
यह कविता एक ऐसे शहर को संबोधित है जो सिर्फ़ ईंट-पत्थर का नहीं, बल्कि यादों, रिश्तों और बीते हुए समय का घर है। यह बचपन की मासूमियत, दोस्ती की गर्माहट और उम्र के साथ आए सन्नाटे के बीच का एक भावुक संवाद है।
ए मेरे शहर…
ए मेरे शहर,
तेरा नाम आते ही
आँखें भर जाती हैं—
जैसे समय की किसी तह से
मेरा बचपन
आज भी मुझे पुकारता हो।
कभी तू छोटा-सा कस्बा था,
और मैं उससे भी छोटा;
तेरी गलियों ने मुझे चलना सिखाया,
तेरी मिट्टी ने
मुझे अपना होना।
वो स्कूल की घंटी,
ज़िंदगी की पहली लय थी;
वो स्लेट, वो सपने—
जो मासूम थे
और बहुत बड़े भी।
आज भी तेरी गलियाँ होंगी,
रंग उड़ते होंगे,
दीये जलते होंगे—
बस हमारी दौड़,
हमारी हँसी
अब उनमें नहीं होगी।
दोस्तों की वो टोली,
नोक-झोंक, ठहाके—
आज समझ आता है
कि असली अमीरी
वहीं थी।
तू ऊँची इमारतों में बदल गया,
और मैं
यादों की छड़ी टेकता
धीरे-धीरे बूढ़ा हो गया।
लौटने का मन आज भी है,
नाम पुकारने का,
चेहरे ढूँढने का—
पर कुछ नाम
अब दुआ बन गए हैं,
और कुछ चेहरे
आसमान में बस गए हैं।
शायद इसलिए, ए शहर,
तू इतना याद आता है—
क्योंकि तू सिर्फ़ जगह नहीं था,
तू वो वक़्त था
जब दिल हल्का
और ज़िंदगी सरल हुआ करती थी।
ए मेरे शहर,
अगर कभी मुमकिन हो
तो इतना कर देना—
मेरी यादों को
वैसा ही रहने देना
जैसा मैंने तुझे छोड़ा था।
(विजय वर्मा)
www.retiredkalam.com

Categories: kavita
A deeply nostalgic poem that beautifully captures the essence of a city as more than just buildings—it’s a home of memories, childhood innocence, friendships, and the passage of time, evoking longing and heartfelt connection. 🏙️💛
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Thank you so much for this beautiful reflection 🏙️💛
I’m really touched that the poem stirred those feelings of home, memory, and time for you. That quiet longing you mentioned is exactly what I hoped would come through—the way a city holds pieces of who we were and who we’ve become. Grateful that it resonated so deeply.
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वर्मा जी, आपकी यह कविता सचमुच दिल के सबसे नर्म कोने को छूती है।
आपने शहर को एक जगह नहीं, बल्कि जीवित स्मृति की तरह संबोधित किया है जहाँ गलियाँ माँ की गोद-सी हैं, स्कूल की घंटी जीवन की पहली ताल है, और दोस्ती ही असली संपत्ति।
ख़ास तौर पर ये पंक्तियाँ बहुत गहराई से ठहरती हैं
“तू ऊँची इमारतों में बदल गया,
और मैं
यादों की छड़ी टेकता
धीरे-धीरे बूढ़ा हो गया।”
यह सिर्फ़ उम्र का नहीं, समय के बदलते अर्थों का बयान है।
कविता में कहीं भी बनावटी nostalgia नहीं है; सब कुछ सादा, सच्चा और आत्मीय है। अंत की प्रार्थना यादों को वैसा ही रहने देने की हर उस पाठक की है जिसने कभी किसी शहर में अपना बचपन छोड़ा हो।
बहुत सुंदर, बहुत मानवीय रचना।
यह कविता पढ़कर अपना-अपना शहर याद आ जाता है।
-विजय श्रीवास्तव
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विजय जी, आपके शब्दों ने कविता को और भी अर्थ दे दिया।
इतनी संवेदनशील और गहरी समझ के साथ पढ़ने के लिए हृदय से धन्यवाद।
यदि कविता आपको अपने शहर तक ले गई, तो यही उसकी सबसे बड़ी सार्थकता है।
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