# मैं ज़िंदगी लिखता हूँ #

यह कविता उन भावनाओं की कहानी है जो अक्सर शब्दों के पीछे छिपी रह जाती हैं। इसमें दर्द, अधूरी मोहब्बत, संघर्ष और इंसानी हिम्मत को बेहद संवेदनशील तरीके से व्यक्त किया गया है। यह कविता केवल लिखी नहीं गई, बल्कि महसूस की गई है।

मैं ज़िंदगी लिखता हूँ

मैं गाने नहीं लिखता,
मैं रातों की ख़ामोशी लिखता हूँ।
उन आँखों की नमी लिखता हूँ
जो मुस्कुराते हुए भी भीग जाती हैं।

हाँ,
मैं शब्दों को चबाता हूँ,
हर अक्षर को दर्द में डुबोकर
धीरे-धीरे जीता हूँ।

मैं भावनाओं को पीता हूँ—
कभी ज़हर की तरह,
कभी अधूरी मोहब्बत वाली चाय की तरह,
जो होंठ जला देती है,
मगर दिल को उसकी आदत पड़ जाती है।

मैं ज़िंदगी लिखता हूँ—
स्टेशन पर बिछड़ते लोगों में,
माँ की थकी हथेलियों में,
बाप की ख़ामोश चिंता में,
और उन सपनों में
जो नींद से पहले ही टूट जाते हैं।

मेरी कविताएँ तुकों से नहीं,
ज़ख्मों से बनती हैं।
मैं हर उस इंसान की आवाज़ हूँ
जो दुनिया के सामने मज़बूत
और अकेले में बिखरा हुआ होता है।

मैं गाना नहीं लिखता—
मैं इंसान लिखता हूँ।
उसका दर्द,
उसकी उम्मीद,
और टूटकर भी
हर रोज़ फिर से जी उठने की हिम्मत लिखता हूँ।

हाँ,
मैं शब्दों की भावनाओं में
ज़िंदगी जीता हूँ।

(विजय वर्मा)
www.retiredkalam.com



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6 replies

  1. A good poem about resilience. What we see on the surface is not always what is going on behind the eyes. Have a great Friday. Allan

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    • Thank you, Allan. You understood the heart of the poem beautifully. Sometimes the quietest struggles are the ones hidden deepest behind a smile or calm eyes. I truly appreciate your thoughtful words. Wishing you a wonderful Friday as well. 🌿

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  2. very nice .

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  3. हर पंक्ति में इतनी सच्चाई और एहसास है कि पढ़ते-पढ़ते मन एकदम शांत हो गया| यह कविता सिर्फ शब्दों से नहीं, भीतर की गहराइयों से लिखी गई लगती है। “मैं गाना नहीं लिखता मैं इंसान लिखता हूँ” बहुत खूबसूरत पंक्ति है आपकी वर्मा जी ✨

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