
यह कविता उन लोगों की ख़ामोश कहानी है जिन्होंने दर्द को सिर्फ़ सहा नहीं, बल्कि उसे अपने व्यक्तित्व का हिस्सा बना लिया। टूटने, बिछड़ने और उम्मीदों के मर जाने के बाद भी जो लोग मुस्कुराना सीख जाते हैं, उनकी संवेदनाओं और भीतर के संघर्षों को यह कविता बेहद मार्मिक ढंग से व्यक्त करती है।
# ग़म को तहज़ीब दे दी है #
ग़म की आँधियों से अब डरता नहीं,
वक़्त के थपेड़ों से बिखरता नहीं।
जो टूटकर भी ख़ामोश खड़ा रह गया,
अब किसी हादसे से वो मरता नहीं।
ये आँख रात भर अँधेरों में जागती है,
जाने क्या खोया है जो उसे ढूँढती है।
कुछ अधूरी आवाज़ें, कुछ बिछड़े चेहरे,
हर ख़ामोशी में उनकी आहट सुनती है।
अब भयानक ख़्वाब भी डराते नहीं,
अपने डर से कई बार सामना होता है।
कुछ लोग भीतर से पूरी तरह टूट चुके हैं,
इसलिए वो दिल से मुस्कुराते नहीं।
ये दिल अभी भी तेज़ सदाओं से काँप उठे,
कुछ ज़ख़्म हैं जो अब रुलाते नहीं।
दर्द जब हद से गुज़र जाए साहब,
तो आँसू भी आँखों में आते नहीं।
हमने उम्मीदों को चुपचाप मरते देखा है,
अपने ही लोगों को बदलते देखा है।
जिन हाथों ने कभी सहारा दिया था,
उन्हीं हाथों को दूर निकलते देखा है।
अब हर चेहरे पर भरोसा नहीं होता,
हर रिश्ते का मतलब अपना नहीं होता।
कुछ लोग मुस्कुराहट ओढ़े फिरते हैं मगर,
उनके भीतर कोई सपना नहीं होता।
फिर भी हम जी रहे हैं, ये कम नहीं,
इतने अँधेरों में भी आँख नम नहीं।
शायद दर्द ने जीना सिखा दिया है,
अब आह भी दिल से निकलती नहीं।
हमने अपने ग़म को तहज़ीब दे दी है,
हर चीख़ को ख़ामोशी की नज़्म दे दी है।
अब जो भी पूछे, “कैसे हो तुम?”
हम मुस्कुरा देते हैं — यही ज़िंदगी है।
(विजय वर्मा)
www.retiredkalam.com

Categories: kavita
यही जिंदगी है,,,सुन्दर सार लिए,,आपकी रचना 🙏🏻
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बहुत-बहुत धन्यवाद 🙏🏻
आपने रचना के भाव और सार को इतने सुंदर ढंग से महसूस किया, यह मेरे लिए बेहद खुशी की बात है। सच ही तो है — यही जिंदगी है, अनुभवों और भावनाओं का सुंदर संगम। आपका स्नेह और सराहना हृदय को छू गई। 🌸
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very nice .
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Thank you so much.
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