# सांझ की बेला में…

यह तस्वीर हमें सिखाती है कि जीवन की आपाधापी के बाद, किसी शांत दोपहर में किसी अपने के साथ बैठकर सिर्फ “होना” भी कितना खूबसूरत होता है। यह क्षण शायद शब्दों से परे है — पर कविता ने उसे थोड़ा महसूस कराने की कोशिश की है।

हाँ, यह कविता बताती है कि कभी-कभी मौन में भी गहराई होती है, और साथ में बिताए कुछ क्षण ही सच्ची शांति देते हैं |

सांझ की बेला में… 🌿

हरी पत्तियों की छांव तले,
जीवन की दो कहानियाँ बैठी हैं।
एक मौन है, फिर भी बहुत कुछ कहती,
दूजी आँखों से ही भावनाएँ बुनती है।

सूखे पत्तों की चादर ओढ़े,
धरती भी थकी-सी लगती है।
समय मानो ठहर गया हो पलभर,
जैसे किसी धुन की आख़िरी लय बजती है।

न कोई हड़बड़ी, न कोई दौड़,
बस मन की बातों का मेला है।
कभी हँसी, कभी गूंगे संवाद,
हर जज़्बा अकेले ही झेला है।

कितनी राहें पार की हमने,
कितने ही पतझर सह लिए हैं।
अब बस यही सुकून चाहिए —
कुछ पल इस साए में जी लिए जाएं।

यह बेंच नहीं, कोई मंदिर है,
जहाँ उम्र इबादत बन जाती है।
जहाँ यादें फिर से ज़िंदा होतीं,
और दोस्ती फिर से मुस्काती है।
( विजय वर्मा )



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2 replies

  1. very nice .

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