……..अपने भीतर के बच्चे को ज़िंदा रखिए #

चलो, आज फिर बच्चा बन जाएँ |

“हर इंसान के भीतर एक बच्चा छिपा होता है, जो अवसर मिलने पर खुलकर हँसना, खेलना और जीवन को महसूस करना चाहता है।”

जब हम बच्चे थे, तब हमें जल्दी थी बड़े हो जाने की। लगता था कि बड़े होकर हम अपनी मर्ज़ी से सब कुछ कर पाएँगे। लेकिन आज, जब सचमुच बड़े हो चुके हैं, तो अक्सर मन में एक सवाल उठता है—

काश! फिर से बचपन लौट आता…

आख़िर ऐसा क्यों होता है?

शायद इसलिए कि बचपन में मन शांत था, तनाव का नामोनिशान नहीं था, रिश्तों की जटिलताएँ नहीं थीं और खुश रहने के लिए किसी विशेष कारण की आवश्यकता भी नहीं पड़ती थी।

बचपन की याद दिलाती निदा फ़ाज़ली की ये अमर पंक्तियाँ आज भी दिल को छू जाती हैं—

ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो,
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी।
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन,
वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी।

बचपन केवल जीवन का एक पड़ाव नहीं है। यह एक मानसिक अवस्था है—जहाँ मन नफरत, चिंता और दिखावे से मुक्त होकर सहज आनंद का अनुभव करता है।

मेरा मानना है कि इस अवस्था को किसी भी उम्र में फिर से पाया जा सकता है। बस हमें बच्चों की कुछ विशेषताओं को अपने भीतर जीवित रखना होगा।

आइए, आज फिर से बच्चा बनने की कोशिश करते हैं।

❤️ मन में संदेह की दीवारें मत खड़ी कीजिए

बच्चों की सबसे बड़ी विशेषता होती है—वे संदेह कम करते हैं और प्रयास अधिक।

यदि किसी बड़े व्यक्ति से कहा जाए कि “इस दीवार को धक्का देकर खिसका दो”, तो वह हँस देगा क्योंकि उसके मन ने पहले ही निर्णय कर लिया कि यह असंभव है।

लेकिन यही बात किसी बच्चे से कह दीजिए। वह बिना बहस किए दीवार को धक्का देने लग जाएगा।

बड़े होते-होते हमने अनुभव तो बहुत अर्जित कर लिए, पर साथ ही अपने भीतर संदेह की ऊँची-ऊँची दीवारें भी खड़ी कर लीं—

  • मैं यह नहीं कर सकता।
  • लोग क्या कहेंगे?
  • कहीं असफल हो गया तो?

बाहरी दीवारें गिराना कठिन हो सकता है, लेकिन मन की दीवारें हम स्वयं गिरा सकते हैं।

“संदेह सफलता का सबसे बड़ा चोर है।”

खुद पर विश्वास कीजिए। कोशिश कीजिए। खुशियों का रास्ता वहीं से शुरू होता है।

❤️ वर्तमान में जीना सीखिए

बच्चे न अतीत के बोझ तले दबते हैं और न भविष्य की चिंता में घुलते हैं। वे वर्तमान को पूरी तरह जीते हैं।

यदि उन्हें खेलना है तो वे पूरे मन से खेलते हैं। यदि हँसना है तो खुलकर हँसते हैं।

लेकिन हम?

या तो बीती हुई बातों का पछतावा करते रहते हैं या आने वाले कल की चिंता में आज को खो देते हैं।

“कल इतिहास है, आने वाला कल रहस्य है और आज ईश्वर का उपहार है; इसलिए इसे वर्तमान कहते हैं।”

ज़िंदगी हर पल फिसल रही है। उसे नाराज़गी में नहीं, मुस्कुराते हुए जीना सीखिए।

❤️. पर्यवेक्षक बनिए, सीखते रहिए

बच्चे स्वभाव से जिज्ञासु होते हैं। वे हर चीज़ को ध्यान से देखते हैं, प्रश्न पूछते हैं और सीखते रहते हैं।

उनकी observing capacity ही उनकी learning capacity होती है।

लेकिन बड़े होकर हम मान बैठते हैं कि हमें सब कुछ आता है। यहीं से सीखने की प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है।

यदि हम अपने आसपास की अच्छी बातों को ध्यान से देखना शुरू कर दें, तो जीवन स्वयं हमारा शिक्षक बन जाता है।

