  • हमेशा याद रखें यदि आपको अपने बुढापे को सुख और शांति के साथ बीताना है तो आपको एक मददगार की तरह पेश आना चाहिए। एक व्यक्ति का कर्तव्य यह है कि किसी भी ज़रूरतमन्द  की मदद करे । आपकी आज की मदद आपके कल को संवारती है और ये आपका सबसे बड़ा कर्तव्य भी है।

शांति मन से विचार करना चाहिए कि हमने ज़िंदगी में क्या खोया और क्या पाया है | और ज्यादा पाने की  ललक को समाप्त कर देना चाहिए | बस , “संतोषम परम सुखम” की  नीति पर चलनी चाहिए | जो चला गया उसे भूल जाना चाहिए और जो पास है, उसी में आनंद मनाना चाहिए |

जीवन बहुमूल्य है, इसे खुल कर जीना चाहिए |

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6 replies

  1. Bahut sundar lekha.Sanskar hi sab kuchh hai.Bache thik hai to hum thik hai.

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