
कुछ रिश्ते नाम के मोहताज नहीं होते।
वे बिना किसी परिभाषा के भी दिल की गहराइयों में बस जाते हैं—धीरे, चुपचाप, और हमेशा के लिए।
यह कविता उसी एहसास की कहानी है… जहाँ मोहब्बत है, मगर मुकम्मल नहीं; दूरी है, मगर बेगानापन नहीं।
शायद हर किसी की ज़िंदगी में ऐसा एक रिश्ता ज़रूर होता है—जो अधूरा होकर भी सबसे सच्चा लगता है
# अधूरी रौशनी का रिश्ता #
कुछ रिश्ते धूप नहीं होते,
बस धुंधली-सी रोशनी बनकर
दिल के कोनों में ठहर जाते हैं।
तुम भी वैसे ही हो—
न पूरी तरह मेरे,
न बिल्कुल पराए।
तुम्हारी खामोशी में
एक अजीब-सा शोर है,
जो हर रात मेरी नींदों को
धीरे-धीरे चुरा लेता है।
मैंने चाहा तुम्हें
एक खुले आसमान की तरह,
पर तुम तो बादल निकले—
छूने पर भी हाथ खाली रह जाए।
कभी लगता है
तुम मेरी सबसे गहरी सच्चाई हो,
और कभी—
सबसे खूबसूरत झूठ।
दिल कहता है थाम लूँ तुम्हें,
दिमाग़ समझाता है छोड़ दूँ,
और मैं…
इन दोनों के बीच
हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा बिखरता हूँ।
तुम्हारी यादें भी अजीब हैं—
न पूरी तरह सुकून देती हैं,
न पूरी तरह दर्द,
बस एक अधूरा-सा एहसास बनकर
रूह में उतर जाती हैं।
शायद कुछ कहानियाँ
मंज़िल तक पहुँचने के लिए नहीं होतीं,
बस हमें ये सिखाने के लिए होती हैं
कि मोहब्बत…
कभी-कभी अधूरी होकर ही
सबसे ज़्यादा मुकम्मल लगती है।
(विजय वर्मा)
www.retiredkalam.com
Categories: kavita
very nice .
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Thank you so much.
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