
यह कविता जीवन की अनिश्चितता, बढ़ती उम्र और भीतर चल रहे प्रश्नों की गहराई को व्यक्त करती है। यह हमें याद दिलाती है कि स्पष्ट उत्तर न होने पर भी हर दिन को पूरी सजगता, सादगी और साहस के साथ जीया जा सकता है—मानो वही आख़िरी दिन हो।
मानो यह मेरा आख़िरी दिन हो
मेरे पास अब कितना समय है?
एक प्रश्न,
जो मेरे बिस्तर के किनारे
पुराने साथी-सा बैठा रहता है।
वह शोर नहीं करता,
बस चुपचाप
मेरे भीतर उतरता रहता है।
मैंने उत्तर खोजे हैं—
किताबों में, लोगों में,
उन सुबहों के कोमल वादों में
जो कभी पूरी तरह समझा न सके।
हाँ, मैं अब उम्रदराज़ हूँ—
पर अभी समाप्त नहीं।
यह प्रश्न अब भी
मेरी साँसों के साथ चलता है।
अजीब है, है ना?
शरीर थकने लगता है,
पर मन—
मन अब भी खटखटाता है
उन दरवाज़ों को
जो अभी बने ही नहीं।
तुमने कभी कहा था—
“ईश्वर की दी हुई ज़िंदगी जीओ,”
जैसे कोई स्पष्ट राह हो,
जैसे हर मोड़ पर नाम लिखा हो।
पर यह जीवन—
धुंध में चलने जैसा है,
जहाँ धड़कन ही
रास्ता दिखाती है।
फिर भी…
मैं हर सुबह को नमन करता हूँ।
और सोचता हूँ—
क्या हो अगर आज ही आख़िरी पन्ना हो?
डर से नहीं,
एक शांत विद्रोह के साथ।
क्या हो अगर मैं आज
दीवार पर ठहरती रोशनी को महसूस करूँ,
उस खामोशी को जी लूँ
जिसे कोई भंग न कर सके?
क्या हो अगर मैं जल्दी क्षमा कर दूँ,
थोड़ा और खुलकर हँसूँ,
और बिना सोचे
किसी अर्थपूर्ण राह पर चल पड़ूँ?
कभी-कभी मैं तैयार होता हूँ—
कहीं जाने के लिए नहीं,
बस यह याद दिलाने के लिए
कि मैं अब भी जीवित हूँ,
अब भी चाह शेष है।
दिल के किसी कोने से
एक धीमी आवाज़ उठती है—
अब भी जलने का एक तरीका है,
बुझने के लिए नहीं,
प्रकाश बनने के लिए।
इसलिए मैं इस दिन को जिऊँगा—
मानो यह आख़िरी हो।
ना जल्दबाज़ी में,
ना भय में,
बल्कि पूरी तरह
इस क्षण में उतरकर।
और यदि कल फिर आया—
तो मैं वहाँ भी पहुँचूँगा,
अपनी वही सहज मुस्कान लिए।
(विजय वर्मा)
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