# तुम ही हो मेरी ज़िंदगी #

इस कविता में लेखक ने अपने प्रेम की गहराई और निष्ठा को दिखाया है। वह अपनी प्रिया के बिना जीने की मजबूरी को सहता है, लेकिन उसके दिल में उसके लिए एक जगह बनाए रखता है।

वह अपनी प्रिया को अपनी ज़िंदगी का रंग और संग मानता है, जिसके बिना वह बैरंग और अकेला है। इस कविता में एक ऐसा प्रेम है, जो विरह के बावजूद भी अटूट है |

तुम ही हो मेरी ज़िंदगी

मेरा दिल ढूँढ़ता है फिर वही फुर्सत के पल,

जहाँ हम तुम भविष्य की कल्पनाओं में खो जाते थे,

सब कुछ अपना सा लगता था,

आज सब बेगाना लगता है।

तुम एक पवन के झोके से मेरे जीवन में आई,

कुछ पल सावन का एहसास दे, तुम  चली गई,

तेरे जाने के बाद पतझड़ का सामना किया जा रहा हूँ।

हाँ, जैसी भी है ज़िंदगी, बस जिये जा रहा हूँ |

तेरी यादों में ज़िंदगी लगती है नवरंग

तेरे बिना, मेरी दुनिया है बैरंग |

तेरी यादों में खोकर ही,

मैं अपनी ज़िंदगी जी रहा हूँ।

मुझे नहीं मालूम जहर और जाम

मैं तो बस पीए जा रहा हूँ |

सोचता हूँ, कब आएगा वह दिन, जब

तुम फिर से मेरे पास आ जाओगी, और

मेरी ज़िंदगी को खुशियों से भर जाएगी

यह तो बस एक ख्वाब है, जो कभी पूरा न होगा

फिर भी मैं इसे दिल में बसाए रखता हूँ

क्योंकि तुम ही हो मेरी ज़िंदगी का रंग

तुम ही हो मेरी ज़िंदगी का संग |

       ( विजय वर्मा )

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