
यह कविता बचपन की उस बेफिक्र और हल्की ज़िन्दगी की याद दिलाती है, जहाँ खुशियाँ सहज थीं और कोई बोझ महसूस नहीं होता था। समय के साथ ज़िम्मेदारियाँ और समझदारी ने जीवन को गंभीर बना दिया, और वही हल्कापन कहीं दब-सा गया। फिर भी, दिल के किसी कोने में वह मासूमियत और सुकून आज भी ज़िंदा है—बस उसे महसूस करने की देर है।
# हल्की-सी ज़िन्दगी
कभी ज़िन्दगी इतनी हल्की थी
कि हवा भी उसे उठा ले जाती थी—
हँसी होंठों पर नहीं,
रूह के भीतर उगती थी,
और गिरना भी
एक खेल का हिस्सा लगता था।
मिट्टी में सने हाथों से
हम आसमान छू लेते थे,
बिना ये सोचे कि ऊँचाई क्या है,
या गिरने का मतलब क्या होगा।
वक़्त ने फिर धीरे-धीरे
कंधों पर शब्द रख दिए—
“ज़िम्मेदारी”, “समझदारी”, “कल”…
और हम उन्हें उठाते-उठाते
खुद को कहीं पीछे छोड़ आए।
अब सब कुछ संभला हुआ है—
चेहरे, लम्हे, रिश्ते—
पर वो हल्कापन,
जो कभी दिल में रहता था,
जैसे कहीं दब-सा गया है
अनकहे डर और अधूरी चाहतों के नीचे।
कभी-कभी आईना पूछता है—
“क्या तुम्हें याद है
वो बच्चा जो तुम थे?”
और मैं मुस्कुरा देता हूँ…
थोड़ा थका हुआ,
थोड़ा सच्चा—
क्योंकि याद है मुझे,
वो ज़िन्दगी सच में हल्की थी।
(विजय वर्मा)
www.retiredkalam.com

Categories: kavita
Responsibilities and duties force us to forget ourselves. Beautiful poem
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Thank you so much, Priti. 🤍
I’m really glad that line connected with you. It’s true—responsibilities can quietly pull us away from ourselves, often without us even noticing.
Your words capture the essence of the poem very gently. I truly appreciate you taking the time to read and reflect on it. 🙏✨
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मन को छूती शब्दावली सर 🙏🏻 सुप्रभात
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बहुत सुंदर
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