
यह कविता समाज में फैली नफरत, अन्याय और पीड़ा की गहरी छवि प्रस्तुत करती है। यह पाठकों को हतोत्साहित करने के बजाय एक नई आशा और बदलाव की ओर प्रेरित करती है। यह संदेश देती है कि यदि हम इंसानियत की ज्योति जलाएँ, तो सवेरा अवश्य आएगा।
नया सवेरा
नफरत की आँधी, धुएँ का साया,
हर ओर फैला है अंधेरा छाया।
भूख से बिलखते हैं लाखों चेहरे,
बिखरते सपने और टूटते हौसले।
गूँजता है दर्द, सिसकता है शहर,
खामोशी के आगोश में है सारा घर।
लोग ज़िंदा हैं, पर शब्द नहीं है ,
दिलों में सुलगती आग यही है ।
घुट-घुट कर यूँ कब तक रहोगे?
ज़ुल्मों से तुम कब तक डरोगे?
उठो, जलाओ उम्मीद की ज्योति,
अगर सवेरा होगा तो रोशन रहोगे।
नफरत की दीवार गिरानी होगी,
इंसानियत की राह बनानी होगी।
आओ हम मिलकर नया गीत गाएँ,
एक नई दुनिया की ओर कदम बढ़ाएँ!
(विजय वर्मा)

Categories: kavita
Beautiful post 🕺🎸
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Thank you so much for your visit.
I am happy you enjoyed it.
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very nice .
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Thank you so much..
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