“बारिश की बाँहों में”

यह एक भावनात्मक और आत्मीय कविता है, जो बारिश के माध्यम से बचपन की यादों, सादगी भरे पलों और जीवन की छोटी-छोटी खुशियों को सुंदरता से उकेरती है। यह कविता एक ऐसे व्यक्ति की मनःस्थिति को दर्शाती है जो बारिश की ठंडी बूँदों में भीगते हुए वर्तमान में पूरी तरह उपस्थित है। छाते के नीचे खड़े होकर वह ना केवल अपने तन को, बल्कि वर्षों की थकान, चिंताओं और स्मृतियों को भी इस बारिश में धो डालता है।

यह कविता सुकून, आत्म-चिंतन और जीवन की उन अनमोल क्षणों की बात करती है, जिन्हें हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं। बारिश की बूँदें यहाँ केवल जल की बूँदें नहीं, बल्कि एक आत्मीय साथी हैं जो कहती हैं—”तू अकेला नहीं।”

“बारिश की बाँहों में”

भीगती दोपहर, तन में ठंडी नमी,
छाता थामे खड़ा हूँ मैं, बस यूँ ही थमी-थमी।
एक मुस्कान है चेहरे पर, जैसे बचपन लौट आया हो,
भीगी धरती की सौंधी खुशबू में, मन गीत गुनगुनाया हो।

छोटी-सी बूँदें, बड़ी-सी खुशी,
मन की गलियों में दौड़ी कोई बचपन की हँसी।
न कोई फ़िक्र, न कोई काम का बोझ,
बस आज की बारिश है, और मैं पूरी तरह मौजूद।

सालों की थकन धुल गई इन बूँदों से,
यादें भीग गईं—कभी छतरी के नीचे, कभी आँखों के कोनों से।
जीवन का यह पल, सादगी से भरा,
पर इस सादगी में ही तो छुपा है मेरा सारा जहाँ।

कोई पूछे—क्या है सुकून की असली परिभाषा?
तो कहूँ—यह लम्हा… यह बारिश… और मन की भाषा।
जहाँ मैं भीग रहा हूँ, और दिल भी है सूखा नहीं,
वो बरसात की बूँदें भी कहती हैं—”तू अकेला नहीं ।

(विजय वर्मा)
www.retiredkalam.com



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8 replies

  1. वर्मा जी,🙏
    आपकी यह कविता पढ़कर ऐसा लगा मानो सचमुच बारिश की बूंदें मेरे कंधों पर उतर आई हों और बचपन की गलियों में ले गई हों। आपने न सिर्फ़ बारिश का चित्र खींचा है, बल्कि उसके साथ जुड़े मन के भीतरी मौसम को भी उतनी ही कोमलता से शब्द दिए हैं।

    ‘बारिश की बाँहों में’ शीर्षक जितना खूबसूरत है, उतना ही सजीव आपका भावचित्रण है जहाँ हर बूँद सिर्फ़ पानी नहीं, बल्कि यादों, सुकून और अपनत्व का संदेश लेकर आती है। यह कविता पढ़ते हुए लगता है कि हम सबके भीतर एक बच्चा अब भी है, जो भीगना जानता है, हँसना जानता है, और दुनिया की थकान को कुछ पलों के लिए भूल सकता है।

    आपकी पंक्तियाँ जैसे कह रही हों सुकून का पता किसी बड़ी मंज़िल में नहीं, बल्कि उन छोटे-छोटे पलों में है, जिन्हें हम अक्सर नजरअंदाज़ कर देते हैं।
    मन से धन्यवाद, इस भीगी दोपहर और नम मुस्कान का अनुभव साझा करने के लिए।

    कोई भाग रहा है छतरी तले,
    कोई मस्ती में गा रहा है,
    बरसते बादलों में हर चेहरा नया रंग पा रहा है।
    मैं भी ठहर गया हूँ,
    इस नज़ारे को जीने,
    क्योंकि ऐसे भीगते लम्हे,,,,
    दोबारा कहाँ मिलेंगे।
    🌹🌹🌹🌹🌹

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    • आपके शब्द पढ़कर मन सचमुच भीग उठा…
      जैसे मेरी कविता की बूँदें आपके दिल तक पहुँचीं और वहीं ठहर गईं।

      आपने जिस संवेदनशीलता से “बारिश की बाँहों में” को महसूस किया है, वह मेरे लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं। आपकी प्रतिक्रिया ने मेरी कविता को नए अर्थ दे दिए—आपके भाव, आपकी स्मृतियाँ और आपकी वो भीगी हुई मुस्कान अब इस कविता का हिस्सा बन गई हैं।

      आपने बिल्कुल सही कहा—सुकून बड़ी मंज़िलों में नहीं, बल्कि उन छोटे-छोटे पलों में छिपा होता है जिन्हें हम जीते-जीते अनदेखा कर जाते हैं।

      आपकी ये अंतिम पंक्तियाँ –
      “मैं भी ठहर गया हूँ,
      इस नज़ारे को जीने,
      क्योंकि ऐसे भीगते लम्हे…
      दोबारा कहाँ मिलेंगे।”

      — दिल को छू गईं। सच में, कभी-कभी ठहर जाना ही आगे बढ़ने का सबसे खूबसूरत तरीका होता है।

      आपका यह भावपूर्ण स्नेह और समर्थन मेरी रचनात्मक यात्रा को और भी अर्थपूर्ण बना देता है।

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  2. What a beautiful work of art.🙂🙏🏻✍🏻

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  3. Bahut sundar .

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  4. Nice post 💯

    God bless you my friend 🌈

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    • बहुत धन्यवाद! 😊
      आपकी सराहना दिल से लगी।
      आपका साथ और प्रोत्साहन ही मेरी लेखनी को और बेहतर बनाने की प्रेरणा देता है। 🙏✍️

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