
यह ग़ज़ल टूटे हुए ख़्वाबों, अधूरी उम्मीदों और मोहब्बत में मिले दर्द की कहानी कहती है। इसमें शायर की वो तन्हाई झलकती है जहाँ हर खुशी एक परीक्षा बनकर आई, और हर रिश्ता अपने ही बोझ में खो गया। ज़िंदगी को एक कर्ज़ की तरह महसूस करने वाला यह एहसास बेहद गहरा और मार्मिक है।
# ग़ज़ल का सफर #
हर ख़ुशी आई यहाँ, वो इम्तिहान लेकर गई,
मुस्कुराहट भी मेरे लब से थकान लेकर गई।
हमने सोचा था कोई मेरा दर्द बाँट लेगा कभी,
पर हर एक शख़्स अपनी ही कहानी कह गया।
रात भर जागते रहे हम उम्मीदों के साथ,
सुबह आई भी तो बस वीरानियाँ देकर गई।
दिल लगाया था जहाँ, वहीं दरकता मिला,
ये मोहब्बत भी अजीब-सा नुकसान दे गई।
ज़िंदगी क्या है, बस इक कर्ज़-सी लगती है अब,
साँस आई भी तो वो सारे अरमान ले गई।
अब शिकायत भी करें तो करें किससे “हम”,
हर दुआ लौटकर अपनी ही जान ले गई।
(विजय वर्मा)

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बेहद मार्मिक और आत्मा को छू लेने वाली ग़ज़ल वर्मा जी… हर शेर जैसे किसी गहरी खामोशी की आवाज़ बनकर उभरता है। “मुस्कुराहट भी मेरे लब से थकान लेकर गई” और “ज़िंदगी क्या है, बस इक कर्ज़-सी लगती है अब” ये पंक्तियाँ तो भीतर तक उतर जाती हैं… एक ठहराव छोड़ जाती हैं। आपने दर्द को बहुत सादगी और सच्चाई से पिरोया है बिना शोर के, मगर बेहद असरदार। सच में, पढ़कर मन देर तक उसी एहसास में डूबा रहता है। 💫🤍✨
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आपके इतने भावपूर्ण और संवेदनशील शब्दों के लिए हृदय से धन्यवाद 🙏
यह जानकर बहुत संतोष मिला कि ग़ज़ल की पंक्तियाँ आप तक उस गहराई के साथ पहुँचीं, जैसी भावना से उन्हें लिखा गया था। आपने जिन अशआर का ज़िक्र किया, वे वास्तव में दिल के बहुत करीब हैं—और आपका उन्हें इस तरह महसूस करना, मेरे लिए सबसे बड़ी सराहना है।
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very nice .
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Thank you so much.
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