
आज का ब्लॉग लिखने में कुछ ज्यादा ही मज़ा आ रहा है।
वैसे तो हर ब्लॉग लिखते समय मुझे खुशी मिलती है, लेकिन आज कुछ अलग ही अनुभव हो रहा है। शायद इसलिए कि आज मैं अपनी किसी बड़ी उपलब्धि की बात नहीं कर रहा, बल्कि उस हुनर की कहानी सुना रहा हूँ, जिसके बारे में कभी मैंने सपने में भी नहीं सोचा था।
❤️मैं कलाकार कैसे बना?
इसका जवाब सुनकर शायद आप भी मुस्कुरा दें।
क्योंकि मेरी कहानी में प्रतिभा से ज्यादा मजबूरी, मेहनत से ज्यादा खाली समय, और अभ्यास से ज्यादा झाड़ू-पोछे से बचने की रणनीति शामिल है!
“कभी-कभी जिंदगी हमें वही काम करने पर मजबूर करती है, जिसे करने की हमने कभी कल्पना भी नहीं की होती।”

❤️एक फोन ने खोल दी पोल
आज सुबह मैंने अपनी एक ड्राइंग-पेंटिंग के साथ ब्लॉग पोस्ट किया—“Journey of an Artist”।
पोस्ट करने के कुछ ही देर बाद मेरे दोस्त कामरान का फोन आया।
“अरे वर्मा जी! बहुत-बहुत मुबारक हो!”
मैंने पूछा, “भाई, किस बात की मुबारक?”
वह बोला, “इतनी अच्छी पेंटिंग बनाने के लिए! आपने यह सब कब सीख लिया? पहले तो कभी आपके इस शौक के बारे में सुना ही नहीं!”
अब उसे क्या बताता कि मेरे अंदर छिपा कलाकार किसी कला विद्यालय से निकलकर नहीं आया था।
वह तो लॉकडाउन की उपज था।

❤️लॉकडाउन और मेरा ‘महान’ फैसला
लॉकडाउन का समय था। घर में काम करने वाली सहायिकाएँ भी छुट्टी पर थीं।
और अचानक हमें पता चला कि घर अपने आप साफ नहीं होता!
बर्तन धोने हैं। कपड़े धोने हैं। झाड़ू लगानी है। पोछा लगाना है।
और न जाने कितने ऐसे काम हैं, जिनका महत्व हमें तब समझ आता है जब उन्हें खुद करना पड़े।
मैंने स्थिति का गंभीरता से मूल्यांकन किया और निष्कर्ष निकाला—
“इन कामों से बचने का एक ही रास्ता है—खुद को बहुत व्यस्त दिखाओ!”
बस, कभी लैपटॉप लेकर बैठ गया, कभी कागज-पेंसिल लेकर।
लोगों को लगा कि मैं बहुत महत्वपूर्ण काम कर रहा हूँ।
और मैं मन ही मन खुश था कि आज बर्तन बच गए!
“जिस पेंसिल को मैंने काम से बचने के लिए उठाया था, उसी ने धीरे-धीरे मेरी पहचान बना दी।”

❤️जिसे ड्राइंग बनाना नहीं आता था!
सच बताऊँ तो स्कूल के दिनों में मेरी ड्राइंग की हालत बहुत खराब थी।
प्रोजेक्ट बनाना होता था तो दोस्तों की खुशामद करता—
“यार, मेरी भी ड्राइंग बना दे।”
दोस्त बेचारे शुरू में मदद कर देते थे।
लेकिन जब उन्हें लगा कि मैं इसे अपना स्थायी व्यवसाय बनाने वाला हूँ, तो उन्होंने भी हाथ जोड़ लिए!
फिर मैंने एक अद्भुत तकनीक खोज निकाली।

बल्ब और शीशे की मदद से तस्वीर को कागज पर उतारना!
आज सोचता हूँ तो हँसी आती है।
जिस आदमी ने कभी अपनी कल्पना से एक ठीक-ठाक फूल नहीं बनाया, वही आज बैठकर चेहरे, पक्षी, जानवर और लैंडस्केप बनाने लगा।
शायद हमारे अंदर बहुत कुछ छिपा रहता है—बस उसे बाहर आने का सही समय चाहिए।
❤️मेरी इंग्लिश का राज़ भी खुल गया
कामरान ने अगला सवाल किया—
“लेकिन वर्मा जी, आपकी इंग्लिश इतनी अच्छी कैसे हो गई?”
मैंने सोचा—अब इसे क्या बताऊँ?
सच्चाई यह है कि मैं अपनी तरफ से उलटी-सीधी इंग्लिश में ब्लॉग लिखता हूँ और फिर मेरा बेटा उसे पढ़कर मेरी गलतियाँ सुधार देता है।
जिस बेटे को कभी मैंने अंग्रेजी पढ़ना-लिखना सिखाया था, आज उसी से अपनी अंग्रेजी ठीक करवानी पड़ती है।
समय सचमुच सबसे बड़ा शिक्षक है।
और कभी-कभी वह हमें हमारी ही पढ़ाई का ब्याज भी वसूल कर लेता है!

