
यह ग़ज़ल जीवन की उस गहरी सच्चाई को छूती है, जहाँ हर मुस्कान के पीछे एक अनकहा कारण छिपा होता है। इसमें सफ़र, संघर्ष, मौन और आत्मा की उस अनंत लौ का ज़िक्र है, जो हर टूटन के बाद भी हमें संभाले रखती है। यह रचना याद दिलाती है कि ज़िंदगी की असली खूबसूरती मंज़िल में नहीं, बल्कि उस सफ़र में है जिसे हम हर दिन जीते हैं—कभी धूप, कभी छाँव के साथ।
ग़ज़ल — “अजब सा सफ़र”
ज़िंदगी का ये सफ़र भी अजब लगता है,
हर हँसी के पीछे कोई सबब लगता है।
राह में धूप कभी, छाँव कभी मिलती है,
दिल मगर फिर भी कहीं बेअदब लगता है।
शोर दुनिया का भले कितना भी बढ़ जाए,
मौन का स्वर ही हमें सुकून-भरा लगता है।
टूट कर भी जो सँभल जाए वही सच्चा है,
वक़्त का हर एक सितम इक अदब लगता है।
राख हो जाएँगे जीवन के सभी रंग, ये चेहरे,
भीतर इक दीप मगर बे-तलब लगता है।
हम तो चलते ही रहे, रुकना न सीखा हमने,
ये सफ़र ही हमें अब तो प्यारा सनम लगता है।
( विजय वर्मा )
www.retiredkalam.com

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वर्मा जी🌹
“भीतर इक दीप मगर बे-तलब लगता है…” यह शेर आत्मा की उस शाश्वत ज्योति की ओर संकेत करता है, जो बिना किसी अपेक्षा के निरंतर जलती रहती है।
यही तो असली जीवन-तत्व है।
हृदय से नमन इस गहन और आत्मस्पर्शी रचना को।🙏
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आपके इतने गहन और भावपूर्ण शब्दों के लिए हृदय से आभार 🙏🌸
आपने जिस सुंदरता से उस पंक्ति के मर्म को समझा, वही उस शेर की सच्ची आत्मा है। भीतर का वह दीप सच में बिना किसी अपेक्षा के जलता है—बस अपने अस्तित्व से ही जीवन को अर्थ देता हुआ।
आपका यह नमन मेरे लिए बहुत मूल्यवान है। ऐसी संवेदनशील दृष्टि ही रचना को पूर्णता देती है। सादर प्रणाम 🙏✨
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