
यह कविता उस आंतरिक यात्रा की कहानी है जहाँ आँसू केवल दुःख का नहीं, बल्कि आत्ममुक्ति का माध्यम बन जाते हैं। जब वर्षों से संचित स्मृतियाँ, पीड़ाएँ और टूटे हुए विश्वास आँखों के रास्ते बह जाते हैं, तब मन एक अद्भुत रिक्तता का अनुभव करता है। यही रिक्तता अंततः आत्मबोध, स्वतंत्रता और एक नए आरम्भ का द्वार खोलती है।
यह कविता बताती है कि कभी-कभी स्वयं को पाने के लिए, पहले उस सबको खोना पड़ता है जो वास्तव में हमारा था ही नहीं।
जो मैं नहीं था
उस दिन
मेरी आँखों ने
मन के विरुद्ध विद्रोह कर दिया।
वे बरसती रहीं—
जैसे बरसों से कैद कोई बादल
अपने ही आकाश से मुक्त हो रहा हो।
मन चुप था…
वह न रोया,
न किसी को पुकारा,
बस अपने भीतर के
एक-एक कमरे की साँकल खोलता रहा।
स्मृतियाँ
धूप में रखे पुराने वस्त्रों की तरह
उड़ती चली गईं।
कुछ चेहरे,
कुछ अधूरे संवाद,
कुछ टूटे हुए विश्वास—
सब समय की नदी में
बिना किसी शोर के उतर गए।
जब अंतिम आँसू
पलकों से बिछड़कर
धरती में समा गया,
मैंने अपने भीतर झाँका…
वहाँ कोई तूफ़ान नहीं था,
कोई शिकायत नहीं थी,
न कोई प्रश्न शेष था।
सिर्फ़ एक रिक्तता थी—
वैसी,
जैसी किसी मंदिर में
आरती के बाद ठहर जाने वाली शांति।
तब जाना—
मन का भर जाना
हमेशा समृद्धि नहीं होता,
और मन का खाली हो जाना
हमेशा अभाव नहीं होता।
कभी-कभी
रिक्त होना ही
पूर्ण होने की पहली शर्त होता है।
बीज भी तो
धरती की गोद में
स्वयं को खो देता है,
तभी वृक्ष बनकर
आकाश से संवाद करता है।
आज मेरी आँखें
अब भी नम हैं,
पर मन…
वह अब किसी का बंदी नहीं।
वह उस दीपक की लौ है
जो जलते-जलते
अपने ही धुएँ से मुक्त हो गई है।
अगर अभी तुम मुझसे पूछो—
“इतना रोकर क्या पाया?”
मैं मुस्कराकर कहूँगा—
“मैंने कुछ भी नहीं पाया…
बस जो मैं नहीं था,
उसे खो दिया।”
(विजय वर्मा)
www.retiredkalam.com

Categories: kavita
बहुत सुंदर जी
LikeLiked by 1 person
बहुत-बहुत धन्यवाद! 🙏🌸
आपके स्नेहिल शब्द मेरी लेखनी के लिए प्रेरणा हैं। हृदय से आभार कि कविता ने आपके मन को स्पर्श किया। आपका प्रोत्साहन यूँ ही बना रहे। 😊
LikeLiked by 2 people
very nice .
LikeLiked by 2 people
Thank you so much.
LikeLiked by 1 person
A deeply moving poem that portrays tears not as a symbol of sorrow alone, but as a path to healing, self-discovery, and emotional liberation through life’s deepest experiences.
LikeLiked by 1 person
Thank you so much for your thoughtful and heartfelt appreciation. I’m truly touched that you connected with the deeper message of the poem. It means a great deal to know that its themes of healing, self-discovery, and emotional growth resonated with you.
Your kind words are deeply encouraging and inspire me to continue writing from the heart. My sincere gratitude for your support!
LikeLiked by 1 person
क्या खूबसूरत रचना है वर्मा जी। 🤍यह कविता केवल पढ़ी नहीं जाती, भीतर उतरती चली जाती है। “मैंने कुछ भी नहीं पाया… बस जो मैं नहीं था, उसे खो दिया” यह अंतिम पंक्ति देर तक मन में गूंजती रहती है। शब्दों में इतनी शांति और गहराई बहुत कम देखने को मिलती है। 🦋✨
LikeLiked by 1 person
हृदय की गहराइयों से आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। 🙏
आपके स्नेहपूर्ण शब्द मेरे लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं हैं। यह जानकर अत्यंत संतोष हुआ कि कविता की भावना आपके अंतर्मन तक पहुँची।
अंतिम पंक्ति को आपने जिस आत्मीयता से महसूस किया, वही किसी भी रचनाकार के लिए सबसे बड़ा सम्मान है। आपका यह स्नेह और प्रोत्साहन मुझे आगे भी मन की गहराइयों से लिखते रहने की प्रेरणा देता रहेगा। हार्दिक आभार।
LikeLiked by 2 people
बहुत सुंदर, वर्मा जी।
आत्मा की उस मौन यात्रा का साक्ष्य है जहाँ आँसू दुर्बलता नहीं, बल्कि भीतर जमे हुए असत्य का विसर्जन बन जाते हैं।
“मैंने कुछ भी नहीं पाया… बस जो मैं नहीं था, उसे खो दिया” यह अंतिम पंक्ति पूरी कविता का सार ही नहीं, आत्मबोध का भी शिखर है। वास्तव में आध्यात्मिक पथ पर प्राप्ति से अधिक महत्त्वपूर्ण त्याग होता है। जब झूठी पहचानें, अपेक्षाएँ और अहंकार की परतें उतरती हैं, तभी भीतर का वास्तविक ‘मैं’ प्रकट होता है।
रिक्तता से डरने वाला मन संसार में भटकता है, और उसी रिक्तता को स्वीकार करने वाला मन अंततः शांति का घर पा लेता है।
एक अत्यंत मार्मिक और मननयोग्य रचना। साझा करने के लिए हार्दिक धन्यवाद।
LikeLiked by 2 people
आपके अत्यंत गहन, संवेदनशील और आत्मस्पर्शी शब्दों के लिए हृदय से आभार। 🙏 आपने कविता के भाव को केवल पढ़ा नहीं, बल्कि उसे आत्मसात किया—यह किसी भी रचनाकार के लिए सबसे बड़ा सौभाग्य है।
आपने त्याग, रिक्तता और आत्मबोध के जिस सुंदर संबंध को व्यक्त किया है, उसने मेरे अपने चिंतन को भी समृद्ध किया। वास्तव में, जब अहंकार और झूठी पहचान की परतें हटती हैं, तभी भीतर का सत्य स्वयं प्रकाशित होता है।
आपकी यह सारगर्भित टिप्पणी मेरे लिए अमूल्य प्रेरणा है। स्नेह, सम्मान और इस सुंदर मनन के लिए पुनः हार्दिक धन्यवाद। 🙏
LikeLiked by 2 people
A deeply moving reflection. This poem beautifully portrays tears not as a sign of weakness, but as a path toward healing, release, and inner transformation. Sometimes letting go of the pain we carry is the first step toward finding peace within. ✨
LikeLiked by 2 people
Thank you so much for your thoughtful and heartfelt reflection. Your understanding of the poem means a great deal to me. I truly believe that tears are not a sign of weakness but of courage—they help us release what words often cannot express. I’m grateful that the message resonated with you. Wishing you peace, strength, and many moments of quiet healing. ✨🙏
LikeLike