❤️घर में एक ‘सेंसर बोर्ड’ भी है
कलाकार बनने की राह में एक और बड़ी चुनौती है—मेरी पत्नी!
मेरी कला पर उनकी पूरी नजर रहती है।
लैंडस्केप बनाइए—कोई समस्या नहीं।
फूल-पौधे बनाइए—पूरी आजादी।
पक्षी और जानवर बनाइए—कोई रोक-टोक नहीं।
लेकिन अगर किसी खूबसूरत महिला का चित्र बनाने बैठ गया, तो अचानक घर का सेंसर बोर्ड सक्रिय हो जाता है!
कौन-सी पोशाक होगी, कैसी तस्वीर होगी, कितनी ‘ओरिजिनलिटी’ की अनुमति है—सबका निरीक्षण होता है।
मैं कभी-कभी सोचता हूँ—
“कलाकार की कल्पना भी क्या शादी के बाद स्वतंत्र रहती है?”
फिर खुद ही जवाब देता हूँ—
“नहीं भाई, बिल्कुल नहीं!”
आखिर घर में शांति भी कोई छोटी चीज नहीं है।

❤️एक ‘वाह’ कितनी ताकत देती है
लेकिन मजाक अपनी जगह है।
सच यह है कि मेरे इस सफर को सबसे ज्यादा ताकत मिली है आप लोगों के प्रोत्साहन से।
जब कोई मेरी पेंटिंग देखकर कहता है—“बहुत सुंदर!”
जब कोई ब्लॉग पढ़कर टिप्पणी करता है—“दिल छू गया।”
जब कोई दोस्त फोन करके कहता है—“वर्मा जी, आपने कमाल कर दिया।”
तो सच मानिए, वह एक छोटा-सा वाक्य मुझे फिर से कुछ नया करने के लिए प्रेरित करता है।
“प्रशंसा केवल कानों को अच्छी नहीं लगती; सही समय पर मिले तो वह आत्मविश्वास को भी जगा देती है।”
शायद इसी वजह से मैं लगातार लिखता हूँ, चित्र बनाता हूँ और नई चीजें सीखने की कोशिश करता हूँ।

❤️मजबूरी कब जुनून बन गई, पता ही नहीं चला
शुरुआत में मैं खाली समय काटने के लिए चित्र बनाता था।
फिर लोगों ने पसंद करना शुरू किया।
फिर मुझे खुद मजा आने लगा।
और धीरे-धीरे जो काम केवल समय बिताने के लिए शुरू किया था, वह मेरे जीवन का एक खूबसूरत हिस्सा बन गया।
यही तो जिंदगी की खूबसूरती है।
हम अक्सर अपने जीवन का अगला अध्याय खुद नहीं लिखते—परिस्थितियाँ हमारी उँगलियों में कलम थमा देती हैं।

❤️अभी यात्रा बाकी है
आज लोग मुझे कभी लेखक कहते हैं, कभी कलाकार, कभी रचनाकार।
मैं मुस्कुराकर सोचता हूँ—
जिस आदमी ने स्कूल में अपनी ड्राइंग दूसरों से बनवाई थी, वह आज खुद चित्र बना रहा है!
इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी?
लेकिन मैं इसे उपलब्धि से ज्यादा एक सीख मानता हूँ।
हमारे भीतर कितनी क्षमताएँ छिपी हैं, इसका अंदाजा हमें खुद भी नहीं होता।
कभी उम्र उन्हें रोकती है, कभी व्यस्तता, कभी डर और कभी यह सोच कि—
“अब इस उम्र में नया क्या सीखना?”
मैं कहता हूँ—क्यों नहीं?
जब तक हाथ में पेंसिल है, मन में कल्पना है और दिल में उत्साह है, तब तक उम्र केवल एक संख्या है।
“नई शुरुआत के लिए सही उम्र वही है, जब दिल कहे—अभी बहुत कुछ बाकी है।”
मेरी कलाकार यात्रा अभी पूरी नहीं हुई है।
सच कहूँ तो अभी तो शुरू हुई है।
मुझे अभी बहुत कुछ सीखना है, बहुत कुछ बनाना है, बहुत कुछ लिखना है।
बस आप सबका प्यार और प्रोत्साहन मिलता रहे।
और हाँ…
अगर कभी मेरी पत्नी मुझे झाड़ू लेकर घर साफ करते हुए देख लें, तो कृपया उन्हें यह ब्लॉग मत दिखाइएगा।
क्योंकि आखिरकार—
एक कलाकार को अपनी कला के साथ-साथ अपनी ‘कलाकारी’ भी बचाकर रखनी पड़ती है!
आपका क्या ख्याल है? क्या कभी किसी मजबूरी, खाली समय या अचानक आई परिस्थिति ने आपके भीतर छिपे किसी हुनर को बाहर निकाला है?
Categories: मेरे संस्मरण

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