# मेरा वो बचपन # 

गुज़र जाते है खुबसूरत लम्हें , यूँ ही मुसाफिरों की तरह..

यादें वही खड़ी रह जाती है, रुके रास्तों की तरह..

एक उम्र के बाद, उस उम्र की बातें उम्र भर याद आती है ,

पर वह उम्र फिर उम्र भर नहीं आती …||

याद आ रहा है वो गुज़रा हुआ ज़माना, जी हाँ आज हमारा बचपन फिर से याद आ रहा है | हमारे घर के पडोस में मिश्रा  जी रहते थे | उन्होंने  घर के पिछवाड़े  में बहुत सुन्दर बगीचा लगा रखा था जिसमे लगे पेड़ से पपीता और अमरूद तोड़कर खाना आज भी नहीं भूला हूं।

खगौल एक छोटी सी जगह है जहाँ मेरा बचपन बीता था |  मिश्रा जी का बगान जितना सुन्दर और बड़ा था, उनका दिल उतना ही  छोटा था | वे हम बच्चो को कभी भी बुलाकर पपीता या अमरुद खाने को नहीं देते थे |

इसका मुख्य कारण शायद यह था कि वे मुझे और मेरे साथियों को  उदंड और बदमाश समझते थे |  हालाँकि उनकी बेटी सीता जो हम-उम्र थी उसे मैं बहुत पसंद करता था |  वो भी कभी – कभार अपने पिता जी से आँखे चुरा कर पके पपीता और अमरुद हम लोगों को दे दिया करती थी |

मिश्रा जी का  जितना नज़र अपने बगान पर रहता था उससे कहीं ज्यादा वो अपनी बेटी सीता पर रखते थे | हम सब दोस्त उनकी नज़र में नालायक और पढाई – लिखाई नहीं करने वाला बालक थे |

लेकिन उनके घर के आगे से जब भी गुज़रता तो पेड़ पर पके अमरुद और पपीता ज़रूर देखता और साथ ही साथ सीता को भी हमारी नज़रें ढूंढती ताकि चोरी छुपे पके अमरुद का स्वाद मिल सके |

लेकिन ज्यादातर उसके पिता जी से ही नज़रे  चार हो जाया करती थी | वे बरामदे में ही बैठ कर पेपर पढ़ते और अन्य कोई काम करते | दिन में दो – तीन चक्कर तो लगा ही लेता था |

यह सही था कि हम दोस्तों की टोली थोडा शरारती था | खुराफात  करने की नयी नयी योजनायें दिमाग में चलती ही रहती थी |

एक दिन  हम सभी दोस्त पास के पुलिया पर जाकर बंशी से मछली पकड़ रहे थे | यहाँ छोटा सा नाला बहता था जिसमे गरई मछली बहुत थी और बंसी से मछली  फ़साने में एक अलग ही आनंद आता  था | 

तभी बारिस शुरू हो गई | भाग कर  हमलोग पास के बिजली – ऑफिस के प्रांगन में चले गए ताकि बारिस से बचा जा सके |  अचानक बारिस आने से हमलोग थोडा भींग चुके थे |

तभी राजू को एक आईडिया सुझा | उसने कहा – हमलोग तो आधे भींग ही चुके है तो ऐसे में मिश्रा जी के बागीचे में घुस कर अमरुद और पपीते तोड़ कर क्यों न खाया जाए | बारिस के चलते मिश्रा जी घर से बाहर आ ही नहीं सकते है |

यह आईडिया हम सब को सही लगा | फिर क्या था,  हमलोग योजना के अनुसार धीरे से उनके बगीचे में घुस कर अमरुद के पेड़ पर चढ़ गए और पके – पके और मीठे अमरुद निर्भय होकर तोड़ने लगे | तभी मिश्रा जी अपने घर के आँगन से हमलोगों को पेड़ पर चढ़े देख लिया और वही से वे गाली गलौज करने लगे |

हमलोग को पता था कि इतनी बारिस में वो हमारे पास आ नहीं सकते है … इसलिए हमलोग आराम से अमरुद तोड़ते रहे |

बस, मिश्रा जी का गुस्सा सातवे आसमान पर था | वे अन्दर जाकर अपने अलासिसन कुत्ते की चेन खोलने  लगे | तभी सीता बारिस की परवाह न करते हुए दौड़ कर पेड़ के नीचे आयी और जोर  से कहा — अरे भोला (मेरा बचपन का नाम ), ज़ल्दी से पेड़ से उतर कर भाग जा | मेरे पिता जी झबरू (कुत्ता) को खोलने गए है |

हमलोगों को उनके खूंखार कुत्ते से बहुत डर  लगता था | मैं सीता की बात सुन तुरंत पेड़ से अचानक  कूद गया | पैर में बहुत जोर की पीड़ा हुई,  हालाँकि भगवान् का शुक्र था कि पैर टुटा नहीं | मैं दर्द की परवाह किये बगैर उठ कर भागने की कोशिश कर रहा था ताकि 14 इंजेक्शन लगवाने से बचा जा सके |

मैं गेट के बाहर  पहुँच कर पीछे मुड़ा तो देखा सीता अभी तक बारिस  में ही  खड़ी हमें वहाँ से जाते देख रही थी | 

उसके चेहरे पर एक मुस्कान थी,  जीत की मुस्कान |

मैं तो उसके  पिता के प्रकोप से बच गया,  लेकिन शायद सीता नहीं बची … उसे 14 इंजेक्शन तो नहीं लगी  लेकिन दर्द की गोली तो उसे ज़रूर ही खानी पड़ी होगी ?

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16 replies

  1. मजेदार संस्मरण।

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  2. Apka lekhan aur usme chun kar istemal kiye shabd bahut hi khoobsurat ashaash dilate hai unmokt isthitoyo ka chitran krake , apke dwara rachit kahaniyon me ek maram hai. Aapke dwara ye mera bachpan kahi na kahi hame bhi apne bachpan ko yaad jarur dila dia.

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  3. Beautiful childhood memory and especially Mishra ji👍

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  4. christinenovalarue's avatar

    💜

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  5. Good childhood 👌🏻👌🏻👌🏻

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  6. यह भोला इतना भोला नहीं था, सीता को भी ले डूबा। बढ़िया संस्मरण 😄

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    • हा हा हा , आपने ठीक कहा सर |
      बचपन की यादें हमेशा चेहरे पर मुस्कुराहट बिखेरती है |
      तारीफ के लिए बहुत बहुत धन्यवाद सर जी |

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