
यह कविता इस भावना को समर्पित है कि महानता ऊँचा उठने में नहीं, बल्कि दूसरों को उठाने में है। हम सूरज न सही, एक दीपक बनकर अँधेरा मिटा सकते हैं; ईश्वर न सही, किसी के बुझते हौसलों में उम्मीद जगा सकते हैं। सच्ची सफलता इसी में है कि हमारे होने से किसी के जीवन में खुशियाँ, मुस्कान और नई आशा आए। 🌷
मेरे हौसले
मैं छोटा सही, पर बेअसर नहीं हूँ
मैं सूरज नहीं, जो जग को रोशन कर सकूँ,
मैं मिट्टी का दीप हूँ, अँधेरों से लड़ सकूँ।
मैं सागर नहीं, जो प्यास बुझाने से रहे परे,
मैं छोटा-सा कुआँ हूँ, जो राहगीरों के काम आए।
मैं पर्वत नहीं, जो आसमान को छू सकूँ,
मैं हाथ हूँ किसी का, जो गिरते को थाम सकूँ।
मैं पंछी नहीं, जो बादलों के पार उड़ सकूँ,
मैं ज़मीन पर रहकर भी सपनों को पंख दे सकूँ।
मैं ईश्वर नहीं, जो तक़दीर बदल दूँ किसी की,
पर बुझती उम्मीदों में लौ जगा सकता हूँ।
न दौलत का गुरूर, न शोहरत की कोई चाह,
बस किसी उदास चेहरे तक पहुँचा सकूँ मुस्कान।
मेरी पहचान ऊँचाइयों से नहीं, मेरे काम से हो,
मेरे होने से किसी की ज़िंदगी में सुबह हो।
मैं छोटा सही, मगर मेरा हौसला कम नहीं,
मैं सब कुछ नहीं कर सकता—पर मैं कुछ भी नहीं नहीं!
जब तक साँस है, यही पैग़ाम गुनगुनाऊँगा,
ख़ुद भी मुस्कुराऊँगा, औरों को भी हँसाऊँगा।
मैं दुनिया बदलूँ या न बदलूँ, यह ज़रूरी नहीं,
किसी एक का जीवन सँवार दूँ—
मेरे लिए इससे बड़ी जीत कोई नहीं।
(विजय वर्मा)
www.retiredkalam.com

Categories: kavita
Dear Verma ji, your poem “Mere Hausle” is truly beautiful and inspiring. Its spirit of humility, compassion, and bringing light into others’ lives touches the heart. Lines like “I may not be able to do everything—but I am not nothing!” and “If I can turn even one life around—no victory is greater than that for me” carry deep meaning. You have expressed the true definition of greatness in simple words—lifting others, giving them courage, and bringing a smile to their faces. Heartiest congratulations on such a thoughtful and heartfelt creation! 🌷
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Nice poem!
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