ट्रेन की खिड़की से बाहर झाँकिए…

बारिश की बूंदों को महसूस कीजिए…

उगते सूरज को देखिए…

आप पाएँगे कि सफर भी मंज़िल जितना सुंदर हो सकता है।

“जिस दिन हम सीखना बंद कर देते हैं, उसी दिन हम भीतर से बूढ़े होने लगते हैं।”

❤️ दुखों को पकड़कर मत बैठिए

बच्चा खेलते-खेलते गिरता है, रोता भी है, लेकिन अगले ही पल खिलौना देखकर फिर हँसने लगता है।

वह न शिकायतों की सूची बनाता है और न बदले की योजना।

लेकिन हम छोटी-सी बात को वर्षों तक दिल में सँजोए रखते हैं। किसी का व्यवहार, किसी की कही हुई बात, कोई असफलता—सब कुछ याद रखते हैं।

किसी महात्मा से पूछा गया—

“गुस्सा क्या है?”

उन्होंने मुस्कुराकर उत्तर दिया—

“दूसरों की गलती की सज़ा स्वयं को देना।”

ज़िंदगी बहुत छोटी है। माफ करना सीखिए। आगे बढ़ना सीखिए।

❤️”लोग क्या कहेंगे” के रोग से बचिए

बच्चे अपनी मस्ती में रहते हैं। उन्हें इस बात की चिंता नहीं होती कि लोग क्या सोचेंगे।

हमारा अधिकांश जीवन इसी डर में बीत जाता है—

“अगर मैंने ऐसा किया तो लोग क्या कहेंगे?”

सच तो यह है कि—

“सबसे बड़ा रोग, क्या कहेंगे लोग।”

यदि कोई काम आपको खुशी देता है और उससे किसी को कष्ट नहीं पहुँचता, तो उसे पूरे मन से कीजिए।

मन है तो गाइए।

मन है तो नाचिए।

मन है तो चित्र बनाइए।

क्योंकि आपकी खुशी की जिम्मेदारी किसी और की नहीं, आपकी अपनी है।

और सच मानिए—

कुछ समय बाद लोगों को याद भी नहीं रहेगा कि आपने क्या किया था।

❤️ बिना वजह खुश रहना सीखिए

क्या आपने कभी किसी छोटे बच्चे को ध्यान से देखा है?

वह बिना वजह मुस्कुरा देता है।

आप चेहरे पर अजीब-सा भाव बना दें तो खिलखिलाकर हँस पड़ता है।

उसे खुश होने के लिए बड़ी उपलब्धियों की आवश्यकता नहीं होती।

लेकिन हम खुशी को शर्तों से बाँध देते हैं—

  • नौकरी मिल जाएगी तो खुश रहूँगा।
  • घर बन जाएगा तो खुश रहूँगा।
  • सफलता मिलेगी तो खुश रहूँगा।

और तब तक खुशी टलती रहती है।

“खुशी कोई मंज़िल नहीं, बल्कि यात्रा का तरीका है।”

यदि बिना वजह मुस्कुराना सीख गए, तो जीवन का अर्थ बदल जाएगा।

निष्कर्ष : अपने भीतर के बच्चे को जीवित रखिए

बड़ा होना प्रकृति का नियम है, लेकिन भीतर से बूढ़ा हो जाना हमारी पसंद है।

आइए—

  • थोड़ा कम संदेह करें,
  • वर्तमान में जीएँ,
  • जिज्ञासु बनें,
  • दुखों को जल्दी भूलें,
  • लोगों के डर से मुक्त हों,
  • और बिना वजह मुस्कुराना सीखें।

शायद तब हम समझ पाएँगे कि बचपन कहीं खोया नहीं है।

वह आज भी हमारे भीतर जीवित है, बस उसे बाहर आने का निमंत्रण चाहिए।

“बचपन वापस नहीं आता, लेकिन बचपन जैसी मासूमियत और आनंद को जीवन में फिर से जगाया जा सकता है।”

तो आइए…

आज फिर थोड़ा बच्चा बन जाएँ,
थोड़ा खुलकर हँस लें,
थोड़ा बेफिक्र हो जाएँ,
और ज़िंदगी को जीना सीख लें।

क्योंकि जीवन की सबसे बड़ी कला यही है—
उम्र बढ़ती रहे, लेकिन मन बच्चा बना रहे।

BE HAPPY… BE ACTIVE… BE FOCUSED… BE ALIVE

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