# रूह का सफ़र #

रूह का सफ़र”—यह केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि एक ऐसा आंतरिक अनुभव है जहाँ मन अपनी गहराइयों में उतरकर खुद से मिलता है। इस सफ़र में दुनिया की चमक-दमक, नाम-दौलत, रिश्तों की भाग-दौड़ सब पीछे छूट जाते हैं, और बस बचता है वह उजाला जो भीतर जल रहा होता है।

यह कविता उसी यात्रा का गीत है—अंतर की बेचैनी, दर्द की शिक्षा, और आत्मा की रोशनी को समर्पित।

रूह का सफ़र

रूह के सफ़र में ये दिल बे-क़रार है,
बाक़ी जहाँ फ़ना है—यही बस करार है।

हर साँस कह रही है—चलो, आगे बढ़ो तुम,
रास्ता चाहे कठिन हो, उसी में निखार है।

टहनी से टूटकर भी जो गिरा था कभी कहीं,
उस फूल की महक में अभी तक बहार है।

दुनिया के मेले में क्यों ढूँढते हो खुद को तुम?
अपने ही भीतर छुपा एक रूह का दयार है।

दिल पर जो चुभन लगी—वो भी ज़रूरी थी शायद,
दर्द की इसी ज़मीं पर मोहब्बत की फ़सल तैयार है।

चेहरे बदल गए सब, और मौसम भी बदल गए,
पर रूह की राह पर अब भी वही उजियार है।

खोया जो कुछ भी—जाने क्यों लगता है आज,
सब कुछ मिटा तो क्या? सफ़र ही आधार है।

नाम, दौलत, शोहरत—सब हवा के खिलौने हैं,
सच्चाई का दिया ही हर रात में सितार है।

बाक़ी जहाँ फ़ना है, — फ़ना हो के रह भी जाए,
रूह का ये सफ़र ही मेरी सदा की पहचानदार है।

( विजय वर्मा )
www.retiredkalam.com



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2 replies

  1. वर्मा जी, “रूह का सफ़र” एक गहन आध्यात्मिक यात्रा है जो आत्मा की खोज, दर्द के अनुभवों, और अंततः भीतर के उजाले की खूबसूरती को भावपूर्ण और सरल शब्दों में प्रस्तुत करती है।

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    • वाकई, आपने बिलकुल सही कहा। “रूह का सफ़र” केवल शब्दों का मेल नहीं, बल्कि एक ऐसी अंतर्यात्रा है जहाँ इंसान अपने ही भीतर उतरकर दर्द, सीख, साहस और प्रकाश—सबका स्पर्श महसूस करता है।

      आपकी यह व्याख्या न केवल शीर्षक की गहराई को उजागर करती है, बल्कि कविता की आत्मा को भी पूर्ण रूप से व्यक्त करती है।

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