
यह कविता अकेलेपन, यादों, और आशा की लौ को प्रदर्शित करती है। लेखक अपने मन के भीतर उफनते भावों को व्यक्त करते हुए उस प्रिय व्यक्ति को याद करता है जो उनसे दूर है।
यह कविता खामोशी, तूफान, और यादों के द्वंद्व को शब्दो मे पिरोने का प्रयास है।
तन्हाई का तूफान
अंधेरे कमरे में,
एक दीप जलता है,
मन का सागर उफनता है।
ख्वाबों के टुकड़े बिखरे पड़े हैं,
हर सांस में तेरी यादें छिपी हैं।
कभी-कभी लगता है,
मैं एक द्वीप हूं,
जहां खामोशी की लहरें टकराती हैं।
तूफान मेरे किनारे को छूकर जाती है,
फिर भी मैं तेरी राह तकता हूं।
अपनी तनहाई को दिल में कैद रखता हूं,
जैसे कोई अंधेरा मुझे निगले जा रहा है।
तेरी आवाज मेरी रूह को जगाती है,
पर तेरी अनुपस्थिति मुझे रुलाती है।
मैंने क्या खोया है, यह सब बताती है,
बस तेरी यादों में खोया रहता हूं।
आशा के दीपक की तरह जलता रहता हूं।
कहीं न कहीं, तुम भी मुझे ढूंढते होंगे,
अपनी बरबादियों के किस्से कहते होंगे।
(विजय वर्मा)
Categories: kavita
very nice
LikeLiked by 3 people
Thank you so much.
LikeLiked by 1 person