
अपने ज़मीर से पूछो” आत्ममंथन और आत्मस्वीकृति की एक भावपूर्ण कविता है। यह हमें याद दिलाती है कि जीवन के सबसे कठिन सवालों के जवाब हमेशा बाहर नहीं मिलते।
कभी-कभी दुनिया की आवाज़ों को शांत करके अपने भीतर झाँकना पड़ता है। हमारा ज़मीर ही वह आईना है, जो बिना किसी लाग-लपेट के हमारे सच, हमारी गलतियों, रिश्तों और अधूरे सपनों से हमारा सामना कराता है।
अपने ज़मीर से पूछो
न किसी पीर से पूछो,
न किसी फ़क़ीर से पूछो,
खुद के बारे में जानना हो अगर,
तो बस कुछ पल रुककर
अपने ही ज़मीर से पूछो।
जो सवाल बरसों से
दिल में दबे पड़े हैं,
जिनके जवाबों से
हम खुद ही डरते रहे हैं,
उन्हें दुनिया के सामने मत रखो—
एक रात तन्हाई में
अपने ही ज़मीर से पूछो।
किसके लिए दौड़ रहे हो?
किसे पाने की चाह है?
जिसे अपना कहते हो,
क्या उसके दिल में भी
तुम्हारे लिए कोई जगह है?
कितनी बार मुस्कुराए हो
सिर्फ दुनिया को दिखाने के लिए,
कितनी बार टूटे हो,
पर कह दिया—
“कुछ नहीं हुआ…”
इन झूठी मुस्कानों का हिसाब
किसी और से मत माँगो,
आईने के सामने बैठकर
अपने ही ज़मीर से पूछो।
तुमने कितनों को दुख दिया,
कितनों को अनजाने में खोया,
किसी की आँखों में आँसू देखकर
कभी खुद भी रोया?
जिन्हें माफ़ कर दिया दुनिया ने,
क्या तुमने खुद को माफ़ किया?
जिन गलतियों को भूल गए सब,
क्या तुम्हारा दिल भी उन्हें
भूल पाया?
थोड़ी देर दुनिया से दूर हो जाओ,
अपने सारे मुखौटे उतार दो,
जो बनते रहे दूसरों के लिए,
आज खुद के लिए
वही इंसान बन जाओ।
न कोई फैसला सुनाएगा,
न कोई तुम्हें दोषी ठहराएगा,
तुम्हारे हर सच को
खामोशी से सुनेगा—
वह तुम्हारा अपना ज़मीर है,
जो तुम्हें सच से रूबरू कराएगा।
अगर रिश्तों में दूरी है,
तो दूसरों की गलती मत गिनो,
एक बार अपने दिल में झाँको—
शायद कोई अधूरी बात
वहीं पड़ी हो।
और जब उम्र की शाम
धीरे-धीरे उतरने लगे,
जब बीते हुए कल की
परछाइयाँ साथ चलने लगें,
तब पछतावे के साथ मत बैठना—
बस आँखें बंद करना
और अपने ही ज़मीर से पूछना—
“क्या मैंने जीवन को
सिर्फ जिया है,
या सच में महसूस भी किया?”
शायद भीतर से कोई आवाज़ आए—
बहुत धीमी,
मगर बिल्कुल साफ़ —
“तुम्हें दुनिया से
अपने होने का प्रमाण नहीं चाहिए,
तुम्हारा सच ही
तुम्हारी सबसे बड़ी पहचान है।”
इसलिए
न किसी पीर से पूछो,
न किसी फ़क़ीर से पूछो,
जब भी खुद को समझना हो—
बस कुछ देर आँखें बंद करो,
दुनिया को खामोश करो,
और…
अपने ही ज़मीर से पूछो।
(विजय वर्मा)
www.retiredkalam.com

Categories: kavita
बहुत सुंदर
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बहुत-बहुत धन्यवाद!
