# हाँ, मैं सड़क हूँ #

हाँ, मैं सड़क हूँ,

हाँ, मैं सड़क हूँ,
अनगिनत मौसमों की गवाह।
धूप की तपिश सहती,
बारिश की ठंडक ओढ़े,
मैं यहीं की यहीं पड़ी हूँ..
स्थिर, मगर सब कुछ देखती हुई।

रोज़ नए मुसाफ़िर मुझ पर से गुज़रते हैं,
कुछ अपने से, कुछ बिल्कुल अजनबी।
सब बेचैन, सब परेशान—
हर किसी को अपनी मंज़िल की तलाश है।

हर कदम में अधीरता है,
हर आँख में जल्दबाज़ी का भँवर।
समय हमेशा कम पड़ जाता है,
रुकने की फुर्सत नहीं,
और जीने की चाहत
शायद कहीं रास्ते में छूट गई है।

मैं देखती हूँ—
जैसे सब कुछ पा लिया हो,
फिर भी न चैन है, न संतोष।
सब भागते हैं,
परछाइयों की तरह,
बिना यह जाने कि
किससे आगे निकलना है।

मैं जानती हूँ—
सपनों का पीछा करना आसान है,
मगर खुद को जीना,
थोड़ा ठहरना,
अपने भीतर झाँकना—
शायद सबसे मुश्किल काम है।

अगर यही ज़िंदगी कहलाती है,
तो मैं ही ठीक हूँ।
न ज़्यादा की लालच,
न किसी से उम्मीद,
न भविष्य की कोई चिंता।

हाँ, मैं सड़क हूँ—
मेरे पाँव स्थिर रहते हैं,
फिर भी मैं बहती रहती हूँ।
मैं देखती हूँ, सहती हूँ,
और फिर भी—
कभी थकती नहीं।

कभी-कभी,
जब रात की चाँदनी मुझे छूती है,
उस समय, मैं महसूस करती हूँ—
हर कदम, हर मुसाफ़िर,
एक कहानी है,
एक जीवन है,
उसे जीना है,
पर कैसे ?

(विजय वर्मा)
www.retiredkalam.com



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8 replies

  1. I am curious what language do you speak and write ?😊

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  2. very nice .

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  3. A powerful opening—speaking as the road itself, carrying the weight of time, seasons, and countless untold journeys.

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