
कुछ अधूरा सा… एक भावनात्मक हिंदी कविता है जो ज़िम्मेदारियों, समझौतों और दबे हुए सपनों के बीच फँसे इंसान की भीतर की आवाज़ को शब्द देती है। यह कविता हमें याद दिलाती है कि जीना केवल निभाना नहीं, बल्कि अपने सच को स्वीकार करना भी है।
कुछ अधूरा सा…
हम हँसते रहे दुनिया के शोर में,
और भीतर कोई चुपचाप रोता रहा।
भीड़ के बीच भी अकेले थे हम,
पर उनके होने का एहसास होता रहा।
हर दिन निभाई ज़िम्मेदारियों की रस्म,
ख़्वाबों को टाल दिया “कल” के नाम।
जो मन कहना चाहता था उम्र भर,
रह गया दिल में बनकर एक थकान।
कभी सोचा था—ज़िंदगी अपनी होगी,
रंग होंगे, धुन होगी और सुकून होगा।
मगर वक़्त ने सिखाए समझौते इतने,
कि अब ख़ुद से ही पहला समझौता होगा।
हम मज़बूत दिखते रहे सबकी नज़रों में,
कमज़ोर होना हमारी फितरत न थी।
आँसू भी तर्क माँगते रहे हमसे,
पर रोने की मुझको इजाज़त न थी।
आज भी कोई आवाज़ ज़िंदा है
जो अक्सर मुझे ही बुलाती है,
अपने ज़िंदा होने के सबूत में
अपनी नज़्में मुझको सुनाती है।
शायद पूरी ज़िंदगी की यही सीख है—
कि जीना सिर्फ निभाना नहीं है।
जो ख़्वाहिशें अधूरी रह जाएँ अपनी,
उन्हें दुनिया को कभी बताना नहीं है।
(विजय वर्मा)
www.retiredkalam.com

Categories: kavita
very nice .
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Thank you so much.
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