
यह कविता दिल की गहरी भावनाओं, तन्हाई, और दर्द को व्यक्त करती है, जो अक्सर हमारी ज़िन्दगी के तूफान में छुपे होते हैं। इंसान भीड़ में रहते हुए भी अकेला महसूस करता है और उसकी भावनाएँ निःशब्द हो जाती हैं।
यह कविता इसी पीड़ा, उम्मीद, और आत्म-संघर्ष को अभिव्यक्त करती है, जहाँ दिल की आवाज़ अनसुनी रह जाती है, और उम्मीद के धागे हमें हिम्मत से आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।
“तनहाई का शोर”
तूफ़ान दिल में उठता है,
पर आवाज़ दब जाती है,
यहाँ भीड़ तो बहुत है पर,
तनहाई मेरे संग आती है।
आँखों में पानी है, मगर
पोंछने वाला कोई नहीं,
अपनी सुनाने वाला है यहाँ,
मेरी सुनने वाला कोई नहीं।
बहुत सारे हैं शिकवे-गिले,
दिल में दबे अरमान हैं,
कौन सुनेगा उन किस्सों को,
मेरे अपने भी अनजान हैं।
मैं कैसे कहूँ, किससे कहूँ,
यहाँ घुटन और खामोशी है,
सवाल सब से पूछ रहा हूँ,
कौन यहाँ पर दोषी है?
ऐ दिल बता, मैं क्या करूँ?
शोर में कैसे शांत रहूँ?
यहाँ दर्द समझने वाला नहीं,
तनहाई कैसे मैं सहन करूँ?
ये जो उम्मीद के धागे हैं,
हिम्मत में मुझसे आगे हैं,
आँसू पोंछ, बढ़ते जाना मौन,
पर उनको ये समझाए कौन ?
(विजय वर्मा )

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Categories: kavita
दोषी तो हम है ।
हम ने ही दौड़ना शुरू की थी।
पालने के थे सभी को।
अब मत तकजा , है मन !
हमें जीना है अंत तक ,
फिर जाना है ख़ुशी से
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वाह, कितनी गहराई और सच्चाई है आपके शब्दों में! 💖
यह आत्ममंथन और संतोष की भावना हमें जीवन का असली अर्थ सिखाती है।
जीवन के हर पल को खुलकर जीने और अंत तक मुस्कुराते रहने की प्रेरणा देती आपकी ये अभिव्यक्ति अद्भुत है। 🙏
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🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🎉🎉🎉🎉🎉
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Good morning. Have a nice day.
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very nice
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Thank you so much.
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वाह बहुत खूब।
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बहुत-बहुत धन्यवाद! 😊
आपकी सराहना मेरे लिए प्रेरणादायक है। आप से मिले प्रशंसा के शब्द मुझे और बेहतर लिखने की ऊर्जा देते हैं।
कृपया ऐसे ही अपनी राय देते रहें। 🙏✨
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