# शायद, यही मेरी पहचान है #

यह कविता जीवन की उन अनकही यात्राओं की कहानी है, जहाँ टूटन, बिछड़न और दर्द के बीच भी इंसान उम्मीद का दामन नहीं छोड़ता। यह आत्मस्वीकृति, धैर्य और गिरकर फिर उठ खड़े होने के साहस का गीत है।
बिखर जाने के बाद भी मुस्कुराना और स्वयं को पहचान लेना ही शायद जीवन की सबसे बड़ी जीत है।

# शायद, यही मेरी पहचान है #

कुछ घाव पुराने अब भी सीने में हैं,
कुछ दर्द अभी भी जीने में हैं।
कुछ रातों की तन्हाई बाकी है,
कुछ आँसू आँखों के कोने में हैं।

फिर भी दिल ने हार न मानी,
उम्मीद की लौ बुझने न दी।
टूटे सपनों की राख समेटकर,
जीने की चाह मिटने न दी।

कुछ लोग मिले, फिर बिछड़ गए,
कुछ अपने होकर भी दूर हुए।
पर यादों के छोटे दीपकों से,
मैंने अपने सूने रास्ते नूर किए।

कभी थककर मैं बैठ गया था,
कभी कदम डगमगाए भी थे।
पर हर गिरने के बाद मैंने,
अपने हौसले फिर गुनगुनाए थे।

ना किस्मत ने कोई ताज दिया,
ना दुनिया ने कोई सम्मान दिया।
पर आईने में खुद को देखकर,
मैंने खुद को एक पहचान दिया।

अब दर्द भी मेरा साथी है,
और आँसू भी मेहमान हुए।
टूटे हुए पलों की छाँव तले,
हम पहले से इंसान हुए।

जो खोया, उसका ग़म भी है,
जो पाया, उसका मान भी है।
देखो, बिखरकर भी मुस्काता हूँ—
शायद, यही मेरी पहचान भी है।

(विजय वर्मा)
 www.retiredkalam.com



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1 reply

  1. बहुत सुंदर

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