
यह कविता उस गहरे प्रेम की कहानी कहती है, जहाँ दूरी होने के बावजूद एहसास कभी कम नहीं होता। यह गिरकर संभलने, यादों में जीने और उस अदृश्य साथ को महसूस करने की अभिव्यक्ति है—जहाँ कोई पास न होकर भी दिल के हर कोने में बसा रहता है।
# इश्क़ की सच्चाई #
तुम साथ न भी रहो तो क्या,
रास्ते मुझसे रूठते नहीं,
मेरे कदमों में ठहराव नहीं,
ये सफ़र कभी छूटते नहीं।
गिरा हूँ मैं कितनी ही दफ़ा,
हर ज़ख़्म ने कुछ सिखाया है,
आँसुओं ने थामा है हाथ मेरा,
मुझे फिर खड़ा होना सिखाया है।
हर आहट पे दिल क्यों काँपता है,
जैसे तुम लौट कर आओगे,
ख़ामोशी भी अब कहती है—
तुम मुझमें ही कहीं समाए हो।
दूरियों का ये खेल अजीब है,
तुम दूर हो फिर भी पास लगते हो,
मेरी हर धड़कन के कोने में,
तुम चुपचाप साँस लेते हो।
मैं चलता हूँ अपने ही संग,
पर तन्हा कभी होता नहीं,
तुम्हारी यादों की रोशनी में,
अँधेरा भी अब सोता नहीं।
शायद यही इश्क़ की सच्चाई है—
मिलना ज़रूरी नहीं होता,
कभी-कभी किसी का होना ही
ज़िंदगी भर साथ होता है।
(विजय वर्मा)
www.retiredkalam.com

Categories: kavita
very nice .
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Thank you so much.
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Beautifully written Verma ji, soft, deep, and very real. 💛 It captures how love isn’t always about presence, but about being felt, even in absence.
“Walking alone, yet never lonely” that line stays with you. ✨
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Vermavkvさん、おはようございます。いつも有難うございます🙇♂️
この語りは、近くにあっても遠くなった自身の人生を思わせます。あなたが共にいなくても、道は自身でとまりません。道は限りなく続く続いています。自身は自分自身とともに歩き、止まることはありません。決して孤独ではありません。あなたの記憶に自身があるように、自身の記憶の中にもずっとあなたがいるからです。そこには、必ずしも出会う必要がないものがあります☺️
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