
यह कविता जीवन की उस खामोश पीड़ा को व्यक्त करती है, जो बाहर से दिखाई नहीं देती। इसमें अधूरी इच्छाएँ, टूटी उम्मीदें और भीतर चलती निराशा को बहुत सरल लेकिन गहरे तरीके से दिखाया गया है।
# टूटते हुए एहसास #
कभी-कभी
ज़िंदगी कोई शोर नहीं करती,
बस चुपचाप
अंदर ही अंदर टूटती रहती है।
हम हँसते हैं,
लोगों के बीच,
और कोई देख भी नहीं पाता
कि एक खामोशी
हमारे भीतर रो रही है।
जो मिला,
वो कभी अपना लगा ही नहीं,
और जो अपना था,
वो टिक नहीं पाया।
अजीब हिसाब है यह—
यहाँ सब कुछ मिलता है,
पर सही समय पर नहीं।
थक जाते हैं हम
खुद को समझाते-समझाते,
कि “सब ठीक हो जाएगा,”
जबकि अंदर से पता होता है—
कुछ चीज़ें कभी ठीक नहीं होतीं।
और फिर एक दिन
हम शिकायत करना भी छोड़ देते हैं,
क्योंकि समझ आ जाता है—
ज़िंदगी सुनती तो है,
पर जवाब नहीं देती।
(विजय वर्मा)
www.retiredkalam.com

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very nice .
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Verma ji, this poem is a quiet masterpiece. You’ve given voice to that invisible sorrow which most people carry alone, without any drama or self-pity. The line “Life listens, but it never answers” will stay with the reader for a long time. Your simplicity is your strength—you don’t shout the pain, you let it echo in the silence. Thank you for writing this. It feels less lonely to know someone understands. 🙏
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