
यह कविता एक अकेले यात्री की भावनाओं को अभिव्यक्त करती है, जो प्रकृति के बीच भटकते हुए अपने प्रिय का इंतजार करता है।
प्रियतम की खामोशी और आंखों में छिपा प्यार, इन्ही भावनाओ को व्यक्त करती मेरी यह कविता प्रस्तुत है |
तुम्हारा प्यार बोलता है
दिन ढलता है, अंधेरा घिरता है,
मैं अकेला ही , दूर तक भटकता हूँ।
जब तारे टिमटिमाते है , चाँद नज़र आते है,
मैं हर पल तुम्हारा इंतज़ार करता हूँ |
जंगल की गहराईयों में, खो जाता हूँ ,
पथिक बन पथ का ही हो जाता हूँ ।
तुम्हारे प्यार,के सहारे ही ज़िंदा हूँ,
कभी जागता हूँ, कभी सो जाता हूँ |
पहाड़ो से टकराती हुई ये कल कल नदी ,
कानो में मेरे मधुर संगीत,घोलता है
तुम्हारे नयनो की ये कातिल चितवन,
ना बोल कर बहुत कुछ बोलता है, |
रात का अंधेरा तो मेरे लिए
दिन के उजाले की उम्मीद होता है
तुम रहती हो भले खामोश मगर
नज़ारे झुकाये तुम्हारा प्यार बोलता है |
(विजय वर्मा )

Categories: kavita
अच्छी कविता।
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बहुत बहुत धन्यवाद |
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very nice.
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Thank you.
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