# जब मुस्कान बेवजह थी #

यह चित्र बचपन की उस सच्ची और बेफिक्र खुशी को पकड़ता है, जहाँ मुस्कान किसी वजह की मोहताज नहीं होती। कीचड़ से सना चेहरा और हवा में उलझे बाल—ये अव्यवस्था नहीं, बल्कि आज़ादी के प्रतीक हैं।

यह पल हमें याद दिलाता है कि कभी हम ऐसे भी थे—हल्के, निडर, और हर छोटी बात में खुशी ढूँढ लेने वाले। समय के साथ आई गंभीरता के बीच, यह तस्वीर जैसे चुपचाप पूछती है—क्या हमने जीना कहीं पीछे तो नहीं छोड़ दिया?

# जब मुस्कान बेवजह थी #

तस्वीर में जो मुस्कान है—
वो सिर्फ होंठों पर नहीं,
पूरे आसमान पर फैली हुई लगती है…
कीचड़ में सना बचपन,
पर आँखों में उजाला बेइंतहा।

हम भी ऐसे ही हँसते थे कभी—
हवा से लड़ते, बारिश में भीगते,
ज़िन्दगी को नाम नहीं देते थे,
बस जी लेते थे…
बिना सोचे, बिना थमे।

मिट्टी के छींटे कपड़ों पर नहीं,
ख़ुशियों के तमगे होते थे तब,
और हर गिरना—
एक नई उड़ान का बहाना बन जाता था।

आज आईना कुछ और कहता है—
चेहरे साफ़ हैं,
पर मुस्कान कहीं उलझी हुई है,
ज़िम्मेदारियों की सिलवटों में,
और खामोशी के किनारों पर।

वो बच्चा अब भी यहीं है शायद—
किसी कोने में,
मिट्टी से खेलता हुआ,
मुझे पुकारता हुआ—
“चलो, फिर से बेपरवाह हो जाएँ…”

पर मैं ठहर जाता हूँ,
समय की पकड़ में बँधा हुआ—
और वो मुस्कान…
तस्वीरों में कैद रह जाती है।

कभी जो थी मेरी पहचान,
आज वही एक याद बन गई—
एक तस्वीर,
जिसमें मैं हूँ…
पर वैसा नहीं, जैसा अब हूँ।

(विजय वर्मा )
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