# कौन हो तुम ?

इस कविता में कवि एक विशेष व्यक्ति (प्रियतम )को अपने ख्यालो में ढूंढ रहा है, लेकिन उनका पता नहीं होता कि वे कौन हैं या कहाँ हैं। यह कविता प्यार और आशा की भावनाओं को दर्शाती है जो एक व्यक्ति के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

कविता में व्यक्त किए गए भावनात्मक सन्दर्भ और उम्मीदें सुन्दर लहजे में प्रस्तुत करने की कोशिश है |

कौन हो तुम ?

कौन हो तुम, पहचाना कभी नहीं,

कहाँ हो तुम, जाना कभी नहीं। 

जानता  हूँ तो बस इतना,

तुम्हारे बिना ज़िन्दगी अधूरी लगती है

ज़िन्दगी जीना एक मज़बूरी लगती है |

मैं खोया खोया सा तुम्हे ढूंढता रहता हूँ,

कहाँ हो तुम, खुद से पूछता रहता हूँ

तुम मेरी ज़िन्दगी की आशा हो,

 तुम मेरी ज़िन्दगी का सहारा हो।

तुम मेरे बिना यहाँ अधूरे हो,

अगर मिल जाएँ तो ख्वाब पुरे हों |

 तुम्हारी तस्वीरें मेरे आँखों में बसी हैं

तुम्हारी यादें मुझे बेचैन करती है,

तुम मेरे ख़्वाबों में आती हो,

आकर अक्सर मुझे रुलाती हो |

सवाल तो तुमसे फिर भी यह है

कौन हो तुम, पहचाना कभी नहीं,

कहाँ हो तुम, जाना कभी नहीं ? 

(विजय वर्मा )

BE HAPPY….BE ACTIVE….BE FOCUSED….BE ALIVE…

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6 replies

  1. अतिसुंदर 🌺👌👌

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  2. खूबसूरत रचना 👏👏🥰🥰👌💯

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  3. 🤍🖤

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