
बीते बचपन, ढलती जवानी और पुराने दोस्तों की सुनहरी यादों को समर्पित एक भावपूर्ण कविता है। यह हमें एहसास कराती है कि वक़्त भले ही लौटकर नहीं आता, लेकिन ज़िंदगी में खुशियाँ, दोस्ती और बचपन जैसी मस्ती फिर से जगाई जा सकती है। बीते कल की यादों में खोने के बजाय, आज को हँसी-खुशी जीना ही इस कविता का संदेश है।
आइए, उम्र की सीमाओं को भूलकर दिल से मुस्कुराएँ और ज़िंदगी को एक नया रंग दें! ❤️
# ज़िंदगी फिर से जिया जाए #
चले थे कहाँ से, कहाँ आ गए हम,
गुज़रते वक़्त के साथ क्या बन गए हम।
देखते ही देखते कितने बरस गुज़र गए,
कभी हँसते-हँसाते थे, अब यादों में सिमट गए हम।
सोचता हूँ आज, दिल से पूछता हूँ,
क्या वही ‘विजय’ अब भी हूँ मैं?
जो बचपन से जवानी तक
खुशियों के रंग बाँटता फिरता था,
हर महफ़िल में हँसी बिखेरता था,
क्या उस हँसमुख चेहरे का अक्स अब भी हूँ मैं?
कब बचपन छूटा, कब जवानी ढली,
वक़्त की धूप में ज़िंदगी चलती रही।
जब एहसास हुआ कि मौसम बदल गया,
सच, यादों का कारवाँ पीछे रह गया।
पर क्यों न फिर वही रंग जमाया जाए,
पुराने दोस्तों को गले लगाया जाए।
कुछ ग़म भुलाएँ, कुछ ठहाके लगाए जाएँ,
दिल के आँगन में फिर बहारें सजाई जाएँ।
उम्र से क्या डरना, दिल तो जवान है,
जीने के लिए आज भी खुला आसमान है।
जो बीत गया, उसे यादों में रहने दिया जाए,
जो आज मिला है, उसे हँसकर जिया जाए।
चलो, फिर बचपन की शरारतें दोहराएँ,
दोस्तों के संग कुछ पल चुराएँ।
ज़िंदगी को फिर मुस्कुराना सिखाया जाए—
क्यों न एक बार फिर,
ज़िंदगी को दिल से जिया जाए!
— विजय वर्मा
www.retiredkalam.com

Categories: kavita
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