# मन की अलमारी #

यह कविता भीतर लौटने की उस धीमी, ईमानदार यात्रा का चित्र है जहाँ व्यक्ति अपने ही सन्नाटे से संवाद करता है। आईने की शिकायत, फीकी मुस्कान और थकी आँखों के पार एक ऐसी लौ है जो बुझती नहीं — बस प्रतीक्षा करती है। यह रचना याद दिलाती है कि हम टूटते नहीं, बस कभी-कभी धूल से ढक जाते हैं। और जैसे ही हम अपने भीतर झाँकते हैं, वही पुरानी चमक फिर जन्म लेती है।

यह आत्मस्वीकृति, पुनर्जागरण और मौन में छिपी शक्ति की कविता है।

# मन की अलमारी #

आज फिर
मन की सीढ़ियों पर बैठा हूँ मैं,
अपने ही कदमों की आहट सुनने के लिए।
बहुत दिनों से
भीतर एक कमरा बंद था—
खिड़कियाँ जड़ी हुईं,
सपनों पर धूल की परत जमी हुई।

आईना आज चुप नहीं रहा,
उसने आँखों में झाँक कर पूछा—
“कहाँ रख आए वो चमक
जो कभी तेरी पहचान थी?”

मैंने पलकों को मूँद लिया,
और उतर गया
अपने ही सन्नाटे की गहराई में।
वहाँ,
एक छोटा सा दीप अब भी जल रहा था—
धीमा, मगर ज़िद्दी।

वो कह रहा था—
“थक जाना हार नहीं होता,
रो लेना कमज़ोरी नहीं होती।
तू वही है
जिसने अँधेरों में भी रास्ता खोजा था,
जिसने टूटकर भी
दूसरों को हौसला दिया था।”

आज बस इतना करना है—
अपने कंधों से बोझ उतारना,
पुरानी यादों की अलमारी खोल
हर दर्द को धूप दिखाना।

फिर से वही बचपन सी ज़िद जगानी है—
आसमान छोटा लगे तो
उसे छू लेने की ठान लेनी है।

क्योंकि तू मौसम नहीं
जो बदल जाए,
तू वो आसमान है
जिसमें हर मौसम ठहरता है।

तेरी आँखों की चमक
किसी और की रोशनी नहीं,
तेरे अपने होने की गवाही है।

उठ,
नई सुबह की पहली किरण को
अपने नाम कर ले।
मुस्कुरा—
कि तेरी मुस्कान
किसी और की उम्मीद बन सकती है।

और याद रख,
ज़िंदगी सच में
दो बार नहीं मिलती…
पर हर सुबह
जीने का एक नया मौका ज़रूर देती है। ❤️

(Vijay Verma)
www.retiredkalam.com



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6 replies

  1. very nice .

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  3. वर्मा जी, यह कविता पढ़ना जैसे अपने ही भीतर उतरने का निमंत्रण स्वीकार करना है…

    “मन की सीढ़ियों पर बैठकर अपने ही कदमों की आहट सुनना” यह भाव बहुत देर तक भीतर गूंजता रहता है। आपने जिस सादगी से आत्मसंवाद को शब्द दिए हैं, वह सीधा हृदय तक पहुँचता है।
    आईने का सवाल और उस छोटे से दीपक की ज़िद… यही तो जीवन का सत्य है हम बुझते नहीं, बस थोड़ी देर के लिए धुंधले हो जाते हैं।

    आपने टूटन को भी इतनी गरिमा दी है कि वह कमज़ोरी नहीं, बल्कि एक शांत ताक़त बनकर उभरती है।
    “तू मौसम नहीं… तू आसमान है” यह पंक्ति तो जैसे पूरी रचना का सार है।

    बदलाव हमारे भीतर आते-जाते हैं, पर हमारा मूल अस्तित्व स्थिर और व्यापक है और सच कहूँ तो, यह हर उस व्यक्ति के लिए एक कोमल सहारा है जो अपने भीतर लौटने की राह पर है।
    आपकी कलम सच में मौन को भी अर्थ दे देती है… ऐसे ही लिखते रहिए। 🌹

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    • आपके इतने गहरे और आत्मीय शब्दों के लिए हृदय से धन्यवाद। आपने जिस संवेदनशीलता से भावों को महसूस किया और उन्हें व्यक्त किया, वह सच में मन को छू गया।
      “मन की सीढ़ियों” और “दीपक की ज़िद” जैसे प्रतीकों को आपने जिस तरह समझा, वही किसी रचना की असली सार्थकता है—जब वह पाठक के भीतर अपनी प्रतिध्वनि बना ले। आपके शब्दों में जो अपनापन और गहराई है, वह मेरे लिए बहुत प्रेरणादायक है।
      “तू मौसम नहीं… तू आसमान है” को आपने जिस रूप में आत्मसात किया, उससे लगता है कि यह संवाद सिर्फ शब्दों का नहीं, बल्कि अनुभवों का है।

      आपका यह स्नेह और प्रोत्साहन मेरे लिए बहुत मूल्यवान है। दिल से आभार… ऐसे ही जुड़े रहिए। 🌹

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