
आईना हूँ मैं” एक आत्मदर्शी कविता है, जो हमें आम ज़िंदगी की भीतरी परतों की ओर ले जाती है। यह केवल चेहरे को नहीं, बल्कि आत्मा की उस छवि को भी देखती है जिसे हम अक्सर नजरअंदाज़ कर देते हैं।
इस कविता में एक जीवन की यात्रा है—बचपन के सपनों से लेकर कवि बनने तक, और हर उस अहसास तक जो समय ने धीरे-धीरे आकार दिया। यह कविता हमें याद दिलाती है कि आईना सिर्फ बाहरी चेहरा नहीं दिखाता, वह हमारे भीतर के सच को भी सामने लाता है।
आईना हूँ मैं
हर रोज़ मैं आईने में झाँकता हूँ,
सिर्फ़ बालों की सफ़ेदी नहीं देखता हूँ।
नज़रों में जो कहानियाँ पलती हैं,
हर सुबह मैं उन्हीं को पढ़ता हूँ।
देखता हूँ वो बच्चा, सपनों से भरा,
अब जीवन की दौड़ में थोड़ा सा थका।
एक कवि बना, दिल में गहराई लिए,
जो रंगों में शांति पाए, चुपचाप जिए।
आईना हँसी भी दिखाता है, आँसू भी,
सुख-दुख के रंग, वो बीते पल भी।
कुछ अनकहे जज़्बातों की झलक,
कमज़ोरी में भी साहस की चमक।
चेहरे पर समय की रेखाएँ हैं,
पर आत्मा में अब भी तरंगें हैं।
सिर्फ़ शक्ल नहीं, मैं एक कहानी हूँ,
सच, ज़िंदगी की टेढ़ी-मेढ़ी रवानी हूँ।
जब मैं आईने से नज़रें मिलाता हूँ,
ज़िंदगी को फिर से मुस्कुराता पाता हूँ।
आईना कहता है- बेबाक और सच्चाई —
“तू आज भी वही, विन्दास ज़िंदगी सजाई ।
– विजय वर्मा
www.retiredkalam.com
Categories: kavita
Interesting!
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Thank you so much.😊
I’m glad you found it interesting.
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very nice .
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Thank you so much.
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