# इंसानियत की ओर #

यह कविता मानवता, प्रेम, करुणा और प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन जीने की एक भावपूर्ण पुकार है। कवि एक ऐसी दुनिया का स्वप्न देखता है जहाँ नफ़रत और दूरी की जगह विश्वास, अपनापन और सद्भाव हो। संदेश सरल है—जीवन छोटा है, इसलिए प्रेम बाँटें, दिल जोड़ें और अपने पीछे इंसानियत की कुछ सुंदर यादें छोड़ जाएँ।

इंसानियत की ओर

चलो फिर एक बार,
मानवता की दुनिया में चलते हैं,
जहाँ प्रेम के दीप जलते हों,
और दिलों में विश्वास पलते हों।

जहाँ फूलों की खुशबू बिखरे,
केसर की महक हवाओं में हो,
सरसों के पीले आँचल में,
धरती सजी बहारों में हो।

कल-कल करती नदियों के स्वर,
जीवन का संगीत सुनाते हों,
रंग-बिरंगे फूलों पर
तितलियाँ सपने सजाती हों।

न कोई बैर हो, न कोई दूरी,
न आँखों में नफ़रत का साया हो,
हर चेहरे पर मुस्कान खिले,
हर दिल में अपनापन छाया हो।

क्यों यूँ ही पल-पल बीत रही
जीवन की अनमोल कहानी?
कुछ पल अपने लिए भी जी लें,
कुछ बाँटें खुशियाँ और जवानी।

प्रकृति ने जो जीवन सौंपा है,
उसका हर पल उत्सव मनाएँ,
प्रेम, करुणा और सद्भाव से
इस धरती को स्वर्ग बनाएँ।

चलो फिर एक बार
इंसानियत का दीप जलाएँ,
बिखरे हुए दिलों को जोड़कर
एक नई दुनिया बसाएँ।

जीवन की इस छोटी-सी राह में
कुछ ऐसी यादें छोड़ चलें,
जब भी ज़िक्र हो मानवता का,
हम यादों के फूल बनकर खिलें।

— विजय वर्मा
www.retiredkalam.com



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