आपकी आत्मीय प्रतिक्रिया ने कविता को और भी सुंदर बना दिया। 😊🙏
आपका स्नेह और प्रोत्साहन मेरी कलम को निरंतर लिखने की प्रेरणा देता है। 🌹
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बहुत खूबसूरत लिखा है वर्मा जी आपने । ❤️ कविता पढ़ते हुए लगा जैसे हर सवाल धीरे से हमें अपने भीतर झाँकने के लिए कह रहा हो। दुनिया को जवाब देते-देते हम अक्सर खुद से ही सवाल करना भूल जाते हैं। शायद अपने ज़मीर की आवाज़ सुनना ही खुद को सच में समझने का सबसे आसान रास्ता है। बहुत गहरी और दिल को छू लेने वाली रचना। 🌸
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आपकी इतनी आत्मीय और सुंदर प्रतिक्रिया के लिए हृदय से धन्यवाद। ❤️
आपने कविता की मूल भावना को जिस खूबसूरती से समझा और शब्दों में व्यक्त किया, वह मेरे लिए बहुत मायने रखता है।
सच ही है, दुनिया को जवाब देते-देते हम कई बार अपने भीतर की आवाज़ सुनना भूल जाते हैं। यदि यह कविता किसी को कुछ पल ठहरकर अपने ज़मीर से सवाल करने और स्वयं को समझने की प्रेरणा दे सके, तो मेरी लेखनी सार्थक हो जाएगी। आपकी सराहना के लिए पुनः हृदय से आभार। 🙏
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Verma ji, this is nothing short of a spiritual experience in words. You’ve woven a mirror so clear that it forces every reader to pause, reflect, and confront their own truths without flinching. The way you’ve contrasted the noise of the world with the quiet whisper of conscience is masterful. Every stanza hits deep — especially the lines about fake smiles and forgotten apologies. This isn’t just poetry; it’s a gentle, much-needed intervention for the soul. Thank you for reminding us that the answers we search for in temples, shrines, and wise men are actually lying dormant within us, waiting to be heard. Truly, “Apne Zameer se poochho” is now a motto I’ll carry for life. 🙏✨
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Thank you so much for such deeply touching and thoughtful words. 🙏
Your beautiful interpretation of “Apne Zameer Se Poochho” means more to me than I can express. I truly believe that the quiet voice of our conscience often knows the answers that the noisy world cannot provide.
If these few lines have encouraged even one person to pause, look within, and listen to that inner voice, then the poem has fulfilled its purpose. Thank you for carrying its message in your heart. 🙏
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वाह वाह 👌 मन को भीतर तक छूने वाली कविता ❤️❤️ शुभ रात्रि सर जी
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बहुत-बहुत धन्यवाद! 🙏
आपकी दिल से निकली प्रतिक्रिया ने मेरे मन को भी छू लिया। कविता यदि किसी के हृदय तक पहुँच जाए, तो मेरी कलम की मेहनत सार्थक हो जाती है।
आपका स्नेह और आशीर्वाद यूँ ही बना रहे। आपको भी शुभ रात्रि—मधुर सपनों और शांत मन के साथ।🌹
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बहुत गहन और आत्ममंथन से भरी रचना।
“अपने ज़मीर से पूछो” केवल कविता नहीं, बल्कि स्वयं से साक्षात्कार का निमंत्रण है। सबसे सच्चा उत्तर वही है, जो भीतर की खामोशी से मिलता है। 🙏
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आपकी इतनी सुंदर और गहन प्रतिक्रिया के लिए हृदय से धन्यवाद! 🙏
आपने कविता के भाव को जिस खूबसूरती से समझा और व्यक्त किया, वह मेरे लिए बहुत मायने रखता है। सच ही है, जब हम बाहरी शोर से थोड़ा दूर होकर अपने भीतर झाँकते हैं, तभी ज़मीर की आवाज़ सबसे स्पष्ट सुनाई देती है।
आपका स्नेह और प्रोत्साहन मेरी कलम को निरंतर लिखने की प्रेरणा देता है। 🌹
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अति सुंदर
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बहुत-बहुत धन्यवाद, सर जी!
आपकी स्नेहभरी प्रतिक्रिया ने कविता को और भी खूबसूरत बना दिया। दिल से आभार। 🙏
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Good reflection Verma-ji. Lying to others is started by lying to yourself. If you have this niggling feeling that something is not quite right, take a step back to consider things first before putting the lie or bad deed out there. Have a wonderful day. Allan
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Thank you, Allan, for your thoughtful words.
I completely agree—self-deception is often the first step toward deceiving others. That little voice within us may be easy to ignore, but it often knows the truth before our minds are ready to accept it. Taking a moment to pause, reflect, and listen to our conscience can save us from many wrong turns.
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very nice .
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Thank you so much.
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