# खोई हुई मुस्कान #

यह कविता बचपन की बेफिक्र हँसी और वर्तमान की समझदारी के बीच के अंतर को भावनात्मक रूप से उजागर करती है। यह सवाल उठाती है कि क्या हमने बड़े होकर कुछ पाया है या अनजाने में कुछ खो दिया है।

कविता का मूल भाव यह है कि जीवन केवल सीखने का नाम नहीं, बल्कि कभी-कभी उन सरल खुशियों को फिर से जीने का भी है, जो हमें सच्चा सुकून देती हैं।

# खोई हुई मुस्कान #

इस बार मुस्कान को याद नहीं,
ज़रा सवाल करते हैं—

क्यों हँस रहे थे हम इतने बेधड़क,
जब जेब में कुछ भी नहीं था,
और दिल में कोई डर भी नहीं?

कीचड़ में लथपथ वो चेहरा
किस बात पर इतना यकीन रखता था—
कि गिरना भी खेल लगे,
और दुनिया बस एक खुला मैदान।

अजीब है न—
अब सब कुछ है,
साफ़ कपड़े, सलीके की बातें,
पर वो बेतकल्लुफ़ हँसी कहीं खो गई।

शायद हम बड़े नहीं हुए,
बस संभल गए—
इतना कि हर कदम
सोच-समझकर रखने लगे,
और उसी में ठहर गए।

वो बच्चा तस्वीर से उतरकर पूछता है—
“क्या मिला इतना समझदार बनकर?”

मैं चुप रहता हूँ…
क्योंकि जवाब में
कुछ भी उतना सच्चा नहीं
जितनी उसकी मुस्कान थी।

तो आज सोचता हूँ—
शायद ज़िन्दगी का मतलब
सिर्फ़ सीखने में नहीं,
थोड़ा भूल जाने में भी है…

ताकि फिर कभी
बिना वजह हँस सकें,
और उन्हीं दोस्तों के संग
वो यादें ताज़ा कर सकें।

(विजय वर्मा)
 www.retiredkalam.com



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4 replies

  1. very nice .

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  2. Verma ji, this poem is a quiet masterpiece. It doesn’t shout—it gently unearths a sorrow we all carry but rarely name. The way you contrast the mud-splattered, fearless child with the clean, composed adult is profoundly moving. That last stanza—about life being not just about learning but also forgetting—is a truth that heals. Thank you for reminding us that growing up doesn’t have to mean growing silent inside. Truly beautiful. 🙏

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    • Thank you so much for this—truly 🙏

      Your reading goes straight to the heart of what I was trying to hold in those lines. That quiet shift from the fearless child to the composed adult… it’s something we all live through, often without noticing what gets left behind.

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